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अंबेडकर को देवता मत बनाइये

बात पते की

अंबेडकर को देवता मत बनाइये

राम पुनियानी

इस साल, बाबा साहेब अंबेडकर की जयंती ऐसे दौर में पड़ रही है, जब दलित राजनीति के नाम पर करोड़ों रूपयों के नोटों की मालाएं पहनीं जा रहीं हैं. सवाल यह है कि जिन मूल्यों के लिए डा. अंबेडकर ने जीवन भर संघर्ष किया, वे मूल्य अब कहां हैं? सवाल यह है कि जिन दलितों की बेहतरी के लिए डा. अंबेडकर ने अपना जीवन होम कर दिया, उनकी आज क्या स्थिति हैं?

दलितों और समाज के अन्य दबे-कुचले वर्गो के अतिरिक्त, इस देश के क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों के लिए डा. अंबेडकर आज भी एक महानायक हैं. जो राजनैतिक दल सच्चे सामाजिक न्याय के विरोधी हैं, वे तक डा. अंबेडकर के विरूद्ध एक शब्द भी बोलने की हिम्मत नहीं कर सकते.

बाबा साहेब, सामाजिक परिवर्तन के प्रतीक हैं. वे जमींदारों की आर्थिक गुलामी और ऊँची जातियों की सामाजिक गुलामी से दलितों की मुक्ति के भी अक्षय प्रतीक हैं. पीएचडी और डीएससी होते हुए भी उन्हें अपने कार्यस्थल पर अपमान सहना पड़ा. उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि राजनैतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन रहेगी, जब तक उसके साथ-साथ सामाजिक बदलाव नहीं होता; जब तक शूद्रों और महिलाओं को गुलामी से मुक्ति नहीं मिलती. राष्ट्रीय आंदोलन में उन्होंने इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए काम किया.

समाज सुधार की दिशा में उनका एक बड़ा कदम था, शुद्रों को पानी के सार्वजनिक स्त्रोतों तक पहुंच दिलवाने का आंदोलन, जिसे “चवादार तालाब आंदोलन” कहा जाता है. डा. अंबेडकर का एक अन्य आंदोलन, जिसने सामाजिक यथास्थितिवाद की जड़ों पर प्रहार किया, वह था कालाराम मंदिर आंदोलन. इसके जरिए वे दुनिया के सामने यह तथ्य ला सके कि शूद्रों को भारतीय समाज अपना भाग मानने तक को तैयार नहीं था.

महिलाओं और दलितों की गुलामी की जड़ें “मनुस्मृति” में थीं और इसलिए उन्होंने इस पुस्तक को सार्वजनिक रूप से जलाया. अंबेडकर का यह विचार था कि भारतीय संदर्भ में जाति, दरअसल, वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है और इसीलिए उन्होंने “लेबर पार्टी” का गठन किया. बाद में उन्होंने दलितों के सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए कई संगठन और दल बनाए.

प्रयास यह किया जा रहा है कि उन्हें देवता बनाकर मंदिर में प्रतिष्ठापित कर दिया जाये और फिर उनके प्रिय सिद्धांतों और आदशों को कचरे की टोकरी में फेंक दिया जाये.


अपनी पुस्तक “थाट्स ऑन पाकिस्तान (पाकिस्तान पर कुछ विचार) के संशोधित संस्करण में उन्होंने चेतावनी दी कि अगर धर्म पर आधारित पाकिस्तान का निर्माण हुआ तो भारत में भी धर्म-आधारित “हिन्दू राज” स्थापित हो जाएगा और इससे भारत के शूद्रों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा. यह चेतावनी उनकी दूरगामी सोच का प्रतीक थी.

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में डा. अंबेडकर का योगदान असाधारण स्तर का था. उनकी भूमिका के बारे में गाँधीजी ने एक बार कहा था “डा. अंबेडकर, तुम खरे देशभक्त हो”. डा. अंबेडकर को इस बात का अहसास था कि अगर स्वतंत्रता के बाद भी सामाजिक न्याय की लड़ाई को जारी रखा जाना है तो भारतीय संविधान, स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों पर आधारित होना चाहिए.

अपने आलोचकों की परवाह करे बिना, डा. अंबेडकर ने भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के तौर पर, संविधान निर्माण के काम में अपनी पूरी प्रतिभा और मेहनत झोंक दी. यह डा. अंबेडकर की प्रतिबद्धता का ही नतीजा था कि संविधान में सामाजिक न्याय और कमजोर वर्गो की बेहतरी के लिए अनेक प्रावधान किए गए. पंड़ित नेहरू ने अंबेडकर को “हमारे संविधान के सम्मानित और प्रतिष्ठित निर्माता” की संज्ञा दी.

अंबेडकर ने स्वाधीनता आंदोलन के लक्ष्यों में सामाजिक परिवर्तन को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे चमत्कृत कर देने वाली मेधा के धनी थे और उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य, दलितों की बेहतरी था. वे निरंतर हमारे देश की जाति प्रथा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे. उन्होंने इस देश में राजनैतिक व सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को गति दी. यह आकारण ही नहीं था कि वे कमजोर वर्गो के संघर्ष के प्रतीक और अगुवा थे. और यही कारण है कि देश के सामाजिक और राजनैतिक परिदृष्य में उनकी भूमिका को नकारने या कम करके प्रस्तुत करने की कोशिशें हो रही हैं.

चूंकि उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज करना संभव नहीं है इसलिए प्रयास यह किया जा रहा है कि उन्हें देवता बनाकर मंदिर में प्रतिष्ठापित कर दिया जाये और फिर उनके प्रिय सिद्धांतों और आदशों को कचरे की टोकरी में फेंक दिया जाये. उनके योगदान के महत्व को घटा कर प्रस्तुत करने के भी योजनाबद्ध प्रयास हो रहे हैं.

डा. अंबेडकर का दलितों को मूल संदेश यही था कि उन्हें शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए, संगठित होना चाहिए और अपने हकों के लिए लड़ना चाहिए. उन्होंने कुछ प्रतिकात्मक आंदोलन अवश्य किए परंतु उनका मुख्य जोर इसी बात पर था कि दलित संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए सतत् संघर्ष करें.

दलित आंदोलन के रास्ते में दो प्रमुख बाधाएं हैं भू-सुधारों का अभाव और समाज पर कसता जा रहा धार्मिकता का शिकंजा. दलित आंदोलन का कई हिस्सों में बँट जाना इस बात का संकेत है कि दलितों के अस्तित्व और उनकी भौतिक बेहतरी के मूल मुद्दों को उठाने में यह आंदोलन असफल रहा है. केवल पहचान से जुड़े मसले उठाने से न तो दलितों के हालात सुधरेगें और ही उन पर होने वाले अत्याचारों में कमी आयेगी.

धर्म की राजनीति, हर प्रकार के सामाजिक बदलाव की विरोधी है और वह अंबेडकर के मूल्यों के भी खिंलाफ है. सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए जरूरी है एक व्यापक प्रजातांत्रिक संघर्ष, जिसमें दलितों के अलावा समाज के अन्य वंचित वर्गो की भी भागीदारी हो.

10.04.2010, 17.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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ramesh kumar (rk140676@gmail.com) azamgarh

 
 भारतीय व्यक्ति मूर्तिपूजक होते है. इसीलिए अपने आदर्शों को मूर्तरूप देकर उसे देवता बना देते हैं. बुद्ध को भी ईश्वर बनाकर उन्होंने बुद्ध के विचारों के साथ justify नहीं किया. 
   

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