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कहां गए भले लोग?

विचार

 

कहां गए भले लोग?

प्रीतीश नंदी

 

एक ऐसे वक्त में मैं इस दुनिया में आया, जब कोई खलनायक नहीं था. अंग्रेज जा चुके थे. भारत एक आजाद मुल्क था. हमारे कई राष्ट्रनायक थे: महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, श्री अरविंद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, बीआर आंबेडकर. ये सभी लोग विलक्षण थे, जिन्होंने अपने-अपने तरीकों से आजादी की लड़ाई लड़ी. एक नए राष्ट्र का निर्माण तेजी से हो रहा था. सभी उत्साहित थे. यह आगे की ओर देखने और आगे कदम बढ़ाने का समय था. तब एक भारतीय होना गौरव का विषय था. इसी में हमारी बाकी तमाम पहचानें भी शामिल थीं.

हां, विभाजन की त्रासदी जरूर हमें खलती थी. देश के बंटवारे के दौरान कई लोगों ने अपने घर और परिवार खो दिए थे. इसके चलते कुछ लोगों में काफी गुस्सा भी था, लेकिन उस गुस्से की एक खास वजह थी. यह गुस्सा उन लोगों के प्रति था, जो इस खून-खराबे के लिए जवाबदेह थे. यह गुस्सा किसी अंधे उन्माद की तरह नहीं था. उस जमाने में कोई भी इतना मूर्ख नहीं था कि वह हर मुसलमान को पाकिस्तानी और हर ईसाई को अंग्रेज ही समझता.

सभी अपने अतीत को भुला देना चाहते थे और नए भारत के निर्माण में जुट जाना चाहते थे. मैं कोलकाता में पला-बढ़ा था, जहां मेरी कई ऐसे हिंदुओं और मुसलमानों से भेंट हुई, जो उस वक्त के पूर्वी पाकिस्तान से भागकर आए थे. वे अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करने की जी तोड़ कोशिशें कर रहे थे. स्थानीय बंगाली उन्हें घुसपैठियों की तरह नहीं देखते थे. इसके उलट स्थानीय बंगालियों ने अपनी सीमाओं से परे जाकर उनकी मदद ही की. मुझे याद है कि मेरी मां ने एक शरणार्थी औरत की मदद करने की गरज से उसे अपना ब्लाउज कढ़ाई करने को दे दिया था, जबकि एक स्कूल शिक्षिका के रूप में उन्हें बहुत मामूली तनख्वाह ही मिला करती थी और मां ये खर्च वहन नहीं कर सकती थीं.

उन दिनों हवाओं में एक जादू था. एक नया मुल्क बनाने के अहसास का जादू. सभी की आंखों में एक ऐसे हिंदुस्तान का सपना था, जहां सभी लोग सबसे पहले हिंदुस्तानी होंगे. हमारे बैठकखाने में रवींद्रनाथ, गांधी, सुभाषचंद्र की तस्वीरें टंगी रहती थीं. मेरे पिता गर्व से मुझे आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाया करते थे. उस वक्त के नेता हमारे सबसे बड़े नायक हुआ करते थे. मैंने उस जमाने में कभी किसी फिल्मी सितारे या क्रिकेटर के बारे में नहीं सुना. हम केवल राजनेताओं की बातें करते और इस बारे में सोचते कि वे भारत की दशा कैसे बदल सकते हैं. हमें उनमें भरोसा था, हम उन्हें सराहते थे.

आज खलनायक हर ओर हैं और दिनोंदिन उनकी संख्या बढ़ती  जा रही है. हमारे नायक आखिर कहां चले गए? मैं अक्सर सोचता हूं वो हिंदुस्तान क्यों नहीं बन सका, जिसके हमने कभी सपने देखे थे?

जब मैं हाईस्कूल में पहुंचा, तब तक हालात बदल चुके थे. टिकट की कीमतों में एक पैसे की बढ़ोतरी से नाराज लोग बसें और ट्रामें फूंक रहे थे. यह नाराजगी दरअसल कीमतों में बढ़ोतरी के कारण नहीं थी. यह नेताओं के प्रति उपजा गुस्सा था, जिन्होंने हमें निराश किया था. जब मैंने कॉलेज में दाखिला लिया, तब तक मेरी कक्षा के कुछ सबसे अच्छे छात्र नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़ चुके थे. उन्हें लगता था कि गरीब देहातियों के हक के लिए लड़ना इंसाफ की लड़ाई थी. और चाहे मैं उनसे सहमत न होऊं, लेकिन तब के सभी नौजवानों की तरह मैं भी भलाई के लिए संघर्ष में भरोसा रखता था. इसी दौरान यूरोप में छात्र राजनीति गरमा रही थी.

इंग्लैंड में तारिक अली, पेरिस में डेनियल कॉन बेंडिट, जर्मनी में रूडी दुशेक ने यूरोप के मई विद्रोहों की जमीन तैयार की. सरकारें नौजवानों की ताकत से खौफ खाने लगी थीं. चे ग्वेरा एक नया आदर्श थे और नई दुनिया के निर्माण के उनके विजन से नौजवान खासे प्रभावित हुए थे. लेकिन यह तिलिस्म टूटने में देर नहीं लगी. मार्क्सववाद एक नाकाम मसीहा साबित हुआ.

लेकिन नाकाम होने वाला अकेला मार्क्सनवाद ही नहीं था. सियासत ने भी भारत को खासा नुकसान पहुंचाया. बैठकखानों से राजनेताओं की तस्वीरें गायब हो गईं. आज हमें राजनीतिक दलों, धार्मिक समूहों, जातियों, समुदायों के बीच होने वाले संघर्षो की खबरें पढ़ने को मिलती हैं. क्षेत्रीय मसले बहुत बड़ी समस्या बन चुके हैं. नए-नए तरह के संघर्ष सामने आ रहे हैं. हमें ऐसे अपराधों की खबरें सुनने को मिल रही हैं, जिनके बारे में हमने पहले कभी नहीं सुना था. अचानक हमें अपने चारों ओर खलनायक नजर आने लगे. राजनीति धुंधभरी हो गई. अब हमने अपने नायक कहीं और तलाशने शुरू कर दिए हैं.

फिल्म अभिनेता अब हमारे नायक बन चुके हैं. और इसी तरह लेखक, गायक, पत्रकार और खिलाड़ी भी. समाज में अब भी डॉक्टरों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का सम्मान होता है. इनमें से कुछ ने राजनीति की राह पकड़ी और चुनाव भी जीत गए. लेकिन वह दुनिया जिसमें खलनायक नहीं थे, अब पूरी तरह बदल चुकी है. आज हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां हर तरफ खलनायक ही खलनायक हैं. इनमें भी एक बड़ा हिस्सा राजनेताओं का है.

इसके बावजूद हर कोई अलग-अलग वजहों से राजनीति में आना चाहता है. राजनीति अब शायद ही राष्ट्रनिर्माण के लिए की जाती है. अब वह पैसा, ताकत और समृद्धि का साधन है. कुछ अन्य पेशों में भी ऐसा ही होता है, लेकिन राजनीति इसका सबसे आसान जरिया है. ऐसा इसलिए है क्योंकि अब राजनीति भ्रष्टाचार से पटी पड़ी है. आज एक ईमानदार राजनेता उतना ही दुर्लभ हो गया है, जितनी कि पहाड़ी बटेर, जिसकी खोज में पक्षीविज्ञानी सालिम अली ने अपनी पूरी जिंदगी बिता दी थी. जिन दिनों मैंने एक पत्रकार के रूप में अपना कॅरियर शुरू किया था, तब किसी भ्रष्ट नेता का भंडाफोड़ कर देना और उसे गिरफ्तार होते या सजा पाते देखना मुमकिन था. आज तो ये हालात हो गए हैं कि यदि आप किसी भ्रष्ट का भंडाफोड़ करते हैं तो ज्यादा संभावना यही होगी कि आप ही की धरपकड़ कर ली जाए.

लेकिन हमारे इर्द-गिर्द कुछ और खलनायक भी हैं. आतंकवादी, वसूली करने वाले, अंडरवर्ल्ड वाले, माओवादी जिन्हें अक्सर पुराना नक्सलवादी समझ लिया जाता है, खाप जो अपनों का ही कत्ल कर देते हैं, फिदायीन हमलावर जो एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं, कट्टरपंथी जो शराब पीने या शॉर्ट स्कर्ट पहनने वाली लड़कियों से हाथापाई करते हैं, रूढ़िवादी जो हमेशा किसी-न-किसी नए शिकार की तलाश में रहते हैं, धार्मिक संगठन जो देश के अन्य नागरिकों को दुश्मनों की तरह देखते हैं, किताबें जलाने वाले, कला को नहीं समझने वाले, हैकर्स, भ्रष्ट सरकारी अधिकारी, बेईमान पुलिसवाले, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले, नकली दवाइयां बनाने वाले, भूमाफिया, जो उन लोगों की मदद से आम जनता की जमीनें हथिया रहे हैं, जिन्हें उनकी रक्षा करनी थी.

आज खलनायक हर ओर हैं और दिनोंदिन उनकी संख्या बढ़ती चली जा रही है. हमारे नायक आखिर कहां चले गए? मैं अक्सर सोचता हूं. वो हिंदुस्तान क्यों नहीं बन सका, जिसके हमने कभी सपने देखे थे?

15.04.2010, 11.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

om prakash shukla (ops309@gmail.com) lucknow

 
 प्रीतीश जी आपका लेख बहुत ही सारगर्भित है जो आपकी प्रतिष्ठा के अनुकूल है. आपके लिखे पर टिप्पणी करना बहुत मुश्कित है, लेकिन अगर व्यापक परिवेश में देखा जाए तो इसकी जिम्मेदारी भी उन्हीं नायकों के माथे आती है जो धीरे-धीरे देश की राजनीति को प्रदूषित करने की शुरुआत कर चुके थे. आखिर क्यों काग्रेस से लोहिया, जयप्रकाश नारायण जैसे लोगों का आज़ादी के बाद से ही मोहभंग होना प्रारंभ हो गया था.

मुझे लोहिया जी की वो बात याद आती है जो उन्होंने नेहरू की नीतियों को ले कर कही थी. उन्होंने कहा था कि देश को आगे बढ़ाने में महत्व देश को आगे ले जाने में सवाल दिशा का है, जो शुरुआत हमारे यहां हुई उसकी दिशा ही गलत थी इसीलिए वांचित सफलता नहीं हासिल कर सके और देश अपने मार्ग से विमुख होता चला गया जिसका परिणाम यह है कि जितने राष्ट्र नायकों का नाम आपने लिया आज़ादी के 62 साल बाद ही देश के लिए आप्रसंगिक हो गए हैं. आज तो जो कुछ देश की आजादी में अपना सब कुछ लुटा देने वालों का नाम तक कांग्रस की 125वीं सालगिरह पर प्रकाशित होने वाली संस्मरणिका से बेदखल कर दिए गए उनके योगदान की कोई चर्चा नहीं है.
 
   

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