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खबरों का कारोबार

बात पते की

 

खबरों का कारोबार

प्रीतीश नंदी

इन खबरों की उम्र इससे पहले कभी इतनी कम नहीं थी. जो खबर जितनी बड़ी होती है, वह उतनी ही जल्दी पुरानी भी हो जाती है. कोई उससे भी बड़ी या बुरी खबर तत्काल उसकी जगह ले लेती है. बीते शनिवार हुआ हवाई हादसा इसका सबसे अच्छा उदाहरण है.

खबरिया चैनलों पर हेडलाइनों का शोरगुल और चौबीस घंटे का कवरेज अगले दिन अखबारों के पहले पन्ने पर आठ कॉलम की खबर बनते ही खत्म हो जाता है. आप कुछ समझ पाएं, उससे पहले ही हादसा, 158 मौतें, हादसे में बचे लोग, सबकुछ महज आंकड़ों का खेल बनकर रह जाते हैं. भीषण मानवीय त्रासदी की जगह जल्द ही कोई और ले लेता है. जीवन का पहिया चलता रहता है और इसके साथ ही खबरों और दुखों का पहिया भी चलता रहता है. कुछ लोग इसे नसीब कहते हैं तो कुछ जिंदगी. लेकिन शायद यह केवल कारोबार है. खबरों का कारोबार.

खबरों की यह नश्वरता केवल त्रासदियों के लिए ही नहीं है, मानवीय उद्यम की भी इसके सामने कोई बिसात नहीं. जिस शनिवार को हवाई हादसा हुआ था, उसी दिन दिल्ली के एक बमुश्किल 16 वर्षीय किशोर ने दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का कारनामा कर दिखाया. यह शानदार उपलब्धि थी. वह लड़का एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाला दुनिया का सबसे कम उम्र का पर्वतारोही बन गया. जब एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे दुनिया के इस सर्वोच्च पर्वत शिखर पर पहुंचे थे तो वे महीनों सुर्खियों में रहे थे. सर एडमंड हिलेरी तो आजीवन अपनी उस उपलब्धि का यश पाते रहे. यही स्थिति उनके साथी तेनजिंग नोर्गे की भी थी, जिन्हें आज तक किंवदंती माना जाता है.

लेकिन वह 16 वर्षीय किशोर अजरुन वाजपेयी इतना भाग्यशाली नहीं था. उसके द्वारा यह उपलब्धि हासिल करने के घंटे भर के भीतर ही कैलिफोर्निया का एक अन्य 13 वर्षीय लड़का जोर्डन रोमेरो एवरेस्ट की ऊंचाई तक जा पहुंचा. उसने शिखर तक का सफर और भी दुर्गम रास्ते से तय किया था. लेकिन अगले दिन के अखबारों की सुर्खियों में मैंगलोर का हवाई हादसा था और अजरुन वाजपेयी और जोर्डन रोमेरो की उपलब्धियों को पेज 13 पर जरा सी जगह दी गई.

अधिकांश लोगों को तो यह भी नहीं पता था कि अजरुन ने 18 वर्षीय कृष्णा पाटिल का रिकॉर्ड तोड़ा था, जिसने बीते साल ही एवरेस्ट पर चढ़ने की उपलब्धि हासिल की थी. मजे की बात तो यह है कि अजरुन के पहुंचने के चार घंटे बाद ही ममता सोढा भी एवरेस्ट की चोटी तक पहुंच गईं. इसी माह के प्रारंभ में दो अन्य भारतीय भी यह उपलब्धि हासिल कर चुके थे. शायद इसी को एंडी वारहोल ने ‘चंद लम्हों की चांदनी और फिर गुमनामी का अंधेरा’ कहा था.

आज खबरों की भी यही स्थिति है: तुरत-फुरत और क्षणभंगुर. इससे पहले कि हम किसी खबर की हकीकत पूरी तरह जान सकें, वह बासी हो चुकी होती है. फिर चाहे वह कोई मानवीय त्रासदी हो, नृशंस अपराध या शानदार उपलब्धि, खबरों के इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है. आपको पलभर में खबर को पकड़ना होगा, नहीं तो आप उसे चूक जाएंगे. भारत के जो लोग अभी विदेश यात्रा पर हैं, मान लीजिए यदि वे हफ्ते भर बाद लौटते हैं तो संभव है उन्हें हवाई हादसे की खबर ही पता न चले. या यदि उन्हें इसकी खबर लगती भी है तो शायद उसका असर जाता रहे. यदि वे मेरी तरह यात्रा से लौटने पर पुराने अखबारों के पन्ने टटोलते हैं तो शायद वे इस खबर पर थोड़ा सा अफसोस जताकर आगे बढ़ जाएंगे.

आज खबरों का मिजाज जितना बदला है, उतना ही बदलाव हमारी प्रतिक्रियाओं में भी आया है. हम अपनी सुविधा से आरोपी तय करते हैं और उतनी ही आसानी से उसकी सज़ा की मांग भी करने लगते हैं.

मैं यह नहीं कह रहा कि अब लोगों की संवेदनाएं पूरी तरह मर चुकी हैं. यकीनन ऐसा नहीं है. वे अब भी मानवीय त्रासदी को समझते और उसके दर्द को महसूस करते हैं. आज दुनिया को बदलने के लिए जितने स्वयंसेवी संगठन काम कर रहे हैं, उतने पहले कभी नहीं थे. लेकिन खबरों का चरित्र अब बदल गया है और इसी के साथ बदल गई हैं खबरों पर हमारी प्रतिक्रियाएं.

मैं अक्सर ट्विटर पर लोगों को शिकायत करते पाता हूं कि आजकल जिस तरह खबरें कवर की जाती हैं, वह तरीका उचित नहीं है. उन्हें पत्रकारों और खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों की संवेदनहीनता पर सबसे ज्यादा एतराज है. शायद यह सच है, क्योंकि ऐसी शिकायतें अब आम हो चली हैं. लेकिन क्या हमें किसी डॉक्टर को इस बात के लिए दोष देना चाहिए कि वह इंसानी मौतों के प्रति संवेदनशील नहीं रह गया है, क्योंकि वह रोजाना इस तरह के दृश्यों से दो-चार होता है. दरअसल अपनी इस ‘संवेदनहीनता’ के चलते ही डॉक्टर अपना काम बखूबी कर पाते हैं.

हमें डॉक्टर से इलाज की अपेक्षा रहती है, करुणा की नहीं. मदर टेरेसा इसीलिए महान थीं कि उन्होंने न केवल गरीबों और मरणासन्नों की पीड़ा को महसूस किया, जैसा कि हम सभी करते हैं, बल्कि पीड़ा के उस एहसास को दरकिनार करते हुए उनके लिए काम भी किया. अच्छा डॉक्टर भी यही करता है और अच्छे पत्रकार को भी यही करना चाहिए.

आज खबरों का मिजाज जितना बदला है, उतना ही बदलाव हमारी प्रतिक्रियाओं में भी आया है. हम बहुत आसानी से दुख से भर जाते हैं, हम बहुत आसानी से गुस्से में आ जाते हैं, हम बहुत आसानी से सजा की मांग करने लगते हैं. खबरों की राजनीति इसका बड़ी चतुराई से इस्तेमाल करती है.

कोई अपराध होता है या कोई आतंकवादी हमला होता है और हम तत्काल अपराधी को सजा देने की मांग करने लगते हैं. इस परिस्थिति में सबसे सरल उपाय क्या होगा? यही ना कि किसी को भी सामने खड़ा कर दिया जाए और सारा गुनाह उसके माथे मढ़ दिया जाए.

ऐसी परिस्थितियों में गंभीर जांच के लिए गुंजाइश ही कहां रह जाती है? सभी को तुरत-फुरत समाधान चाहिए. कोई भी इस पर ध्यान नहीं देता कि किस तरह मुकदमे अंतत: अदालतों से खारिज हो जाते हैं, किस तरह पुख्ता सबूतों के अभाव में लोग छूट जाते हैं, किस तरह लोगों की जिंदगियों और भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जाता है. जब भारत टी-20 विश्वकप में हारता है तो हम तत्काल धोनी से कप्तानी छीन लेने की मांग करने लगते हैं. अतीत में उसके द्वारा हासिल तमाम उपलब्धियां भुला दी जाती हैं. जब युवराज खराब खेल दिखाता है तो हम उसका बेहतरीन ट्रैक रिकॉर्ड भूल जाते हैं और लेट नाइट पार्टियों में जाने के लिए उसे सजा देना चाहते हैं.

यदि ऐसा ही चलता रहा तो मुझे डर है कि हम न केवल अपने न्याय के लक्ष्य नहीं पा सकेंगे, बल्कि अपने नायकों को भी खो देंगे. सिवाय उन लोगों के, जो जानते हैं कि मीडिया का इस्तेमाल कैसे किया जाता है.

27.05.2010, 09.47 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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