पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > राम पुनियानी Print | Send to Friend | Share This 

सिर पर मैला ढ़ोना बंद हो

बात पते की

सिर पर मैला ढ़ोना बंद हो

राम पुनियानी

भारतीय समाज में अनेक कुप्रथाएं व्याप्त हैं. इनमें से कई ऐसी हैं, जो समाज के दलित-वंचित वर्गों पर अत्याचार का स्त्रोत व कारण हैं. इन्हीं में एक है सिर पर मैला ढ़ोने की कुप्रथा. मानव मल को मानवों द्वारा झाड़ू, रांपी जैसे खुरचने वाले औजारों और बाल्टी की सहायता से साफ किया जाता है.

आधिकारिक तौर पर भारत में सिर पर मैला ढ़ोने की प्रथा अस्तित्व में नहीं है. उसका तो भारत सरकार ने सन् 1993 में ही उन्मूलन कर दिया था.

इसे सरकार की अक्षमता कहें या लापरवाही परंतु सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए सर्वेक्षणों से यह तथ्य सामने आया है कि आज भी देश में लगभग 14 लाख लोग इस काम में लगे हैं और इनमें से 95 प्रतिशत महिलाएं हैं.

 

सफाईकर्मी, दलितों के अछूत वर्ग से आते हैं. अपनी आजीविका के लिए यह अमानवीय कार्य करना उनकी मजबूरी है. उन्हें यह काम विरासत में मिलता है.

राज्यों ने इस कुप्रथा के उन्मूलन संबंधी केन्द्र सरकार के निर्णय को गंभीरता से नहीं लिया. कई राज्य सरकारों ने तो इस आशय की अधिसूचना तक जारी नहीं की है. इसी पृष्ठभूमि में, सामाजिक संगठन “सफाई कर्मचारी आंदोलन“ ने इस नृशंस प्रथा का 2010 के अंत तक पूर्ण उन्मूलन किए जाने का आव्हान किया है.

सिर पर मैला ढ़ोने की प्रथा, हमारे देश में प्रचलित अछूत प्रथा से ही जन्मी है. कई सामंती समाजों में जन्म-आधारित जाति प्रथा अस्तित्व में थी परंतु एक मुख्य अंतर यह था कि भारत में जाति प्रथा को धार्मिक स्वीकृति प्राप्त थी. धर्मग्रंथों के आधार पर जातिप्रथा को दैवीय दर्जा दे दिया गया था. जाति व्यवस्था के उदय के पीछे कई कारक थे, जिनमें शामिल थे नस्ल, वर्ग और धर्म. धार्मिक और आर्थिक कारकों ने जाति के पिरामिड के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. जैसा कि अंबेडकर ने कहा था, “जाति, श्रम विभाजन नहीं श्रमिकों का विभाजन है”. अंबेडकर ने इस संदर्भ में धार्मिक और वैचारिक कारकों को अधिक महत्व दिया. अंबेडकर के विश्लेषण के अनुसार, इन कारकों के आपस में गुंथ जाने से वे सामाजिक परिवर्तन आए जिनने अंततः जाति प्रथा को जन्म दिया.

जाति प्रथा का विकास एक धीमी प्रक्रिया थी. उसकी निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए उसे वंशानुगत बना दिया गया. रोटी और बेटी के संबंधों पर रोक से सजातीय और बहिर्विवाह से संबंधित विस्तृत नियम जन्मे. जाति के वंशानुगत बन जाने और उपजातियों को जीविका से जोड़े जाने का नतीजा यह हुआ की किसी व्यक्ति के लिए जाति की सीमाओं को लांघना असंभव हो गया. जिस जाति में किसी व्यक्ति का जन्म हो, उसी जाति में आजीवन बना रहना उसकी नियति बन गई.

अछूत प्रथा भी जाति प्रथा से उपजी. अछूत प्रथा की अत्यंत क्रूर और अमानवीय अभिव्यक्ति है, सिर पर मैला ढ़ोने की प्रथा. ऊँची जातियां, नीची जातियों पर इससे अधिक क्रूर अत्याचार नहीं कर सकती थीं. शुद्धता-प्रदूषण की अवधारणाओं और पुनर्जन्म के सिद्धांत का इस्तेमाल इन वर्गों को यह अमानवीय कार्य करते रहने के लिए मजबूर करने के लिए किया गया. खालिद अख्तर, हार्डन्यूज मीडिया, मार्च 2008 में कहते हैं कि इस कुप्रथा का सबसे पहले जिक्र नारद संहिता और वजसनेयी संहिता में मिलता है. नारद संहिता में अछूतों के 15 कर्तव्यों की जो सूची दी गई है, उसमें मानव मल को साफ करना शामिल है. वजसनेयी संहिता में चांडालों को गुलाम बताया गया है, जो मानव मल को ठिकाने लगाते हैं. इस वर्ग के लोगों को अन्य दलित भी नीची नजरों से देखते हैं और कोई उनके साथ सामाजिक मेलजोल नहीं रखता.

गुजरात के लोथा में हुई पुरातत्वीय खुदाई से यह जाहिर हुआ है कि हड़प्पा सभ्यता में शुष्क शौचालय नहीं थे. वहां जल-आधारित सफाई व्यवस्था थी. शौचालय, नालियों से जुड़े हुए थे. वहां मेनहोल और चैम्बर भी थे. हड़प्पा सभ्यता के पतन के साथ ही यह तकनीक भी लुप्त हो गई.

हाथ से मैले की सफाई की व्यवस्था मध्यकाल में भी प्रचलित थी. कुछ स्थानों पर मुस्लिम राजाओं ने दूसरी तकनीकें भी अपनाईं.

साम्प्रदायिक ताकतों ने इस मामले में भी अपनी शैतानी बुद्धि का इस्तेमाल करने में कसर नहीं छोड़ी. यह प्रचार किया गया कि चूंकि पर्दानशीन मुस्लिम महिलाएं शौच से निवृत्त होने के लिए जंगलों में जाने में असमर्थ थीं, इसलिए उनकी सुविधा के लिए सिर पर मैला ढ़ोने की व्यवस्था लागू की गई. यह अपनी हर आतंरिक समस्या का स्त्रोत बाहर ढूढ़ने की प्रवृत्ति का उदाहरण है. मुगल किलों की जल-मल निकासी व्यवस्था के अध्ययन से पता चलता है कि शौचालयों से गंदे पानी को बाहर निकलने का मार्ग हुआ करता था. पानी की सहायता से, अपशिष्ट पदार्थ, गुरूत्वाकर्षण बल के जरिए, किले की बाहरी दीवारों तक ले जाए जाते थे. यह व्यवस्था दिल्ली के लालकिले और राजस्थान, हम्पी व केरल के शाही महलों में थी.

जहां तक हाथ से मैला साफ करने का सवाल है, अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को न केवल जारी रखा बल्कि उसे व्यवस्थित रूप दिया. सेना, रेलवे, नगरपालिकाओं और बड़े शहरों में जमादारों के पद सृजित किए गए. कुछ स्थानों को छोड़कर, अंग्रेजों ने कहीं आधुनिक सीवेज सिस्टम नहीं बनवाए क्योंकि उन्होंने पाया कि भारत में पहले से ही सफाई की व्यवस्था उपलब्ध थी. हस्तकौशल का समाज में महत्व कम होने और बढ़ते औद्योगिकरण से बेरोजगार हो गए समाज के एक हिस्से को मजबूरी में इस काम को अपना पेट पालने का साधन बनाना पड़ा.

महात्मा गांधी ने अछूत प्रथा निवारण के लिए अथक प्रयास किए और शौचालयों की कई नई डिजाइनों को आजमाया परंतु उनके प्रयासों का सामाजिक स्थिति पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ा.

पिछले कुछ वर्षों में, सामाजिक आंदोलनों के दबाव के कारण सरकारें इस प्रथा का उन्मूलन करने और जमादारों का पुनर्वास करने पर मजबूर हो गई हैं. परंतु हर सरकारी योजना की तरह, यह प्रयास भी आधा-अधूरे मन से किया जा रहा है और पर्याप्त प्रभावकारी नहीं है. सामाजिक संगठनों का इस सिलसिले में अभियान चलाने और हर संभव तरीके से सरकार और समाज पर दबाव बनाने का प्रयास सराहनीय है. यह स्पष्ट है कि जनमत के दबाव और संवेदनशील लोगों के प्रयासों से ही अंततः भारतीय समाज पर लगा यह बदनुमा दाग मिट सकेगा. धर्मग्रंथ चाहे कुछ भी कहते हों और परंपरा चाहे कुछ भी हो. अब बहुत हो चुका है. हमारे समाज के ही एक हिस्से पर हो रहा यह अत्याचार तुरंत बंद होना चाहिए.

01.05.2010, 10.02 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bizooka2009@gmail.com (बिजूका) indore

 
 यह एक बहुत ही घृणित काम है, जो इक्कीसवीं सदी में भी ज़ारी है। आज यह काम सिर्फ़ गाँव में हो रहा है।जिन गाँवों यह हो रहा है, उनकी संख्या हज़ारों में है। यह काम बंद हो ऎसा ज़िम्मा कुछ एन.जी.ओ. ने ले रखा है, पर यह अकेले एन.जी.ओ के बस क नहीं। एन.जी.ओ. की ईमानदारी भी आज सवाल खड़े हो रहे हैं... ऎसे कुछ और भी सोचने की ज़रूरत है. सत्यनारयण पटेल  
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in