पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > गीताश्री Print | Send to Friend | Share This 

ये धुआं-सा यहां से उठता है

मुद्दा

 

ये धुआं-सा यहां से उठता है

गीताश्री

14 वर्षीय नगीन पड़वार इस भरी गरमी में घने जंगल से लौटा है. इन दिनों हर रोज वह सुबह-सुबह जान जोखिम में डाल कर जंगल में निकल जाता है और लौटता है तब उसके हाथ में होता है तेंदुपत्ता जिसके एवज में उसे मामूली सी रकम थमा दी जाती है. वह 50-50 पत्तियों का एक बंडल बनाता है और हर बंडल पर उसे मिलते है मात्र 55 पैसे. ऐसे ना जाने कितने नगीन पड़वार है, जो तेंदूपत्ते की खोज में छह साल की उम्र से ही जंगल की खाक छानते रहते हैं और कई बार जंगली जानवरो के शिकार तक हो जाते हैं. उनका पता तक नहीं चलता.

मध्य प्रदेश के बालाघाट में रहने वाले सुनील की मां सगुन बाई सुबह 4 बजे ही तेंदुपत्ते की खोज में जंगल निकल जाती है. घने जंगल के भीतर 15-20 किलोमीटर का सफर तय करती है. दिन भर की कमाई इतनी नहीं होती कि परिवार का पेट भर सके. इसीलिए परिवार के हरेक सदस्य को अलग अलग दिशाओं में जाना पड़ता है. ज्यादातर बच्चे इस काम में लगा दिए जाते हैं. इनकी एक घंटे की कमाई का औसत निकाला जाए तो बमुश्किल एक रुपया बैठता है. यह कमाई भी सिर्फ मार्च से लेकर मई महीने तक ही होती है. इसके बाद यह कमाई भी कम होने लगती है.

बालाघाट के आसपास के गांवों में रहने वालों की आजीविका तेंदूपत्ता की कमाई पर टिकी है. शोषण की गंध यहां की फिज़ा में भरी पड़ी है. इस इलाके में तंबाकू उधोग का अध्ययन करने पर भयावह सच्चाईयों का खुलासा होता है. तेंदुपत्ता तोडऩे वाले, बीड़ी बनाने वाले और तंबाकू की खेती करने वाले परिवारों को पता नहीं कि वे शोषण और मौत के किस भयानक जाल में फंस चुके हैं.

दुनिया के प्रमुख उत्पादक देश भारत में अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए लाखों लोग तंबाकू उत्पादन और इसके उत्पादों को बनाने के काम से जुड़े हुए हैं. ये लोग बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, काम के बदले उन्हें काफी कम मजदूरी मिलती है. वे पेट भरने के लिए अपने स्वास्थ्य को जोखिम में डालते ही हैं साथ हीं वे स्वास्थ्य सुविधाओं एवं मजदूर के रूप में अधिकारों से वंचित हैं. वे जीवन भर गरीबी और कर्ज के दुश्चक्र में पिसते रहते हैं.

बीड़ी पत्ते के साथ सुलगती जिंदगी
गरीबी और तंबाकू के सेवन के बीच गहरे संबंधों को उजागर करने के लिए वोलंटरी हैल्थ एसोसिएशन आफ इंडिया (वीएचएआई) ने भी भारत में तंबाकू उद्योग में काम करने वाले लोगों की माली हालत पर शोध किया. इस अध्ययन का मुख्य मकसद तंबाकू की खेती, बीड़ी बनाने और तेंदुपत्ता तोडऩे के तंबाकू उद्योग के कार्यों के माध्यम से तंबाकू और गरीबी के बीच गहरे संबंध के तीन अलग-अलग पहलुओं को उज़ागर करना था. यह अध्ययन उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड में बीड़ी बनाने वालों, सीमांत तंबाकू किसानों और तेंदु पत्ता तोडऩे वालो के बीच किया गया. हालात सब जगह कमोबेश एक से हैं. शोषण और कमाई का वहीं आलम है.

इस अध्ययन के चौंकाने वाले निष्कर्ष सामने आए. सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि बीड़ी बनाने वाले, तंबाकू की खेती से जुड़े और तेंदुपत्ता तोडऩे वाले मजदूरों का बड़े पैमाने पर आर्थिक रूप से शोषण किया जाता है. उन्हें मजदूर के रूप में कोई अधिकार या सुविधा प्राप्त नहीं है और वे बेहद गरीबी में दयनीय परिस्थितियों में रहने के लिए बाध्य है. इस वजह से तत्काल तंबाकू उद्योग में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा और व्यावहारिकता के मिथक को तार-तार करने और वैज्ञानिक प्रमाणों के माध्यम से तंबाकू उद्योग द्वारा इस बारे में किए जाने वाले दावों की हवा निकालने के सख्त आवश्यकता है. इससे दयनीय स्थिति में रहने वाले लाखों शोषित मजदूरों की रक्षा के लिए सरकारी नीतियों में आवश्यक बदलाव का रास्ता साफ होगा.

अध्ययन से इस बात का भी खुलासा हुआ कि तंबाकू उद्योग में अधिकतर महिला और बाल मजदूर काम करते है. बीड़ी बनाने, तंबाकू की खेती करने और तेंदु पत्ता तोडऩे के काम में बड़े पैमाने पर बच्चों का इस्तेमाल होता है. भारत में बाल मजदूरी पर हालांकि पाबंदी है लेकिन चोरी-छिपे तंबाकू उद्योग में हजारों-लाखों बच्चे काम कर रहे हैं. इसके बदले उन्हें मजदूरी भी नहीं दी जाती है. काम करने की वजह से इन बच्चों को पढ़ाई-लिखाई, खेलने के लिए खाली समय तथा सामान्य विकास से वंचित रहना पड़ता है.

सरकार को बीड़ी मजदूरों और बाल मजदूरों से जुड़े कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए कदम उठाना चाहिए ताकि उनके काम करने के माहौल में सुधार हो सके और उन्हें अधिकार मिल सके.


अध्ययन का चौंकाने वाला एक तथ्य यह भी है कि छोटे किसान तंबाकू की खेती कर दिनोदिन और गरीब होते जा रहे हैं. तंबाकू एक प्रमुख नगदी फसल है और देश के लगभग 15 राज्यों में इसकी खेती होती है. तंबाकू की खेती करने वाले अधिकतर किसान या तो भूमिहीन किसान हैं या फिर सीमांत किसान. ये किसान अमीर लोगों और तंबाकू कंपनियों के लिए तंबाकू की खेती करते है. लेकिन इनमें से अधिकतर किसानों को न तो तंबाकू की खेती से कोई लाभ होता है और न ही वे इसकी लागत निकाल पाते हैं क्योंकि तंबाकू की खेती महंगी होती है और लागत अधिक.

मौसमी काम
तंबाकू की फसल की देखभाल करने, खाद डालने और कीटनाशकों का छिडक़ाव करने समेत इसकी संपूर्ण खेती प्रक्रिया में काफी पैसा खर्च होता है. लाभ नहीं होने या लागत नहीं निकलने से ये किसान कर्ज और गरीबी की दलदल में गहरे धंस जाते है. अध्ययन से खुलासा हुआ है कि तेंदु पत्ता तोडऩे और इससे लाभ कमाने का काम एक मौसमी काम है. इसलिए देश में तेंदु पत्ता तोडऩे वाले दो लाख से अधिक मजदूर वर्ष के खाली समय में रोजी-रोटी कमाने में किसी वैकल्पिक साधन से वंचित रह जाते है. इसके विपरीत मजदूरों को तेंदु पत्ता तोडऩे के लिए हर रोज 14-15 घंटे हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है और जंगल में अपनी जान जोखिम में डालनी भी पड़ती है. इसके मुकाबले उनकी कमाई बेहद मामूली ही होती है.

अध्ययन से यह भी पता चलता है कि ज्यादातर तंबाकू मजदूर अपना मौजूदा काम छोडक़र रोजी-रोटी कमाने का सुरक्षित और वैकल्पिक काम करना चाहते हैं, क्योंकि तंबाकू मजदूर के रूप में वे कभी न खत्म होने वाली गरीबी की दलदल में फंसे हुए हैं. इनमें से अधिकतर मजदूर इस स्थिति में भी तंबाकू उद्योग में काम करने को विवश हैं क्योंकि किसी अन्य हुनर या योग्यता या फिर रोजगार के वैकल्पिक अवसरों के अभाव में उनके पास रोजी-रोटी कमाने का कोई विकल्प नहीं है.

प्रमुख सिफारिशें :
1. अध्ययन में तंबाकू मजदूरों की आजीविका के लिए सुरक्षित वैकल्पिक स्रोत तलाशने और पैदा करने की दिशा में काम करने के लिए एक राष्ट्रीय पहल शुरू करने की सिफारिश की गई है.

2. केंद्र सरकार के गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को लागू करना इन मजदूरों के लिए तात्कालिक वैकल्पिक हल हो सकता है. इसमें दूरदर्शिता होनी चाहिए जिससे इसका लाभ मजदूरों की अगली पीढ़ी को भी मिल सके ताकि उन्हें किसी भी स्थिति में फिर से तंबाकू मजदूर बनाने के लिए विवश नहीं किया जा सके.

3. मजदूरों के हितों और स्थानीय बाजार की जरूरतों का आकलन कर तंबाकू मजदूरों को वैकल्पिक रोजगारों और व्यावसायिक प्रशिक्षणों से जोडऩे में सरकार को अहम भूमिका निभानी चाहिए.

4. तंबाकू मजदूरों को पुनर्वासित करने के समय समुदाय की इच्छाओं-उम्मीदों को ध्यान में रखना चाहिए. इसके अलावा तंबाकू उद्योग से जुड़े मजदूरों की जीवनशैली को भी ध्यान में रखना चाहिए.

5. बीड़ी उद्योग को नियंत्रित करने की आवश्यकता है जो पूरी तरह असंगठित है. इसके लिए सरकार को बीड़ी कंपनियों का पंजीकरण करना चाहिए और मजदूरों को कानूनी अधिकार दिया जाना चाहिए.

6. सरकार को बीड़ी मजदूरों और बाल मजदूरों से जुड़े कानूनों को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए कदम उठाना चाहिए ताकि उनके काम करने के माहौल में सुधार हो सके और उन्हें अपना अधिकार मिल सके.

7. तंबाकू किसानों को तंबाकू की खेती के बुरे परिणामों की जानकारी देने की आवश्यकता है.

8. तंबाकू किसानों को उन वैकल्पिक फसलों के बारे में बताया जाना चाहिए जिनसे उन्हें तंबाकू के मुकाबले ज्यादा आमदनी हो सके.

9. एक तरफ तंबाकू उत्पादन को बढ़ावा देने और दूसरी तरफ तंबाकू नियंत्रण की दोहरी और अंतर्विरोधी नीति को हतोत्साहित किया जाना चाहिए. सरकार को चरणबद्घ तरीके से तंबाकू के शोध के लिए अनुदान और इसकी खेती पर सब्सिडी रोकने के लिए कदम उठाना चाहिए.

22.05.2010, 00.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in