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कसाब के सबक

मुद्दा

कसाब के सबक

प्रीतीश नंदी

कसाब के मामले में हुआ फैसला बिल्कुल न्यायोचित है. इस निर्णय से किसी को तनिक भी आश्चर्य नहीं हुआ. उसने दिनदहाड़े मासूम लोगों की हत्या की थी और उसके इस अपराध के चश्मदीद गवाह भी मौजूद थे.

यद्यपि अन्य बहुत से लोगों की तरह मुझे भी कभी-कभार इन मूढ़, गुमराह किए गए लडक़ों के लिए दुख महसूस होता है. ये लडक़े प्राय: गरीब और अशिक्षित होते हैं, जिन्हें आतंकी संगठनों द्वारा खरीदा और तैयार किया जाता है. वे सोचते हैं कि वे किसी महान मकसद के लिए लड़ रहे हैं. जब तक उन्हें इस बात का एहसास हो कि वे राजनीति के वीभत्स, गंदे खेल का एक मोहरा भर हैं, ऐसी राजनीति, जिसके लिए धर्म भी दुनिया को लड़ाई की आग में झोंके रखने का सिर्फ एक हथियार है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

आज दुनिया का सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ रहा उद्योग है- आतंक. और आतंक के इस उद्योग द्वारा उन लडक़ों का इस्तेमाल किया गया है. ये सिर्फ अलकायदा, तालिबान या लश्कर-ए-तैयबा भर नहीं हैं. यहां तक कि अमरीका के लिए भी आतंक आज व्यापार की सबसे मजबूत मुद्रा है, डॉलर से भी कहीं ज्यादा मजबूत. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अमरीका पाकिस्तान के साथ गुप्त रूप से मोहब्बत का खेल कर रहा है.

कसाब के ऊपर मुकदमा चला और उसे दोषी पाया गया. अब उसे सजा मिलेगी. यह इस मामले का एकदम न्यायोचित अंत है. इन सबके बावजूद हमने जिस तरह से पूरा मुकदमा चलाया, मुझे उसकी ज्यादा तारीफ सुनने को नहीं मिली. यह मुकदमा उन सब लोगों को ऊंचा उठाता है, जिन्होंने न्याय की हमारी महान परंपरा को और मजबूत किया है.

कसाब को जीवित रखने के लिए 30 करोड़ या उससे कहीं ज्यादा धन खर्च हुआ. लेकिन इसके बदले में हमने जो हासिल किया है, उसकी कोई तुलना मुमकिन नहीं- एक बंदी बनाए हुए आतंकवादी पर स्वतंत्र और निष्पक्ष मुकदमा. कितने राष्ट्र वास्तव में ऐसा करने का दावा कर सकते हैं? लेकिन युवा कसाब ने जो किया, उसे उस अपराध की सजा मिल भी जाए तो भी आतंक के कारखाने चलाने वाले असली लोग कभी पकड़ में नहीं आएंगे. संभव है, कसाब को फांसी पर लटका दिया जाए या वह आजीवन जेल में पड़ा रहे, लेकिन जिन लोगों ने कसाब की ऐसी सोच बनाई, उसे यहां भेजा और फिर उसका साथ छोड़ दिया, वे बच निकलेंगे क्योंकि आतंक की इस लड़ाई के सरदार अमरीका ने पाकिस्तान के साथ दोस्ती करने का निर्णय लिया है. इसलिए न्याय बैठकर आराम फरमाए.

कसाब का फैसला इकलौता फैसला नहीं था. उसके साथ दो युवा भारतीय भी थे, जिन पर आतंक को बढ़ावा देने का आरोप था. उन्हें दोषी नहीं पाया गया और रिहा कर दिया गया. आमतौर पर इस तरह के मुकदमों में दोनों तरफ से बहुत क्षति होती है. दूसरे लोग भी इन मामलों में खींच लिए जाते हैं और जनता का आक्रोश इतने उफान पर होता है कि न्यायालय उन दूसरे लोगों को भी बरी नहीं करना चाहता. इसलिए उन्हें भी उन अपराधों की सजा मिल जाती है, जो संभव है कि उन्होंने किए ही न हों. कोई इस पर एक बूंद आंसू भी नहीं बहाता. लोग हमेशा सिर्फ न्याय से ही संतुष्ट नहीं हो जाते. वे प्रतिशोध चाहते हैं. नतीजा यह होता है कि जिन पर भी मुकदमा चल रहा है, उन्हें उन अपराधों के लिए भी सजा मिल जाती है, जो सिद्ध नहीं हुए हैं, बल्कि जिनके होने का सिर्फ शुबहा भर है. इन अर्थों में कसाब का मुकदमा एक उदाहरण है.

हमें सिर्फ इस बात का अहसास करने की जरूरत है कि जब हमारे लोगों को भोजन, नौकरी, शिक्षा और स्वास्थ्य की जरूरत है तो हम लोग मनमुटावों और मतभेदों का बोझ नहीं उठा सकते.


जज ने बाकी दोनों संदिग्ध अपराधियों को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उनके खिलाफ सजा देने लायक पर्याप्त सबूत नहीं थे. सरकार ने अपने सर्वश्रेष्ठ अभियोक्ता नियुक्त किए थे, जबकि इन लडक़ों के पास कुछ भी नहीं था. वे सिर्फ अपने मामले की स्पष्टता के कारण ही जीते.

ये रिहा किए हुए लोग इस दावे को और मजबूत करते हैं कि आतंकवाद घर के भीतर पनप रही चीज नहीं है. ये हमारे यहां बाहर से आयातित है. जिस तरह यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान आतंकवाद का वैश्विक सौदागर है, अमरीका पाकिस्तान को हथियारों से लाद रहा है, उससे यही पता चलता है कि ओबामा भी हथियारों के व्यापार करने वालों की दलबंदी को नहीं रोक सकते. इसलिए अमरीका पाकिस्तान और हमें, दोनों देशों को हथियार बेचने के अपने पुराने हथकंडे पर वापस लौट आया ताकि युद्ध का यह नाटक चलता रहे.

जब तक घृणा की बयानबाजी पाकिस्तान बनाम भारत तक सीमित है, तब तक तो हम इससे निपट सकते हैं. आखिर छह दशकों से हम इससे निपट ही रहे हैं. लेकिन धर्म की शातिर बयानबाजी भयानक रूप से विध्वंसकारी हो सकती है. ब्रिटेन और अमरीका में रहने वाले लोग इसी धर्म के आगे घुटने टेक रहे हैं. अपने देश भाइयों को हिंसा से मुक्त करने के लिए आतंक का उन्माद फैलाने वाले उन्मत्त और कट्टर लोग धर्म के नाम पर आम लोगों को अपने साथ शामिल कर रहे हैं. हम ये सुनिश्चित करके कि भारत में राजनीतिक प्रक्रिया न्यायपूर्ण और निष्पक्ष है, अगर अपने देश में ब्रिटेन और अमरीका जैसे हालात पैदा होने से रोक सकें तो हम सुरक्षित हैं.

क्या हम वक्त की घड़ी को घुमाकर पीछे ले जा सकते हैं? नहीं, आप घृणा के दसियों सालों को मिटा नहीं सकते. लेकिन हम जो कर सकते हैं, वह यह कि अपने भविष्य की नई परिभाषा रचने के लिए साथ मिलकर काम कर सकते हैं. आज हमें जिस चीज की जरूरत है, वह पाकिस्तान के साथ दोस्ती नहीं, बल्कि दोनों देशों की एक-दूसरे पर व्यापारिक और राजनीतिक निर्भरता है. हर बार जब पाकिस्तान आतंक से हिल उठता है और लोग मारे जाते हैं, हर बार वह इस बात की चेतावनी होती है कि शांति अब कोई विकल्प भर नहीं है. अब शांति ही हम दोनों के लिए एकमात्र रास्ता है. हम निवेश के अरबों डॉलर खो रहे हैं क्योंकि एक के बाद एक राष्ट्र अपने नागरिकों को हमारे देशों में न आने की ताकीद कर रहे हैं. इसके बावजूद भारत उन गिनी-चुनी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जो पश्चिम को उनके निवेश के बदले में अतिरिक्त मुनाफा दे सकता है. पश्चिम इसी अतिरिक्त मुनाफे के लिए लालायित भी है.

यूरोप की अर्थव्यवस्था हाशिए पर लडख़ड़ा रही है. अमरीका बहुत तेजी से तीसरी दुनिया जैसा दिखाई देने लगा है. अगर हम थोड़ी देर के लिए अपने मतभेद एक किनारे रख दें, हिंसा पर काबू करें और इस उपमहाद्वीप की अर्थव्यवस्था को मजबूत करें, तो हम अतीत की बाल की खाल निकालने के बजाय फिर से अपना भविष्य रच सकते हैं. हमें सैन्य सहायता की जरूरत नहीं है. हमें पश्चिम का उपदेश नहीं चाहिए. हमें सिर्फ इस बात का अहसास करने की जरूरत है कि जब हमारे लोगों को भोजन, नौकरी, शिक्षा और स्वास्थ्य की जरूरत है तो हम लोग मनमुटावों और मतभेदों का बोझ नहीं उठा सकते. ये तभी मुमकिन है, जब हम नई अर्थव्यवस्था का निर्माण करें, न कि काल्पनिक युद्ध लड़ते रहें.

13.05.2010, 00.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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