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आज का आपातकाल

मुद्दा

 

आज का आपातकाल

आनंद मिश्रा


तो क्या हम आपातकाल के एक और दौर से गुजर रहे हैं ?

इस सवाल का जवाब तलाशने के लिये हमें 25 जून 1975 को याद करने की जरुरत है. यही वो तारीख है, जिसमें हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं और व्यवस्था की असफलता हमारे सामने आई. आपातकाल कोई तुरत-फुरत घटने वाली स्थिति नहीं थी. यह बहुत साफ है कि उसकी पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार कर ली गई थी. देश की आज़ादी के लिये लड़ने वाली 100 साल पुरानी एक संस्था को आहिस्ता-आहिस्ता एक निजी कंपनी में बदल दिया गया था और जब आपातकाल लाया गया तो जनता स्तब्ध रह गई. जनता के सामने विरोध का कोई अवकाश नहीं छोड़ा गया था. इस आपातकाल को अनुशासन पर्व का नाम दिया गया.

लोहिया जी ने कहा थी कि जब भी किसी देश का लोकतंत्र समाप्त किया जाता है, तो उसकी शुरुवात राजनीतिक दल से होती है. इंदिरा गांधी के जमाने में भी देश उसी दौर से गुजर रहा था, जब राजनीतिक दलों के भीतर की लोकतांत्रिक स्थितियां खत्म कर दी गई थीं और सुरक्षा के नाम पर देश को एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक स्थिति के बजाय आपातकाल में झोंक दिया गया था.

आज इतने सालों बाद फिर से वैसी ही स्थितियां बन रही हैं, जब सुरक्षा के नाम पर देश की जनता को एक तरह के आपातकाल में जकड़ दिया गया है. यह एक बुनियादी बात है कि सुरक्षा और स्वतंत्रता साथ-साथ चलने वाली स्थितियां हैं. किसी एक को बेदखल कर के दूसरे को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता. दुनिया के एक बड़े हिस्से में लोगों को गलतफहमी थी कि समता और स्वतंत्रता अलग-अलग स्थितियां हैं लेकिन यह सोच अंततः गलत साबित हुई. सुरक्षा के नाम पर जिस समाज ने भी स्वतंत्रता की अवहेलना की, उनका बचा रह पाना मुश्किल हो गया.

एक स्वतंत्र लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के अंदर लोकतंत्र को सोची-समझी साजिश के तहत खत्म कर दिया गया है. वर्ग विशेष या गुट विशेष के अंदर सब कुछ चल रहा है. राजनीतिक दल के सामने केवल एक ही लक्ष्य बचा रह गया है और वह है किसी भी तरह से सत्ता में हिस्सेदारी. ऐसे में राजनीतिक दल धीरे-धीरे कारपोरेट घरानों में बदलते चले गये हैं.

यह चकित करने वाला दृश्य है कि आईआईटी के बेहतर विद्यार्थी किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का मैनेजर बन कर उपभोग बेचने का काम कर रहे हैं.


लोकसभा में अपने अंतिम भाषण में लोहिया जी ने कहा था कि हम विषमता के खिलाफ लड़ाई के लिये कोई उपाय नहीं कर पा रहे हैं. हम खपत का आधुनिकीकरण कर रहे हैं, उत्पादन का आधुनिकीकरण नहीं. उन्होंने कहा था कि मूर्खतापूरण वैभव का प्रदर्शन न हो और खर्च की सीमा तय हो.

आर्थिक उदारीकरण के बाद से हमने देश की जनता को एक ऐसे समाज के निर्माण की ओर धकेल दिया, जहां 85 फीसदी लोगों के लिये लोभ और 15 फीसदी लोगों के लिये लाभ की स्थिति पैदा कर दी गई है. उपभोग की इतनी परतें दिखाई जा रही हैं कि लोग अपना मानसिक संतुलन खो रहे हैं. आज अधिकार के बजाय हिस्सेदार बनाने की बात हो रही है. जिस तरह का उपभोक्तावादी समाज हमने बनाया है, उसमें तमाम तरह की विषमतायें पैदा हो रही हैं. ये विषमतायें समाज में जिस तरह का द्वंद्व पैदा कर रही हैं, उसके कारण हमारे लोकतांत्रिक संगठन के पास जिस तरह के स्पेस की जरुरत थी, वह लगातार सिकुड़ती चली गई है.

संस्थाओं का लगातार अवमूल्यन हो रहा है. समाज के अंदर संवाद और संवेदना की जगह कम हो रही है. समाज में इसके कारण असंतोष है लेकिन उस असंतोष को दिशा देने का काम नहीं हो रहा है. एक खास किस्म के बनाये गये इस यथार्थ के कारण पूरी दुनिया को जीतने की आकांक्षा लिये नौजवान और अपनी जमीन से बेदखल हो रहे किसान, भ्रम की स्थिति में हैं. यह चकित करने वाला दृश्य है कि आईआईटी के बेहतर विद्यार्थी अनुसंधान या विज्ञान के लिये काम नहीं कर रहे हैं. वे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का मैनेजर बन कर उपभोग बेचने का काम कर रहे हैं.

दूसरी ओर विसंगतियों से लड़ने के बजाय समाज की सुरक्षा के नाम पर समाज के अंदर एक हिंसा का वातावरण पैदा किया जा रहा है. लोगों को बाध्य किया जा रहा है कि या तो आप इस कथित लोकतंत्र को स्वीकार कर लें या हिंसात्मक समाज के साथ हों लें.

1975 के पहले ये चेतना थी कि समाज को बेहतर बनाना है. आदर्श निर्धारित थे. आज वो सारे आदर्श खत्म हो गये, चेतना खत्म हो गयी. 1975 में जनअसंतोष था लेकिन आज समाज में 1975 से भी खराब हालत हैं और हमने उसे चाहे-अनचाहे स्वीकार कर लिया है. ऐसे में सीधा सवाल है कि आखिर एक आदर्शहीन समाज किसे प्रेरणा देगा ?

आज की बड़ी जरुरत है कि हम गांधी, लोहिया और जयप्रकाश के लिये समाज का जो सबसे कमजोर आदमी है, उसे संगठित करें. हम क्या कर पायेंगे से बड़ा सवाल है कि हम क्या कर रहे हैं. आपातकाल के जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, वहां हमारी सक्रियता ही हमारी चेतना का स्वर हो सकता है.

25.06.2010, 19.02 (GMT+05:30) पर प्रकाशित