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शब्दों की शोभायात्रा

बाईलाइन

 

शब्दों की शोभायात्रा

एमजे अकबर


समाचार विज्ञापन का सबसे परिष्कृत तरीका है. शायद हमें पत्रकारिता के प्रति कुछ और उदार होते हुए ये मान लेना चाहिए कि समाचार विज्ञापन का सबसे परिष्कृत तरीका हो सकता है, विशेषकर तब जब ये उद्धरण चिन्हों के अंदर समेटा हुआ हो. ये परिष्कृत चालाकी उस समय और भी उभर के सामने आ जाती है, जब इसे किसी बड़ी खबर के साथ संबद्ध कर दिया जाए.

इसका एक बेहतरीन नमूना उस समय देखने को मिला, जब केंद्र सरकार ने तेल की कीमतों से नियंत्रण हटाने का निश्चय किया. यह खबर शनिवार 26 जून को अखबारों में आई. संयोग से यह दिन कभी का भुला दी गई घटना आपातकाल की 35वीं सालगिरह थी. उन पुराने मूर्खतापूर्ण दिनों में सरकार को आम-सेंसरशिप की जरूरत महसूस हुई थी. हालांकि हाल के ज्यादा जटिल समय में एक सावधानी से चुनी गई चयनात्मक खबर अधिक फायदेमंद साबित होती है. इसी दिन के अखबार में मौसम विभाग के हवाले से यह खबर भी थी कि इस बार मानसून के बहुत अच्छे आसार हैं, और दिल्ली 1 जुलाई तक तरबतर हो जाएगी. और सितंबर के अंत तक बारिश सामान्य 98% से 4 प्रतिशत ज्यादा 102% तक पहुँच जाएगी.

1 जुलाई की दोपहर दिल्ली सहारा रेगिस्तान की तरह तप रही थी. फिर उसी मौसम विभाग के हवाले से एक और खबर आती है कि मानसून 18 जून को दक्षिणी गुजरात से शुरु हुई एक फ्लैट लाईन के पास, कमजोर होकर ठप-सा पड़ गया है. इसमें उत्तरी बिहार की ओर तक कोई उपरी दबाव जैसा कुछ नहीं हुआ. उत्तर भारत के कृषि गढ़, पश्चिम से उत्तर प्रदेश के मध्य से बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर गुजरात, हरियाणा और पंजाब अभी भी उसी तरह सूखे थे, जैसे रेगिस्तान में हमारे गले सूखे होते हैं, और अगर 1 जुलाई तक बारिश नहीं होती तो फसलों को नुकसान होना शुरु हो जाएगा.

जैसा मैं जानता हूं, आप सब एक हफ्ते के अंदर नोह आर्क की नाव में बैठे होंगे, पर मुद्दा ये नहीं है. मुद्दा यह है कि 25 जून को जब मौसम विभाग ने यह झूठ रोपित किया, तब उसे एक हफ्ते से पता था कि मानसून कमज़ोर हो गया है. लेकिन उसने एक फर्जी रुझान इसलिए गढ़ा ताकि मंत्री, प्रवक्ता और सरकार के अर्थशास्त्री और जो इस समूह से जुड़ने की राह में हैं, टीवी पर जा सकें और जनता को यह दिलासा दे सकें कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से मुद्रास्फीति पर जो असर पड़ने जा रहा है, वह अच्छे मानसून से कम हो जाएगा.

क्या इसका कोई फायदा होता है? आखिर दावे, तथ्यों को बदल नहीं सकते. अमूल अपनी बैलेंस शीट की अनदेखी करके किसी सरकार को मदद करने की गरज से दूध की कीमतें बढ़ाने से रुक नहीं जाएगा. हां, ऐसे दावों का एक प्रभाव यह होता है कि वह हमारी स्मृति को आंशिक रूप से सकारात्मक उम्मीद के तरफ मोड़ देता है.

अगर राज्य पुलिस के जवान मारे जाते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी राज्य के मुख्यमंत्री पर आती है. अगर केंद्रीय बलों के जवान मारे जाते हैं, तो जिम्मेदारी गृहमंत्री पर आती है.


एक दूसरा प्रहार भले दर्द दे सकता है, लेकिन हमें चौंकाता नहीं है. आप दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 72 जवानों के जनसंहार और उन्हीं माओवादियों द्वारा उसी जगह पर हाल ही में हुई 27 जवानों की हत्या पर आम जनता और मीडिया की प्रतिक्रिया का विश्लेषण करें. पहले माओवादी हमले के बाद गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने एक नकली इस्तीफा दिया. दूसरी बार न तो इस्तीफा सौंपा गया ना ही उनसे मांगा गया. हालांकि, सख्त जवाबदेही की बात हो तो दूसरा हमला एक ज्यादा बड़ी चूक थी. हैरानी जताने का बहाना इस बार उपलब्ध नहीं था. लेकिन गृह मंत्री शब्दों की बाजीगरी करते हुए भाग निकले.

गृहमंत्री ने राज्य सरकारों को हिदायत दी कि आगे से सीआरपीएफ के जवानों को सिर्फ खास मुहिमों के लिए भेजना चाहिए, न कि ‘रोजमर्रा’ के कार्यो के लिए. रोड की सफाई जैसे काम तो राज्य की पुलिस भी कर सकती है लेकिन क्या माओवादियों के संभावित हथियारों- आईडी और बारूदी सुरंगों से भरी सड़क को साफ करने से भी विशिष्ट कोई और मुहिम हो सकती है? क्या चिदंबरम ये बताना चाह रहे थे कि राज्य पुलिस को वहां भेजना चाहिए जहां जान जाने का खतरा ज्यादा हो. क्यों ? क्या छत्तीसगढ़ के पुलिस वालों की जान सीआरपीएफ जवानों की जानों से ज्यादा सस्ती है ?

इस सब का असली उत्तर राजनीति है. अगर राज्य पुलिस के जवान मारे जाते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी राज्य के मुख्यमंत्री पर आती है. अगर केंद्रीय बलों के जवान मारे जाते हैं, तो जिम्मेदारी गृहमंत्री पर आती है. पश्चिम बंगाल की यात्रा पर गए हुए गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने राज्य के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य पर ताना कसा, यह सोच कर कि अपनी जिम्मेदारी उन पर डाल दी जाए. वे इस प्रकार के समीकरण पसंद करते हैं. जिम्मेवारियां राज्य पर डली रहें और अगर जब कभी सराहना के स्वर उठें तो उसकी आवाज़ उनकी दिल्ली स्थित कार्यालय में गूंजे. बहरहाल, ये लोकतंत्र में बिल्कुल सामान्य बात है.

हम लोकतंत्र के खरीदार शब्दों को उनका मोल पूछे बगैर खरीदते हैं. यह सत्ता में बैठे लोगों को प्रोत्साहित करता है कि वह ऐसे शब्दों का जाल बुनें, जिससे हमें मूर्ख बनाया जा सके. कभी उन्हें जायकेदार बनाने के लिए मिर्च-मसाला डाल दिया, कभी कुछ भड़काऊ बात जोड़कर उन्हें और चमकदार बना दिया और कभी सिर्फ अच्छी पैकेजिंग के बल पर अपने शब्द बेच दिए.

जब आप घर आकर उस पैकेजिंग पर से चमकीले कागज को हटाते हैं और उस बक्से को खोलते हैं तो आप पाते हैं कि उसमें बहुत सारे भूसे के बीच में एक झुर्रीदार-सूखा आम पड़ा है, न कि वो हापुस आम, जिनका वायदा आपको राजनीति के बाज़ार में किया गया था. अब चूंकि वहां कोई और नहीं है जिस पर इस सौदे के लिए आरोप लगाए जा सकें, तो आप उस आम का अचार डालते हैं और खुद को उस भ्रम से दिलासा देते हैं कि यही पोषण हैं.

आप हालात का खाका खींचें, नतीजों की नाप-जोख करें और फिर देखें कि शब्दों की इस शोभायात्रा में आपके हिस्से महज चहलकदमी आई है या कोई लंबा सफर. आखिरकार एक स्टेशन सामने आएगा ही, जिसका नाम पोलिंग बूथ होगा.

 

* लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं.

05.07.2010, 10.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sushant Kumar (m.sushant@gmail.com) , Jaipur

 
 आपने जितनी महत्वपूर्ण बात कही है, उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है.हम एक ऐसे स्मृतिहीन समय में जी रहे हैं, जहां हम जल्दी ही सारी बातें भूल जाते हैं. राजनीतिज्ञ हमें हर बार नये-नये शब्द उपहार में दे कर भरमा जाते हैं और हम बहुत मूर्खतापूरण तरीके से उनके हर कहे को सत्य मान कर बच्चों की तरह बहल जाते हैं. ऐसा नहीं होता तो कल के गुंडे, मवाली और लुटेरे हमारी संसद में 'माननीय' बन कर नहीं बैठे होते. हम सब कुछ भुला देने वाले लोग हैं और इसकी सजा तो हमें मिलेगी ही. 
   

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