पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > Print | Send to Friend | Share This 

बीच का रास्ता

बाईलाइन

 

बीच का रास्ता

एम जे अकबर


क्या भारतीय राजनीति में बीच की जगह की कोई गुंजाइश है? 50 और 60 के दशकों के दौरान यह समाजवादियों की सबसे बड़ी दुविधा थी. राजनीतिक विचारधारा की रूपरेखा गढ़ने वाले राष्ट्रवादी आंदोलन, ने भी अधिक स्पष्टता प्रदान नहीं की. महात्मा गांधी ने कांग्रेस की पहुँच को इतना विस्तृत कर दिया कि हर विचारधारा उससे संबंधित होने का दावा कर सकती थी. उनका सिद्धांत जब तक असर में रहा बहुत ही आसान और प्रभावशाली रहा. यह कि ये राष्ट्र सभी का है इसीलिए सभी अंग्रेजो के खिलाफ किए गए संघर्ष का हिस्सा हैं. इसी वजह से 30 के दशक के शुरुआती दौर तक हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग के सदस्य साथ-साथ भी रहे, उसी समय 1942 तक जी.डी.बिड़ला कांग्रेसी खेमे में वामपंथियों के साथ जगह साझा करते थे.

लेकिन जब भी अहम फैसले लेने का मौका आया, इस करिश्माई गठबंधन की कमियां उज़ागर हुईं. अगर कांग्रेस महासभा नहीं होती, तो 1928 में  कलकत्ता में हुए सर्वदलीय सम्मेलन में जिन्ना द्वारा प्रस्तुत संवैधानिक फार्मुले को मान लिया गया होता. 1920 के दशक के अंत तक समाजवाद के प्रति कांग्रेसी झुकाव के प्रति अपनी शंकाओं के बारे में नेताजी सुभाषचंद्र बोस का स्वर जवाहरलाल नेहरु से ज्यादा मुखर हो गया था. और त्रिपुरी सत्र के बाद बोस समझ गए थे कि उनके पास एकमात्र विकल्प कांग्रेस से अलग होकर अपनी अलग पार्टी ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक बनाने का बचा है.

आज़ादी के बाद डॉ. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और नाथ पाई जैसे कई अन्य समाजवादियों ने भी कांग्रेस छोड़ दी. लेकिन समाजवाद की तरह ही एकता भी दूर की कौड़ी साबित हुई और वे प्रजा समाजवादी पार्टी और संयुक्त समाजवादी पार्टी में बंट गए. चुनावी राजनीति दोनों को ही रास नहीं आई जबकि जनता गांधी के वारिस जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के प्रति वफादार रही. राजनीतिक महत्वकांक्षा पूरी न होने पर प्रजा समाजवादी पार्टी के अधिकांश नेता कांग्रेस में वापस चले आए, और नेहरु उन्हें वापस लेने के बहुत उत्सुक दिखे. अशोक मेहता को तोहफे के तौर पर कैबिनेट में जगह दी गए, जबकि “युवा तुर्क” चंद्रशेखर ने तो इंदिरा गांधी के समर्थन में बिना कार्यसमिति का चुनाव जीतकर इतिहास ही रच दिया.

डॉ. लोहिया की संयुक्त समाजवादी पार्टी अपने कांग्रेस विरोधी-प्रजातंत्रवादी रुख पर कायम रही, और जनसंघ जैसे "साझा मोर्चे" में उसे सब समस्याओं का हल नज़र आया. 70 के दशक के संकटकाल ने कांग्रेस के भीतर तानाशाह प्रवृत्ति को हवा दी, और अधिकतक गैर-कांग्रेसी पार्टियां कांग्रेस के साथ एक दुर्लभ राजनीतिक गठबंधन की राह पर चल पड़ीं. लेकिन ये बहुत दिन तक नहीं चला, क्योंकि 1977 की चुनावी सफलता सत्ता लाई और सत्ता के मद में चूर अलग-अलग धड़ों के क्षुद्र स्वार्थ उज़ागर होने लगे जो कि बाद में गठबंधन के लिए अहितकारी साबित हुए.

इसके बाद गैर-कांग्रेसी राजनेता फिर से अपने पुराने गढ़ों की तरफ लौट गए, कुछ नए-नए नामों की पार्टियों के साथ. जैसे भारतीय जनसंघ भारतीय जनता पार्टी बन गई, लोहियावादी मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाई. जबकि शरद यादव और नितीश कुमार आखिरकार जनता दल (युनाइटेड) के ढांचे में पैबस्त हो गए. एक राष्ट्रीय साझा मोर्चा कई टुकड़ों में बिखर तो गया, लेकिन ये टुकड़े मूल से भी बड़े हो गए, क्योंकि उन्होंने अपनी क्षेत्रीय पहचान गढ़ ली थी.

भारतीय राजनीति में बीच का रास्ता मुमकिन तो है, लेकिन उस राह में कांटे भी हैं. इस राह में धक्के, हादसे हो सकते हैं, लेकिन यही मंजिल तक पहुँचने की डगर भी हो सकती है

वी पी सिंह ने जरूर राष्ट्रव्यापी स्तर पर बीच का रास्ता खोजने की गंभीर कोशिश की थी, लेकिन उनकी कोशिशें काम नहीं आईं क्योंकि उनके प्रयास व्यक्तिगत थे संस्थागत नहीं. किसी भी नेता के व्यक्तिगत झुकाव अक्सर पारिवारिक वर्यस्व बनाए रखने की इच्छा से ज्यादा नहीं होते, जबकि सहयोगी एक बड़े ढांचे की मांग करते हैं. यही बात तीसरे मोर्चे की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हुई.

क्या शरद पवार वहां कामयाब हो सकते हैं, जहां उनसे पहले कई नाकाम हो चुके हैं? उन्होंने एक शुरुआती संकेत बार-बार भेजा है कि वे कांग्रेस के साथ अपने मौजूदा गठजोड़ के बजाय किसी तीसरे मोचे में ज्यादा सहज होंगे. पवार राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं, लेकिन सबसे ज्यादा दिलचस्प है उनकी टाइमिंग. जब चुनाव में चार साल बचे हों तो जल्दबाजी की क्या ज़रूरत?

गैर-कांग्रेसी पार्टियों के सामने अब चार मॉडल बचे हैं – पृथक क्षेत्रीय महत्वकांक्षाएं, 1967 जैसा संयुक्त मोर्चा जो कुछ हद तक सफल रहा, 1977 सरीखी दलीय एकता जो कि जब तक चली प्राणपोषक साबित हुई और 1989 जैसा वीपी सिंह का संतुलन, जिसमें मध्य और दाएं की गहरी समझ तो होती है, लेकिन इसे मतदाता के सामने ज्यादा जाहिर नहीं किया जाता.

बिहार में नितीश कुमार ने स्थानीय भाजपा की छवि को फिर से संवारने का महत्वपूर्म काम किया है. उन्होंने समाजिक संघर्ष को रोका है और अच्छे प्रशासन पर ज़ोर दिया है जो कि चुनावी सफलता की दो महत्वपूर्ण कुंजियां हैं. पूरी संभावना है कि सत्ता में वापसी के लिए उन्हें प्रयाप्त मुस्लिम वोट मिलें. वे वीपी सिंह की सरकार में जूनियर मंत्री थे, जिसे कम्यूनिस्टों और भाजपा दोनों का समर्थन हासिल था. वीपी सिंह से उन्होंने वरिष्ठों की तुलना में ज्यादा सीखा है.

भारतीय राजनीति में बीच का रास्ता मुमकिन तो है, लेकिन उस राह में कांटे भी हैं. धचके लगने का अंदेशा है और हादसों की गुंजाइश से भी इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन आखिर वही मंजिल तक पहुँचने की डगर भी हो सकती है.

11.05.2010, 07.47 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in