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भ्रष्टाचार का विकल्प

मुद्दा

 

भ्रष्टाचार का विकल्प

प्रीतीश नंदी


ये बुरी खबरों का दौर है. हर तरफ बुरी खबरें हैं. खाद्य पदार्थो की लगातार बढ़ती कीमतें. आतंकियों की हरकतें. पुलिसिया अत्याचार. नक्सली हमले. धराशायी होते नए पुल और फ्लायओवर. घोटाले, जिनमें हजारों लोग अपने जीवन भर की जमा पूंजी और मेहनत की कमाई गंवा देते हैं. अभयारण्यों में जंगली जानवरों का गैरकानूनी शिकार. विलुप्त होती प्रजातियां.

मानवाधिकारों का हनन. किसानों की आत्महत्याएं. सिर चकरा देने वाले कर कानून. स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों पर हमले. मौत का बायस बनते टीके. खुदकुशी की राह अख्तियार करते नौजवान छात्र. नौकरियों की किल्लत. निवेशकों की कम तादाद. बढ़ती बगावतें. देहाती इलाकों में पसरा हुआ गरीबी का रेगिस्तान. खतरनाक सीमा तक बढ़ता प्रदूषण का स्तर. मैच फिक्सिंग. सेना में भ्रष्टाचार. बिल्डरों द्वारा उजाड़े जाते दरख्त. फूंकी जाती ट्रेनें.

हर मर्ज की जड़ एक ही है. अपराध, बगावत, गरीबी, हिंसा, सभी के पीछे एक ही बुनियादी कारण है: भ्रष्टाचार. लेकिन अफसोस की बात यह है कि यही ऐसा विषय भी है, जिसके बारे में अब कोई भी बात करना नहीं चाहता. भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं, वह हमारे सिस्टम में इस तरह पैठा हुआ है कि हम सभी ने यह मान लिया है कि उससे अब किसी तरह की निजात मुमकिन नहीं है. लिहाजा हम भ्रष्टाचार को छोड़कर दूसरे सभी मसलों का सामना करने में मसरूफ हैं.

राहुल गांधी हमारी राजनीति के नक्शे पर देहाती गरीबों को फिर से लाने की कोशिश कर रहे हैं. प्रणब मुखर्जी हमें एक नया टैक्स कोड देना चाहते हैं. मनमोहन सिंह भारतीयों द्वारा विदेशों में जमा की गई पूंजी को वापस लाने की बात कर रहे हैं. चिदंबरम माओवादियों के खिलाफ लड़ाई में सेना का इस्तेमाल करना चाहते हैं. जयराम रमेश हमारी पर्यावरण नीति को नए सिरे से बदल देना चाहते हैं. कपिल सिब्बल शिक्षा प्रणाली में रद्दोबदल कर रहे हैं. मुरली देवड़ा बढ़ती पेट्रो कीमतों से परेशान हैं.

लेकिन कोई भी यह नहीं सोच रहा कि हमारी तमाम समस्याओं की जड़ में है भ्रष्टाचार. भ्रष्टाचार के इस दैत्य का खात्मा कर देना तो दूर की बात है, लेकिन अगर हम उसे काबू भी कर सकें तो हमारी कई समस्याएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी. आखिर कश्मीर समस्या की शुरुआत कैसे हुई थी? स्थानीय रहवासियों ने देखा कि लोभी राजनेता उनके राज्य को लूट रहे हैं और केंद्र ने उनकी शिकायतों को दरकिनार कर दिया है. जब उनका गुस्सा फूटा तो उन्हें अलगाववादी का तमगा दे दिया गया और उनकी आवाज को खामोश कराने के लिए सेना बुला ली गई.

नक्सल समस्या कैसे उपजी? क्योंकि लूटने-खसोटने वाले राजनेताओं ने आदिवासियों से उनकी जमीन और उनकी आजीविका के साधन छीन लिए. इसके बाद ये जमीनें खुदाई माफिया के हवाले कर दी गईं, जिनके साथ हमारे राजनेता लूट का माल बांटते हैं. आखिर पूर्वोत्तर अंचलों में बगावत ने क्यों सिर उठाया? क्योंकि सत्ता में आई हर राजनीतिक पार्टी उनके हक का पैसा हड़प गई और उनके हिस्से कुछ नहीं आया. वे वंचित रहे. विकास की गंगा उनके यहां कभी नहीं बही.

मैं आज इसीलिए निराश हूं क्योंकि पहले लाखों भारतीयों की तरह मेरे पास भी यह विकल्प मौजूद रहता था कि मैं घूस दूं या नहीं.


भ्रष्टाचार का दानव अब इतना बड़ा, इतना व्यापक हो गया है कि हम अब उस पर गौर भी नहीं करते. ट्रेन का टिकट चाहिए? किसी एजेंट को रुपए थमाओ. राशन कार्ड चाहिए? किसी पुलिसवाले की जेब गरम करो. पासपोर्ट चाहिए? बहुत सरल है. पासपोर्ट दफ्तर चले जाइए. वहां कुछ लोग मिलेंगे, जो आपका काम आसान कर सकते हैं. अवैध नल कनेक्शन चाहिए? म्यूनिसिपैलिटी के किसी कर्मचारी को उसके दफ्तर के बाहर पकड़ो और अपना काम निकलवा लो? बिजली की लाइन चाहिए? अगर आप पैसा देने को तैयार हैं तो आपके मोहल्ले की ही कोई हस्ती आपके लिए यह काम करवा देगी. हर चीज की कीमत है, चाहे वो कानूनी हो या गैरकानूनी. बताया जाता है कि पद्मभूषण पुरस्कार, संसद की सीट या सरकारी एजेंसी से कोई डील हासिल करना भी इसके दायरे के बाहर नहीं है. यह मैं नहीं कह रहा, यह पूरा जमाना कह रहा है और हमारी खिल्ली उड़ा रहा है.

सबसे अफसोस की बात तो यह है कि अब भ्रष्टाचार ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है कि आपको जायज चीजों के लिए भी कीमत चुकानी पड़ती है. आपके पास बिजली का गलत बिल आया है और इसे सुधरवाना चाहते हैं? घूस दीजिए. आपका पैसा बकाया है? जल्दी से जेब से कुछ निकालिए और आपको तत्काल अपना चेक मिल जाएगा. आपको एक सरकारी टेंडर मिल गया है? बहुत खूब. अब अगर आप नहीं चाहते कि मंत्री महोदय मामले में दखलंदाजी करें और सौदे को बदल दें तो सीधे जाकर उनके पीए से मिल लीजिए.

भ्रष्टाचार अब एक ऐसा औजार बन चुका है, जिसका इस्तेमाल किए बिना हमें हमारी हक की चीजें ही हासिल नहीं हो सकतीं. सालों तक पेंशन के मामले लटकाए जाते हैं. फर्जी मामले दायर कर दिए जाते हैं. सरकारी दफ्तरों में फाइलें रहस्यपूर्ण ढंग से गुम होती रहती हैं. कई यूनिवर्सिटी तो अपने विद्यार्थियों को सालों तक मार्कशीट भी मुहैया नहीं करातीं. डुप्लीकेट चाहिए तो घूस दो. क्या आपको अंदाजा है हमारे पुलिसवालों को अपनी पोस्टिंग और प्रमोशन के लिए रिश्वत के तौर पर कितना पैसा चुकाना होता है? और फिर यदि वे इस पैसे की भरपाई आपकी जेब पर डाका डालकर करते हैं तो इसमें हैरानी क्या.

मैं एक के बाद एक ढेरों उदाहरण गिनाता चला जाऊंगा और मुझे डर है यह सिलसिला कभी नहीं थमेगा. पत्रकार और सांसद के रूप में मैंने बरसों यह कोशिश की है कि लोगों को उनके हक की वह चीज दिलवा सकूं जो भ्रष्टाचार के चलते उन्हें हासिल नहीं हो पा रही है. यह आसान नहीं है. अक्सर तो यह जोखिम भरा भी हो सकता है क्योंकि भ्रष्टों का नेटवर्क तगड़ा होता है. आप एक मामले में दखल दीजिए और बीस लोग बीच में कूद पड़ेंगे. न जाने कहां से नए मामले खुल जाते हैं. मांगें बढ़ती चली जाती हैं. मैं आज इसीलिए निराश हूं क्योंकि पहले लाखों भारतीयों की तरह मेरे पास भी यह विकल्प मौजूद रहता था कि मैं घूस दूं या नहीं. यदि मैं घूस नहीं देना चाहता तो ठीक है. तब शायद मेरा काम पूरा होने में थोड़ा ज्यादा वक्त लगता, लेकिन ऐसा नहीं है कि उसे किया ही नहीं जा सकता था.

अब ऐसा नहीं है. हमारे विकल्प कम हो गए हैं. आज हम सभी एक भ्रष्ट सिस्टम के गुलाम हैं. यदि आप रिश्वत चुकाने से इनकार करते हैं तो पूरा सिस्टम आपको घेर लेगा, जैसे वह आपको कोई उदाहरण बनाकर पेश करना चाहता हो. यदि हमने यह अभी नहीं रोका तो समस्याएं बढ़ती जाएंगी. अगर न्याय न हो तो शांति भी नहीं हो सकती. और न्याय तब तक मुमकिन नहीं है, जब तक ईमानदार लोगों को ईमानदारी से जीने की इजाजत नहीं मिलती.

 

25.06.2010, 19.02 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Pramod Kumar Srivastava (pramodSrivastava54@gmail.com) Allahabad

 
 It is well to appreciate your views regarding corruption. But this corruption will remain for ever due to saving of money for himself and related to himself.  
   
 

shivkumarsharma (shkush@rediffmail.com) bhilai nagar

 
 प्रीतीश जी, आप की चिंता सही है. ईमानदार लोगो को ईमानदरी से जीने की इज़ाजत नही मिलती. समाधान यह नहीं समाधान मुझे लगता है हमें एक इमानदार लीडर, नेता के आवश्यकता है जैसे भगत सिंह, जयप्रकाश नारायण या लेनिन. जो मर मिटने को तैयार हो है वह मुझे लगता है रामदेवबाबा हैं. 
   
 

Beena (beenapandey927@gmail.com) Lucknow

 
 "पहले जब हम पीते न थे तब क़सम दे दे कर पिलाया गया,आज जब हम पीने के आदी हो गए तो कहते हैं कि, नशामुक्ति केंद्र जाओ !"

प्रीतीश जी, हमारे लोग भ्रष्टाचार के इतने लति हो गए हैं कि अब इसके लिए कोई नशामुक्ति केंद्र भी उनका सहारा नहीं बन सकता. जो भी कुछ आपने लिखा उसका सच जानते तो सभी हैं, लेकिन अफसोस तो ये है कि सब जानने के बावजूद कोई इस पर आघात करने की पहल नहीं कर पता. रिश्वत दे कर काम करवाने के बाद उस रिश्वतखोर को कोसते जरूर हैं, मगर अपनी जेब खाली करवाने वाले को घूस देने से मना करने का साहस नहीं करते. आखिर इसकी वजह क्या है, ये आप बेहतर जानते हैं.
 
   
 

sunder lohia (lohiasunder2@gmail.com) Mandi (H P)

 
 प्रतीश जी बात तो आप ठीक कर रहें हैं लेकिन इस बीमारी का इलाज जानते हुए भी बताना नहीं चाहते. इस बिमारी का एक ही इलाज है कि निजी दौलत की कोई सीमा तय कर दी जाए और उत्तराधिकार की सामंती परंपरा समाप्त कर दें तो न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. संतान के लिए संचय रोक दें बीमार भाग जाएगी. 
   

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