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नहीं की ताकत

विचार

 

नहीं की ताकत

प्रीतीश नंदी


हैरानी है कि आखिर एक छोटे से शब्द में कितनी ताकत हो सकती है. ‘नहीं’ दो अक्षरों से बना शब्द है, लेकिन इसी छोटे से शब्द ने हर बार हमारी राजनीति की दशा और दिशा नए सिरे से तय करने की जिम्मेदारी निभाई है. पश्चिम बंगाल का ही उदाहरण ले लें. हाल ही में हुए चुनावों में जीत के बाद ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल के रहवासियों की अपेक्षाओं पर खरी उतरें चाहे नहीं, एक बात साफ है.

मतदाताओं की दो टूक ‘ना’ ने ममता की जीत का रास्ता साफ कर दिया और माकपा को तीन दशकों के राज के बाद यह संदेश दिया कि अब बोरिया-बिस्तर बांधने का वक्त आ गया है. अब वामपंथी चाहे जितना शोरगुल मचाएं और दुनिया भर को बताते फिरें कि ममता माओवादियों के समर्थन में हैं, इससे कुछ होना-जाना नहीं है. एक बार जनता ‘ना’ बोल दे तो फिर उसके बाद कोई दलील काम नहीं करती.

लेकिन यह पहली दफे नहीं हुआ है. मैंने पहले भी यह होते देखा है. इंदिरा गांधी ने जब 1971 में याह्या खान को मात दी थी और पूर्वी पाकिस्तान से पाकिस्तान को बेदखल कर दिया था, तब वे पूरे देश की आंखों का तारा बन गई थीं. पूर्वी पाकिस्तान अब गर्वीला, स्वतंत्र बांग्लादेश था. मैं उन तमाम घटनाओं का आंखों देखा गवाह रहा हूं. 1971 के युद्ध के वक्त मैं ढाका में ही था. इसमें कोई शक नहीं कि इंदिरा गांधी फौलादी इरादों की महिला थीं. लेकिन चार साल बाद जब उन्हीं इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया तो इससे पहले के उनके सारे किए-धरे पर पानी फिर गया.

आपातकाल सीधे-सीधे जनभावनाओं का अपमान था. नतीजा यह रहा कि बिखरे हुए विपक्ष को चंद हफ्तों में ही ‘इंदिरा हटाओ’ का साझा नारा मिल गया. दुर्गा की महिमामंडित छवि रातोंरात जाती रही. अवाम ने उनसे मुंह फेर लिया. 1977 के आम चुनावों में न सिर्फ कांग्रेस को जोरदार शिकस्त का सामना करना पड़ा, बल्कि खुद इंदिरा गांधी चुनाव नहीं जीत सकीं. उन्हें हराने वाला कोई नामी नेता नहीं, राज नारायण नामक एक मामूली सा राजनेता था. यह ‘ना’ की ताकत थी. हिंदुस्तान की अवाम ने इंदिरा गांधी और उनकी आपातकालीन सियासत को सिरे से नकार दिया था.

राजीव गांधी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वे भारी बहुमत के साथ (उनके नेतृत्व में कांग्रेस को 1984 के आम चुनाव में 542 में से 411 सीटें मिली थीं) सत्ता में आए, लेकिन बोफोर्स कांड और उसके बाद हुए घोटालों की श्रंखला ने उनकी सरकार का भट्टा बिठा दिया. 1989 के आम चुनावों में जब राजीव गांधी ने सत्ता में वापसी का दावा किया तो उसी जनता ने उन्हें नकार दिया, जिसने इतने प्यार और सहानुभूति के साथ उनकी ताजपोशी की थी. वे चुनाव हारे और उन्हें एक ऐसे आदमी के लिए अपना सिंहासन खाली करना पड़ा, जिससे वे नफरत करते थे और जिसे उन्होंने एक दफे विश्वासघाती तक पुकारा था. लेकिन वीपी सिंह भी ज्यादा दिन सत्ता में नहीं बने रह सके. उन्होंने अपने इर्द-गिर्द मक्कारों की फौज खड़ी कर ली, जो उन्हें राजीव गांधी से विरासत में मिली थी. एक साल पूरा होते-न-होते उनकी भी विदाई हो गई. उनके स्थान पर अब चंद्रशेखर सत्ता के शीर्ष पर थे.

क्या बदलाव के लिए वाकई कोई तात्कालिक कारण जरूरी है? हां, कभी-कभी ऐसा हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसा हमेशा हो. बदलाव खुद-ब-खुद अपने लिए जगह तलाश लेता है

भारतीय राजनीति में ‘ना’ बेहद ताकतवर शब्द रहा है. जब लोग ‘ना’ बोलते हैं तो फिर वे नतीजों की परवाह नहीं करते. तब उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि ममता माओवादियों के समर्थन में हैं या नहीं. इंदिरा गांधी ने भी जब चेताया था कि जनता पार्टी सत्ता में ज्यादा समय नहीं बनी रहेगी, तब उनकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया था. आपातकाल से आजिज आ चुकी जनता चुनाव से पहले ही उन्हें बेदखल करने का फैसला कर चुकी थी. राजीव गांधी ने भी समझाने की खूब कोशिश की कि वीपी सिंह के पास देश को देने के लिए कुछ नहीं है और उनकी पूरी राजनीति महज कांग्रेस से नफरत पर आधारित है. लेकिन क्या उनकी बात सुनी गई? नहीं. राजीव गांधी के बाद देश ने राजनीतिक अस्थिरता का लंबा दौर झेला क्योंकि तीसरा मोर्चा कभी भी सत्ता संभालने में सक्षम साबित नहीं हो सका. लेकिन जनादेश कांग्रेस के खिलाफ था. अवाम का यही फैसला था.

देश की जनता ने कांग्रेस को सबक सिखाया था. फिर उसने भाजपा को सबक सिखाया और अब वामपंथियों की बारी है. जब मतदाताओं के धर्य की परीक्षा ली जाने लगती है तो वे परिणामों की परवाह नहीं करते और ‘ना’ कह देते हैं. ऐसा नहीं है कि हम अपने राजनेताओं को मौका नहीं देते. हम उन्हें पर्याप्त अवसर देते हैं, लेकिन जब हम उनसे निराश हो जाते हैं तो उन्हें नकारने में भी देर नहीं लगाते. देवेगौड़ा ने तमाम हथकंडे अपना लिए थे, लेकिन कुर्सी नहीं बचा पाए.

वीपी सिंह उनसे ज्यादा समझदार साबित हुए. वे स्वघोषित वनवास पर चले गए. उन्हें लगा होगा कि शायद इसी तरह वे सत्ता में वापसी कर सकेंगे, लेकिन यह जुगत भी काम नहीं आई. लालकृष्ण आडवाणी भी चाहे जितनी कोशिश कर लें, लेकिन संभावना कम ही है कि वे कभी वापसी कर सकेंगे. लालू का भी यही हाल है. भारत तो दूर, अब तो बिहार ने भी उन्हें भुला दिया है. क्या आपको रामविलास पासवान की याद है? उनके नाम सबसे ज्यादा मतों के अंतर से चुनाव जीतने का रिकॉर्ड था. इसके लिए उनका नाम गिनीज बुक में भी शामिल किया गया. क्या किसी को पता है कि आज वे कहां हैं?

मेरा मानना है कि जनता के असंतोष को पहचानना इतना मुश्किल नहीं होता. चुनाव में ‘ना’ कह देने से काफी पहले ही उसकी ना को महसूस किया जा सकता है. लेकिन सत्ता के मद में चूर अधिकांश नेता अपने में इतने खोए रहते हैं कि वे असंतोष की लहर को महसूस नहीं कर पाते. उन्हें लगता है कि वे अपराजेय हैं, लेकिन चुनाव होते हैं और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. उनकी तमाम धन-दौलत, सत्ता, रसूख, कुछ भी काम नहीं आता. उनका शाही महल ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता है.

क्या बदलाव के लिए वाकई कोई तात्कालिक कारण जरूरी है? हां, कभी-कभी ऐसा हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसा हमेशा हो. कोई घोटाला, कोई कांड, कोई आपातकाल, कोई नंदीग्राम, गरीबी हटाओ या इंडिया शाइनिंग जैसा कोई मूर्खतापूर्ण नारा, कुछ भी सत्ता से विदाई का कारण बन सकता है. सभी को पहले पता चल जाता है कि अवाम का रुख किस दिशा में करवट बदल रहा है, सिवाय उनके जो सत्ता में हैं. सच्चाई तो यह है कि लोग कोई ठोस वजह पाने से काफी पहले ही ‘ना’ कह देने का मन बना चुके होते हैं. और जहां तक बदलाव का सवाल है तो वह खुद-ब-खुद अपनी जगह तलाश लेता है. बदलाव की लहर को अपनी मंजिल तलाशने में कभी नाकामी का सामना नहीं करना पड़ता.

10.06.2010, 10.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bhagat singh raipur c.g.

 
 न में बहुत ताकत होती हैं, आप पूरे आर्टिकल में एक न भूल गए, वो थी एडीए सरकार की, उन्हें तो इस न का अंदाज़ ही नहीं हुआ, और वे भरी अंतर से चले गए. 
   
 

tarun mishra (tarunmishra75@gmail.com) jabalpur, mp

 
 ना की विस्तारवादी व्याख्या अच्छी लगी.Personally भी न कहने की आदत पड़ जाए तो खुद का भी कल्याण निश्चित है. 
   
 

sunder lohia (lohiasunder2 @gmail.com) Mandi ( H.P}.

 
 पश्चिम बंगाल की जनता ने जो "ना" कहा है क्या उसमें ममता दीदी की माओवादियों के साथ मिलीभगत के लिए "हां" भी शामिल है? 
   

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