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रोजगार गारंटी योजना पर जनता की नजर-संदीप पांडेय

सरकारी योजना पर जनता की नज़र

 

संदीप पांडेय


 

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट 2005 नागरिकों को इस एक्ट के अधीन किए गए कार्य का सोशल ऑडिट करने का अधिकार प्रदान करता है. इस एक्ट के लागू होने से पहले तक नागरिकों के पास संबंधित अधिकारी के समक्ष कमियों और अभावों के बारे में शिकायत करने के अलावा और कोई चारा नहीं था.

अब यह उस अधिकारी के विवेक पर निर्भर करता कि वह शिकायत का संज्ञान लेते हुए इस पर कार्रवाई करे या फिर इसे कूड़ेदान में डाल दे. नागरिक महज मूकदर्शक थे और शिकायत पर कार्रवाई करना या इससे आंख फेर लेना यह अधिकारियों का विशेषाधिकार था. इस लिहाज से ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट के तहत चल रहे विकास कार्यों का आम नागरिकों द्वारा सोशल ऑडिट करने का अधिकार भारतीय लोकतंत्र में एक क्रांतिकारी कदम है. हो सकता है आगे चलकर लोग सरकार के अन्य विकास कार्यक्रमों के लिए भी इसी तरह के सोशल ऑडिट के आयोजन की मांग करने लगें.

एक्ट के अधीन रोजगार गारंटी योजना के तहत हुए कामकाज से संबंधित जानकारी वास्तविक कीमत पर 7 दिनों के भीतर मुहैया कराई जानी चाहिए, लेकिन क्या यह तब भी जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की जीत कही जाए जबकि उन्हें यह जानकारी एक-डेढ़ साल बाद मिले!


भारत में प्रशासनिक कामकाज का तरीका यह है कि सत्ता में रहने वाले लोगों के प्रति खुद को जवाबदेह महसूस नहीं करते. सरकारी मशीनरी से जुड़े लोग सोचते हैं कि काम करना, निर्णय करना और जनता के खजाने को खर्च करना उनके विशेष अधिकारों के तहत आता है. इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि लोगों द्वारा विभिन्न योजनाओं से संबंधित अधिकारियों और सरकारी विभागों से जानकारी मांगने से अधिकारी भारी दबाव में आ गए हैं. वे इस तरह से जवाबदेही लेने के आदी नहीं हैं.

इस दिशा में पहला कदम उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले के एक निवासी यशवंत राव ने उठाया. उसने 4 दिसंबर 2006 को सूचना का अधिकार कानून(आरटीआई) का इस्तेमाल करते हुए मियागंज के ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर से रोजगार गारंटी योजना के तहत हुए कामकाज की जानकारी मांगी. सकारात्मक जवाब न मिलने पर उसने यूपी स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन के समक्ष एक शिकायत दर्ज करा दी. इसके बाद उसे ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर की ओर से एक पत्र मिला, जिसमें उससे वांछित दस्तावेज की कॉपी पाने के लिए 1,58,400 रुपए जमा करने के लिए कहा गया था.

आरटीआई एक्ट के तहत यदि एक महीने के भीतर जानकारी मुहैया कराई जाती है तो ग्राही को 2 रुपए प्रति पेज के हिसाब से जमा करने होते हैं, लेकिन ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर ने 66 ग्राम पंचायतों में एनआरईजीएस के तहत हुए कामकाज की जानकारी मुहैया कराने के लिए मनमाने ढंग से 2400 रुपए प्रति ग्राम पंचायत के लिहाज से तय कर दिए. यूपी स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन के समक्ष एक साल से ज्यादा समय तक चले इस केस में 10 सुनवाइयों के बाद आखिरकार ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर को आवेदक यशवंत को समस्त जानकारी मुफ्त में मुहैया कराने का आदेश दिया गया. अप्रैल 2008 में 66 में से 65 ग्राम पंचायतों में एनआरईजीएस कामकाज की जानकारी आखिरकार यशवंत को मुहैया कराई गई.

यद्यपि एक्ट के अधीन रोजगार गारंटी योजना के तहत हुए कामकाज से संबंधित जानकारी वास्तविक कीमत पर 7 दिनों के भीतर मुहैया कराई जानी चाहिए, लेकिन क्या यह तब भी जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की जीत कही जाए जबकि उन्हें यह जानकारी एक-डेढ़ साल बाद मिले! अधिकारियों ने हर कदम पर इस प्रक्रिया को रोकने या लटकाने की अपनी ओर से हरसंभव कोशिश की लेकिन आखिरकार उन्हें एनआरईजीए और आरटीआई एक्ट के अधीन कानूनी प्रावधानों का अनुसरण करना ही पड़ा.

यह देखते हुए मियागंज ब्लॉक के स्थानीय लोगों और दूसरे नागरिकों ने सामाजिक संगठनों की मदद से मई में सभी ग्राम पंचायतों में अधिकारियों द्वारा कामकाज से संबंधित मुहैया कराई गई जानकारियों के प्रमाणन के लिए सोशल ऑडिट करना शुरू कर दिया. इस इलाके में अब तक इस तरह की लोकतांत्रिक और अधिकारपूर्ण कार्रवाई देखने या सुनने को नहीं मिली.

इस सोशल ऑडिट में उत्तर प्रदेश के लखनऊ, हरदोई, कानपुर, बनारस, गाजीपुर और बलिया जैसे दूसरे शहरों के नागरिकों के अलावा हरियाणा और राजस्थान के कुछ लोगों ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया और तकरीबन 100 लोगों के नेतृत्व में उन्नाव के मियागंज ब्लॉक के ब्लॉक डेपलपमेंट ऑफिस में सोशल ऑडिट का यह काम संपन्न हुआ. यह सारी कवायद 21 से 26 मई तक छह दिन तक लगातार चली और इसके आखिर में तकरीबन 1000 लोग यह सुनने के लिए जुटे कि सोशल ऑडिट के पास इस ब्लॉक की 66 में से 58 ग्राम पंचायतों का भ्रमण करने के बाद आखिर कहने के लिए क्या है. कई राज्य व जिलास्तरीय अधिकारियों के अलावा अनेक ग्राम पंचायतों के मुखिया भी इस सार्वजनिक सुनवाई के दौरान उपस्थित थे.

दस टीमों ने इन ग्राम पंचायतों में छह दिन बिताए. इस दौरान उन्होंने ग्रामीणों से बातचीत की और कार्यस्थलों का निरीक्षण किया. आम निष्कर्ष यही निकलकर सामने आए कि लोग इस एक्ट के प्रावधानों के बारे में नहीं जानते थे और प्रशासन लोगों को जागरूक करने के लिए कुछ खास नहीं कर रहा था.

कामगारों के हाथ में जॉब कार्डस नहीं थे (ज्यादातर गांवों में इन्हें सोश्यल ऑडिट टीम के पहुंचने से ठीक पहले बांटा गया) मस्टर रोल्स और जॉब कार्डस में कामगारों के दिनों को बढ़ा-चढ़ाकर दर्ज किया गया और वृक्षारोपण के काम में व्यापक पैमाने पर धांधली नजर आई. एकमात्र अच्छी बात यह थी कि न्यूनतम मजदूरी के हिसाब से मजदूरों को पूरा भुगतान किया गया. हालांकि इसे काम के दिनों की संख्या को बढ़ाकर बराबर कर दिया गया जिसका मतलब था कि दिनों के साथ-साथ कामगारों की मजदूरी का भी नुकसान.

अधिकारियों ने इस बात की तारीफ की कि लोग खुलकर बोल रहे थे. यद्यपि ऑडिट के दौरान ग्राम प्रधानों ने धमकी दी कि यदि सोशल ऑडिट में उन्हें नीचा दिखाया गया तो वे इस रोजगार गारंटी योजना से अलग हो जाएंगे. वास्तव में शुरुआती चार दिन ग्राम प्रधानों ने न सिर्फ ग्रामीणों और ऑडिट टीम को धमकाया, बल्कि उन्होंने इस प्रक्रिया में अड़ंगा डालने की भी कोशिश की. हालांकि बाद में ज्यादातर प्रधानों को समझ में आ गया कि इस योजना के सोशल ऑडिट का मूल उद्देश्य पथभ्रष्ट ग्राम प्रधानों के खिलाफ कोई कदम उठाना नहीं है, वरन यह समझना है कि इस योजना से क्या उम्मीद थी. उन्होंने लोकतंत्र और लोगों के अधिकार के बारे में पूरी आस्था जताई और ऑडिट में सहयोग का आश्वासन दिया.

 

18.06.2008, 22.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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