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यों हुई माओवादियों से बात

मुद्दा

यों हुई माओवादियों से बात

राजकिशोर

केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम अपने दफ्तर में आए ही थे कि उनका सचिव हड़बड़ाते हुए भीतर चला आया. चिदंबरम का सिर हलकी नाराजगी से ऊपर उठा, मानो किसी ऋषि की तपस्या में बाधा पड़ी हो. सचिव ने कहा, “सर, एक अर्जेंट मामला है.”

maoist government talk


चिदंबरम के चेहरे पर बढ़ रहा तनाव कह रहा था, “तुम अपनी बात कहो, गृह मंत्रालय में हर मामला अर्जेंट ही होता है.”

सचिव ने बताया, “अभी-अभी मेरे पास एक बड़े माओवादी नेता का फोन आया था. उसका कहना है, हम हिंसा त्यागने को तैयार हैं. हम अपने सारे हथियार भी सरेंडर कर देंगे.”

चिदंबरम के चेहरे पर संतोष के चिह्न उभरे. उन्होंने पूछा, “गुड. उनकी शर्त क्या है?”

सचिव ने जवाब दिया, “यह वे आपको ही बताएंगे. मुझसे उन्होंने इतना ही कहा कि गृह मंत्री राजी हों, तो हमसे बात कराएं. हम अपनी पूरी योजना उनसे ही डिस्कस करेंगे.”

गृह मंत्री थोड़ा सोच में पड़ गए. उनके मन में तरह-तरह के विचार आ-जा रहे थे. वे सोच रहे थे कि इस बीच ऐसी क्या बात हो गई कि नक्सलवादी झुकने को तैयार हो गए. कहीं यह नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में विमानों से बम वर्षा करने की उनके प्रस्ताव का नतीजा तो नहीं है? उनके मन में आशा जगी. बोले, “बात कराओ.”

सचिव ने सूचना दी, “फोन करनेवाले ने कहा है कि वे एक घंटे बाद खुद ही संपर्क करेंगे.”

चिदंबरम ने कहा, “ठीक है. जब फोन आए, तो कहना, मैं बातचीत करने के लिए तैयार हूं.”

सचिव के बाहर जाते ही गृह मंत्री ने प्रधानमंत्री का प्राइवेट नंबर मिलाया. लगभग पांच मिनट तक दोनों के बीच बात होती रही. फोन रखते हुए गृह मंत्री के चेहरे पर पर निश्चय और अनिश्चय, दोनों के चिह्न थे.

थोड़ी देर बाद सचिव फिर भीतर आया. उसके हाथ में मोबाइल फोन था. बोला, “सर, बात कीजिए.”

चिदंबरम ने कहा, “यह बड़ी खुशी की बात है कि आप लोग हिंसा त्यागने और हथियार सरेंडर करने के लिए तैयार हैं. मैं तो शुरू से ही यह अपील कर रहा हूं. आप चिंता न करें, हम आपके संगठन के प्रत्येक सदस्य का सम्मानजनक पुनर्वास करेंगे. उन्हें अपने-अपने क्षेत्र का विकास अधिकारी भी बनाया जा सकता है. वे अपने इलाके की समस्याओं से अच्छी तरह वाकिफ हैं. इसलिए वे विकास योजनाओं का संचालन अच्छी तरह से कर सकते हैं.”

गृह मंत्री को ऐसा लगा कि उनके चारे को दूरवर्ती मछली ने निगल लिया है. उधर से आवाज आई, “हमें आपका प्रस्ताव मंजूर है. लेकिन...”

गृह मंत्री की नाड़ी की रफ्तार दस प्रतिशत बढ़ गई. बोले, 'लेकिन...?'

फोन करनेवाले ने कहा, “हमारी बस एक ही शर्त है. शर्त यह है कि आपको हमारी पार्टी में शामिल होना होगा. हम आपको अपनी पार्टी का अध्यक्ष बना देंगे.”

चिदंबरम भौचक, “यह क्या मजाक है? मैं कांग्रेस छोड़ कर माओवादी पार्टी में शामिल हो जाऊं? असंभव. यह बात आपके दिमाग में आई कैसे?”

जवाब मिला, “यह असंभव कैसे है? हम भी आदिवासियों का विकास चाहते हैं, आप भी आदिवासियों का विकास चाहते हैं. आप कुछ दिनों तक हमारी पार्टी का अध्यक्ष बन कर आदिवासियों का संपूर्ण विकास करा दीजिए, उसके बाद कांग्रेस पार्टी में लौट जाइएगा. आदिवासी क्षेत्र का विकास हो जाने के बाद हम अपनी पार्टी भंग कर देंगे. देश की सुरक्षा को सबसे बड़ा खतरा हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा.”

गृह मंत्री ने कहा, “लेकिन आदिवासियों का विकास कुछ दिनों में कैसे संभव है? ये तो देश भर में सबसे ज्यादा पिछड़े हुए हैं. उन्हें औसत भारतीयों के बराबर लाने में पता नहीं कितना समय लगेगा. तब तक मैं जंगलों की खाक छानता फिरूं?”

फोन करनेवाले ने निश्चयात्मक स्वर में कहा, “ठीक है. तब तक हमीं जंगलों की छानते रहेंगे.”

गृह मंत्री विचलित हो उठे. उन्होंने अपनी आवाज को यथासंभव मुलायम करते हुए पूछा, “ क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आदिवासियों के विकास का काम हम दोनों मिल-जुल कर करें? आप ही कह रहे हैं कि हम दोनों आदिवासियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं.”

उधर से उत्तर मिला, “आपकी बात एकदम ठीक है. चलिए, ऐसा करते हैं कि आदिवासियों, खेतिहर मजदूरों और सीमांत किसानों के विकास के लिए एक राष्ट्रीय कोष स्थापित किया जाए और इस कोष से खर्च करने का अधिकार एक राष्ट्रीय बोर्ड को दे दिया जाए. इस बोर्ड के आधे सदस्य आपके होंगे और आधे हमारे. जो भी खर्च होगा, वह सर्वसहमति से होगा. हमारे इस प्रस्ताव पर आपको कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.”

मैं माओवादियों के प्रतिनिधि के रूप में बात कर रहा हूं, लेकिन आप भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में बात नहीं कर पा रहे हैं.


गृह मंत्री- “व्यक्तिगत रूप से मुझे तो कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन कैबिनेट इस तरह की किसी भी योजना को मंजूरी नहीं दे सकती. वह कहेगी कि इसके लिए योजना आयोग तो है ही. फिर एक अलग बोर्ड की जरूरत क्या है?”

माओवादी- “योजना आयोग जो करता-कराता है, उसी के कारण तो इन गरीब और असहाय लोगों की यह दुर्दशा हुई है. हमारा मानना है कि आदिवासियों के साथ अभी तक जो सलूक होता आया है, वह योजनाबद्ध है, क्योंकि योजना आयोग यही चाहता है.”

गृह मंत्री– “अब यह मेरी क्षमता से बाहर की बात है कि मैं एक समांतर योजना आयोग गठित कर दूं.”

माओवादी– “अगर आपके पास कोई पॉवर नहीं है, तो आपसे क्या बातचीत हो सकती है?”

गृह मंत्री- 'सुनिए, सुनिए ...'

माओवादी– “मैं माओवादियों के प्रतिनिधि के रूप में बात कर रहा हूं, लेकिन आप भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में बात नहीं कर पा रहे हैं. जब तक आपको यह अधिकार नहीं दिया जाता, तब तक कोई बातचीत नहीं हो सकती.”

फोन डिसकनेक्ट हो गया. चिदंबरम ने ललाट का पसीना पोंछा और सचिव को 'ओके' कह कर फाइलों में डूब गए.

18.06.2010, 00.02 (GMT+05:30) पर प्रकाशित