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भोपाल में शांति की खरीदी

मुद्दा

भोपाल में शांति की खरीदी

एमजे अकबर

यह एक सवाल है. यदि यूनियन कार्बाइड की जहरीली गैस का शिकार होने के बजाय भोपाल के बाशिंदों ने उलटे यूनियन कार्बाइड प्लांट को ही नेस्तनाबूद कर दिया होता तो प्रधानमंत्री के खासमखास, वर्ल्ड बैंक एल्युमनी एसोसिएशन के रैंकिंग लीडर और बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट हितों के पुराने पैरोकार, योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन मोंटेक सिंह अहलूवालिया को यूनियन कार्बाइड या डाऊ केमिकल्स को 983 करोड़ भिजवाने में कितना समय लगा होता? मेरा अंदाजा है 983 सेकंड. अहलूवालिया ने यह पैसा तुरंत भिजवा दिया होता.

मध्यप्रदेश सरकार ने गैस पीड़ितों के पुनर्वास के लिए 983 करोड़ के अतिरिक्त मुआवजे की गुहार लगाई थी. अहलूवालिया को 2008 में यह पैसा नहीं मिला था. 2010 में जब 26 साल की नाइंसाफी पर अवाम का गुस्सा फूटा तो अहलूवालिया को 983 सेकंड में पैसा मिल गया. और उन्होंने ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स नामक वोट-बचाऊ जुगत की पहली मीटिंग के कुछ घंटों पहले यह पैसा भिजवा भी दिया. लेकिन दो साल पहले पैसा क्यों नहीं था और अब क्यों है?

दरअसल इस मामले में पैसा कोई समस्या था ही नहीं. हकीकत यह है कि अहलूवालिया और उनके आकाओं ने गैस पीड़ितों की रत्ती भर भी परवाह नहीं की. उन्हें डाऊ केमिकल की सेहत की ज्यादा फिक्र थी. क्या सरकार के पास हजार करोड़ रुपए यूं ही रखे हैं, जिसे कोई रसूखदार नौकरशाह जब चाहे उठा ले? या योजना आयोग के पास जनाक्रोश के औचक विस्फोट सरीखी आपात स्थिति के लिए कोई खुफिया खाता है? यकीनन नहीं.

गैस त्रासदी को राजनीतिक मसला बनने में 26 साल लग गए. यही वजह है कि विपक्ष फिर से अंगड़ाई ले रहा है और सरकार के हाथ उस मुआवजे की चाबी लगी है, जिसे वह पच्चीस सालों तक खोज नहीं पाई थी.


सरकार के सभी खर्चे एक तय प्रक्रिया के तहत होते हैं और देश के बजट पर उनका असर होता है. लेकिन घुमावदार रास्ते से भी पैसा मुहैया हो सकता है. यदि आप बहती नदी में हाथ नहीं धो सकते तो मछलियों से भरी दूसरी खामोश नदी भी काम की साबित हो सकती है. हर साल कई महकमे अपने हिस्से का पैसा खर्च नहीं कर पाते हैं, जिसे उन्हें लौटाना होता है. हमारे कई मंत्रालय तो पैसा बचाने के लिए ही बदनाम हैं. यानी सरकार चाहे तो उसके पास हमेशा पैसा उपलब्ध हो सकता है.

लेकिन मध्यप्रदेश सरकार ने 983 करोड़ मांगने के लिए 24 साल इंतजार क्यों किया? उसने 983 दिनों में ही पैसे क्यों नहीं मांग लिए? या फिर अगले हजार दिनों में? इसके लिए 8 हजार दिनों तक रास्ता देखने की क्या जरूरत थी? यदि कहें कि इसके लिए सिस्टम की घोंघाचाल जिम्मेदार है तो यह एक बेहद आसान और बोगस जवाब होगा. बीते पच्चीस सालों में मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही बराबरी से राज किया है. इस दौरान कई मुख्यमंत्री हुए. उनमें से कुछ करिश्माई थे तो कुछ उपयोगी. कुछ बातूनी थे तो कुछ भुला देने योग्य. लेकिन सभी मुख्यमंत्रियों का ध्यान केवल एक ही चीज पर केंद्रित था- सत्ता में वापसी. भोपाल की एक त्रासदी यह भी है कि वह कभी चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका में नहीं रहा. शायद इसीलिए राजनेताओं ने कभी उसकी खास परवाह भी नहीं की.

भोपाल गैस त्रासदी के महज चार हफ्तों के भीतर आम चुनाव हुए थे, लेकिन 1984 में मतदाता पहले ही कांग्रेस को सत्ता सौंपने का मूड बना चुके थे. इसकी वजह थी इंदिरा गांधी की शहादत और राजीव गांधी के रूप में युवा भविष्य को कमान. नतीजा यह रहा कि कांग्रेस ने देशभर में विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया. पांच साल बाद हालात बदल चुके थे. अब मंडल, राम मंदिर और बोफोर्स मुद्दों की कतार में आगे आ चुके थे. भोपाल में जान गंवाने वाले लोग धुंधली याद बनकर रह गए. गैस त्रासदी को राजनीतिक मसला बनने में 26 साल लग गए. यही वजह है कि विपक्ष फिर से अंगड़ाई ले रहा है और सरकार के हाथ उस मुआवजे की चाबी लगी है, जिसे वह पच्चीस सालों तक खोज नहीं पाई थी.

क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अहलूवालिया या किसी और को जिम्मेदार ठहराएंगे? अगर नहीं तो क्यों? यूपीए सरकार और कांग्रेस को लगा होगा कि यह आंधी भी गुजर जाएगी. लेकिन अब वे आंधी को एक अंधड़ की शक्ल अख्तियार करते देख रहे हैं, जिसकी आस्तीन में चंद बवंडर और छुपे हुए हैं. शायद उन्होंने अपने नेताओं को कुछ खुफिया नाम भी दे डाले हों मसलन बवंडर दिग्विजय, तूफान रसगोत्रा या अंधड़ नरसिम्हा. एक और तूफान का नाम है अर्जुन सिंह, जो फिलवक्त खामोश है. यदि यह तूफान हमेशा की परिपाटी पर ही चलता है तो शायद वह अपनी दिशा बदल ले और कुछ देर के बाद छितर जाए. कांग्रेस को उम्मीद है कि 2011 की गर्मियों तक भोपाल फिर से गुमनामी के अंधेरे में गुम जाएगा, जबकि आम चुनाव अब भी हजार दिन दूर होंगे.

शायद वह दुआ कर रही हो कि काश इन 983 करोड़ रुपयों से अमन-चैन के 983 दिन ही खरीदे जा सकें.

 

21.06.2010, 02.13 (GMT+05:30) पर प्रकाशित