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अमरीका का दोगलापन

विचार

 

अमरीका का दोगलापन

डॉ. सुभाष राय


फरहा पंडित भारतीय मूल की अमरिकी मुसलमान हैं. उन्हें ओबामा ने बहुत महत्वपूर्ण काम सौंपा है. उन्हें दुनिया को यह समझाना है कि अमरीका मुसलमानों का दुश्मन नहीं है. अमरीका में मुसलमानों को उतना ही सम्मान मिलता है, जितना किसी अमरीकी को. वह न तो मुसलमान कौम को आतंकवादी मानता है, न ही इस्लाम को. अमरीका जो कर रहा है, उसे देखते हुए यह बड़ा कठिन काम है. पर फरहा पंडित ने ठान लिया है कि वे यह असम्भव भी सम्भव कर दिखायेंगी.

वे फरहा भी हैं और पंडित भी, शायद इसलिये उन्होंने इतनी हिम्मत की है. 25 देशों की यात्रा करने और हजारों मुस्लिम युवाओं, बुद्धिजीवियों से मुलाकात करने के बाद उन्हें इलहाम हुआ है कि यह समझना गलत होगा कि भारत के सभी 16 करोड़ मुसलमान आतंकवादी हैं. गिने-चुने लोगों के गलत रास्ते पर चले जाने से किसी को यह कहने का आधार नहीं मिल जाता कि मुस्लिम कौम आतंकवादी हैं. समझ में नहीं आता कि उन्हें भारत के मुसलमानों को लेकर इतनी बेचैनी क्यों हुई? क्या वे भारत के मुसलमनों को ही सबसे ज्यादा परेशान देख रहीं हैं? क्या पकिस्तान के मुसलमान बहुत कुशल से हैं, उन्हें अमरीका से कोई गिला नहीं? क्या ईरान, इराक, अफगानिस्तान, यमन, फलस्तीन के मुसलमान दादा ओबामा से बहुत प्रसन्न हैं? क्या उन्हें भूल गया कि जार्ज बुश पर जूता कहां फेंका गया था और किन लोगों ने जूते फेंकने वाले पत्रकार को मुस्लिम जगत का हीरो बना दिया था? और क्यों?

किसे नहीं याद है कि भारत के राष्ट्रपति पद पर रह चुके और विश्व के शीर्ष नाभिकीय वैज्ञानिकों में शुमार किये जाने वाले अब्दुल कलाम को अमेरिका यात्रा के दौरान जामा तलाशी देनी पड़ी थी

दरअसल अमरीका के कई चेहरे हैं. आतंकवाद और मुसलमानों को लेकर वह दुनिया के अलग-अलग इलाकों के लिए अलग-अलग मानक रखता है. वह तालिबान से तो लड़ता हुआ दिखता है पर भारत में दहशतगर्दी के लिए जिम्मेदार आतंकवादी संगठनों के बारे में परम मौन बनाये रखता है. वह भारत को खुश रखना चाहता है क्योंकि भारत उसके अनुपयोगी और बेकार माल का सबसे बड़ा खरीदार है, लेकिन पाकिस्तान को भी नाराज नहीं करना चाहता क्योंकि पाकिस्तान की मदद के बिना वह तालिबान से लड़ नहीं सकता. वह मंदी की मार से भयानक रूप से त्रस्त है लेकिन अभी भी वह अपने को दुनिया का सबसे बड़ा दादा समझने का भ्रम छोड़ नहीं पाया है. इतिहास ने कई बार उसे मनमानी करते देखा है.

अमरीका ने जिस तरह मुस्लिम जगत में एक बहादुर बादशाह के रूप में विख्यात सद्दाम हुसैन को मार-मार कर कर गड्ढे में छिपने के लिए मजबूर कर दिया, बाद में उन्हें खोदकर निकाला और इराक की सत्ता में बैठाये गये अपने ही भाड़े के हत्यारों के हवाले कर दिया, वह आखिर मुसलमनों को कैसे भूल सकता है? हो सकता है सद्दाम बहुत न्यायप्रिय और लोकप्रिय शासक न रहे हों, हो सकता है कि उनकी तानाशाही से इराक के लोग तंग आ गये रहे हों, पर इस नाते अमरीका को यह अधिकार कैसे मिल सकता है कि वह उनका सफाया कर दे. मानव संहारक अस्त्र होने के जिस अन्देशे को आधार बनाकर सद्दाम और उनके देश को तबाह कर दिया गया, वे निराधार निकले. क्या यह मनुष्यता के प्रति अपराध नहीं है? क्या इसका सौ प्रतिशत कुसूर अमरीका पर नहीं मढ़ा जाना चाहिये?

अमरीका की फरहा पंडित जिस भाषा में बोल रहीं हैं, उससे लगता है कि या तो अमरीका मुसलमानों से अचानक रीझ गया है या फिर लड़ते-लड़ते थक गया है. सच क्या है, समझ में नहीं आता. एक तरफ तो अमरीकी अफसरान आम मुस्लिम यात्रियों को भी अमरीका में घुसने देने से रोकने की पूरी कोशिश करते हैं, हर मुसलमान पर आतंकवादी होने का शक करते हैं और अगर किसी को प्रवेश मिलता भी है तो भारी अपमान सहकर, वहीं दूसरी तरफ वे ऐसी बातें करते हैं, जैसे मुसलमानों के लिये उनके मन में प्रेम का महासागर उमड़ रहा हो.
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