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भुट्टो की जंग के 960 साल

बाईलाइन

 

भुट्टो की जंग के 960 साल

एमजे अकबर


आज के ढ़र्रे में भुट्टो परिवार और भुट्टो-नीत सरकारों की चर्चा कम होती है. इस सियासी खानदान के लिए पाकिस्तानी देशभक्ति का एकमात्र पैमाना भारत-विरोधी उन्माद था. जितना ज्यादा आप भारत के खिलाफ जहर उगल सकते थे, उतने ही राष्ट्रभक्त थे. मनोचिकित्सकों को इसका उत्स शायद सर शाहनवाज भुट्टो के हश्र में दिखाई दे जो विभाजन से पहले जूनागढ़ के प्रधानमंत्री थे और रियासत के पाकिस्तान में विलय की योजना बना रहे थे. रियासत तो खैर पाकिस्तान के साथ नहीं गई, भुट्टो चले गए और उनके पीछे जूनागढ़ के नवाब भी, जो परिवार को छोड़कर कुत्तों के साथ भागे थे.

भुट्टो परिवार के सियासतदानों ने जब भी भारत के खिलाफ लड़ाई छेड़ी, हर बार मुंह की खानी पड़ी. अपने को आश्वस्त करने के लिए उन्होंने जुबानी जंग में बड़ी-बड़ी, किंतु खोखली बातें कहीं. जुल्फिकार अली भुट्टो कश्मीर को हासिल करने के लिए 1965 की लड़ाई के सिद्धांतकार भी थे और नेता भी. ऑपरेशन जिब्राल्टर और ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम दयनीय रूप से नाकाम रहे और जम्मू-कश्मीर में सीज फायर लाइन के दोनों तरफ एक इंच जमीन भी इधर से उधर नहीं हुई.

1971 की लड़ाई में पाकिस्तान की अपमानजनक हार पर पर्दा डालने के लिए भुट्टो ने भारत के साथ हजार साल तक जंग लड़ने का वादा किया. उसमें से 960 साल अब भी बचे हैं. कोई जल्दी नहीं. उसके बाद शांति समझौते के लिए भी. हजार साल लंबी लड़ाई की धमकी में यह स्वीकारोक्ति भी छिपी थी कि पाकिस्तान मैदानी जंग नहीं जीत सकता. जुल्फिकार की बेटी बेनजीर 1989 में पाक के कब्जे वाले कश्मीर आईं, नरसिंह राव को बुरा-भला कहा और कश्मीर के लिए आजादी का वादा किया. भाषण में आखिरी बार आजादी शब्द बोलते-बोलते उनकी आवाज चीख में बदल गई.

तब से दो दशक बीत चुके हैं. बेनजीर को खुद उनके मुल्क में मौत के घाट उतार दिया गया. कश्मीर में एक इंच जमीन भी इधर से उधर नहीं हुई. उनके शौहर आसिफ जरदारी की हुकूमत कभी-न-कभी सत्ता से बेदखल होगी. शांतिपूर्ण चुनाव के जरिए हो या छावनी उन्हें बंदूक के बल पर बाहर कर दे. उनकी ओढ़ी हुई मुस्कान या उनके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के बालसुलभ उत्साह के बावजूद एक इंच जमीन भी इधर से उधर से नहीं होगी.

सुलह से ज्यादा टकराव उसे रास आता है, मुल्क के भीतर भी और बाहर भी. कई पाकिस्तानी भारत के साथ अमन की समझदारी में यकीन करते हैं, लेकिन वे इतने ताकतवर नहीं कि छावनी को चुनौती दे सकें.


कुरैशी भूल गए कि जब वह कह रहे थे कि कश्मीर में आतंकवादी घुसपैठ भारत की समस्या है, तब पूरी दुनिया सुन रही थी. क्या वह अमरीका से कह सकते हैं कि अल कायदा वाशिंगटन की समस्या है और वह अमरीका में घुसपैठ करे तो पेंटागन निपटे? ऐसा कहकर वह एक मिनट भी अपनी कुर्सी बचा नहीं पाएंगे. अमरीका की केंद्रीय जांच एजेंसी एफबीआई किसी एक संदिग्ध की मांग करती है तो पाकिस्तान छह घंटे में छह लोगों को उठा लेता है. भारत हफीज सईद की मांग करता है तो कुरैशी भारत के गृह सचिव जी के पिल्लई की बात करते हैं. वह भी कांफ्रेंस हॉल में नहीं, प्रेस कांफ्रेंस में.

कोई नहीं कह रहा है कि सौम्य और अनुभवी एस एम कृष्णा को कुरैशी के सड़क छाप बयानबाजी के स्तर पर उतरना चाहिए. संभवत: उनकी शालीनता और सौजन्य ने उन्हें कुरैशी के कथनों को बकवास कहने से रोक लिया, लेकिन खामोशी हमेशा मूर्खता का सर्वोत्तम जवाब नहीं होती. इस्लामाबाद के पास हेडली से पूछताछ का वह दस्तावेज है, जिसमें उसने पर्दाफाश किया है कि आईएसआई ने मुंबई के आतंकी हमले के लिए कम से कम 25 लाख रुपए मुहैया करवाए. कुरैशी को आतंक के मुद्दे से ध्यान बंटाना था. इस जिम्मेदारी के लिए जरूरी बौद्धिक नफासत व राजनयिक कौशल उनके पास नहीं है.

पाकिस्तान के पास कोई विदेश नीति नहीं है. रिश्ते हैं. उनमें से तीन अमरीका, चीन व सऊदी अरब के साथ उसके रिश्तों में वैसी ही स्थिरता है, जैसी संरक्षक और यजमान के रिश्ते में होती है. उसका एक रिश्ता, भारत के साथ बैर का है. इसीलिए भारत नीति सेना तय करती है. अमरीका, चीन और सऊदी अरब पाकिस्तान का ख्याल रखते हैं, लेकिन भारत के साथ अपने रिश्तों को इस्लामाबाद के हितों का बंधक नहीं बनाते. तो भी पाकिस्तान मित्र देशों से फायदे और तटस्थ देशों से सहानुभूति ऐंठने के लिए हौव्वे के रूप में भारत का इस्तेमाल करता है.

सुलह से ज्यादा टकराव उसे रास आता है, मुल्क के भीतर भी और बाहर भी. कई पाकिस्तानी भारत के साथ अमन की समझदारी में यकीन करते हैं, लेकिन वे इतने ताकतवर नहीं कि छावनी को चुनौती दे सकें.

कृष्णा के लिए डॉ. मनमोहन सिंह का जनादेश 'विश्वास की कमी' को कम करना था. कौन जाने कुरैशी द्वारा एक आतंकवादी के साथ पिल्लई की तुलना करने और कृष्णा को अक्षम व बेतैयार बताने के बाद कितना ‘विश्वास’ रह गया है. नई दिल्ली शत्रुतापूर्ण जवाब न दे, पर थोड़ी-सी बेरुखी और बेपरवाही में कोई हर्ज नहीं.

 

* लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं.

18.07.2010, 10.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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