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सब पर प्रतिबंध

मुद्दा

 

सब पर प्रतिबंध

प्रीतीश नंदी


भारत महान लोकतांत्रिक देश है. हमारे यहां स्वतंत्र मत की प्रणाली है. मीडिया को अपनी बात कहने की आजादी है. हमारे शीर्ष राजनेता आज भी पूरी तरह निरंकुश नहीं हैं. गलतियां करने पर उन्हें कटघरे में खड़े होना पड़ता है.

यही स्थिति हमारे अग्रणी कारोबारियों की भी है. वे भी अपने आपको नियम-कायदे के दायरों से पूरी तरह आजाद नहीं समझ सकते. हम वही पढ़ते हैं, जो हम पढ़ना चाहते हैं. वही देखते हैं, जो देखना चाहते हैं. लेकिन मेरे मन में एक सवाल है. क्या हमारे लोकतंत्र की यह स्थिति हमेशा बनी रहेगी? अगर हालात का जायजा लें तो मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा.

कारण बहुत आसान है. हमारे नेता हमेशा किसी भी समस्या को तुरत-फुरत निपटा देने की फिराक में रहते हैं. इसके लिए वे हमारी मूलभूत स्वतंत्रता से समझौता करने से भी नहीं हिचकते, जो संविधान ने हमें प्रदान की है. साथ ही वे हर मौके का राजनीतिक लाभ उठाने के लिए भी जरूरत से ज्यादा आतुर रहते हैं. वे जानते हैं कि उनका यह रवैया देश के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है, इसके बावजूद वे अपने राजनीतिक स्वार्थो के लिए देशहित को ताक पर रखने से नहीं चूकते. इसके कई उदाहरण गिनाए जा सकते हैं. लेकिन शुरुआत हाल ही की एक घटना से करते हैं और वह है शिवाजी पर जेम्स लेन द्वारा लिखी गई किताब पर प्रतिबंध.

भारत के इतिहास में शिवाजी की जो महती भूमिका है, उससे कतई इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन इतिहास कोई स्तुतिगान नहीं है. कोई महापुरुष चाहे जितना ही महान क्यों न हो, लेकिन वह सवालों के दायरे से परे तो नहीं होता. हमें बिना किसी रोष, उग्रता, पूर्वग्रह और प्रतिबंधों के शिवाजी की विरासत पर बहस या बातचीत करनी चाहिए.

जब पहले पहल इस किताब पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग उठी और विरोध की आग भड़की तो प्रदर्शनकारियों के एक छोटे से समूह ने भारत के सबसे बेहतरीन शोध संस्थानों में से एक को निर्ममता से तहस-तहस कर डाला और बेशकीमती किताबें व पांडुलिपियां नष्ट कर दी गईं. मामला अदालत में पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए किताब से प्रतिबंध हटा दिया कि किसी भी किताब पर महज इस आधार पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती कि कुछ पाठक उसके कुछ हिस्सों की गलत व्याख्या कर सकते हैं. एक तरह से अदालत ने अनेक विद्वानों की इस बात की पुष्टि ही की कि किताब में ऐसा कुछ नहीं है, जो पहले नहीं कहा गया हो. लेकिन अदालत द्वारा किताब से प्रतिबंध हटा लिए जाने के बावजूद उसके प्रकाशक (जो कि दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी प्रेस में से हैं) किताब को वितरित करने से डर रहे हैं. इससे भी बुरी बात तो यह है कि अब महाराष्ट्र सरकार एक ऐसा हास्यास्पद कानून बनाने पर विचार कर रही है, जो राष्ट्रीय नेताओं की आलोचना किए जाने पर रोक लगाएगा.

यह कानून इसलिए हास्यास्पद है, क्योंकि यह हमारे इतिहास पर सवाल खड़े करने और उस पर बहस करने की तमाम गुंजाइशों को सफलतापूर्वक खारिज कर देगा. यह कानून बनने के बाद लोग ऐतिहासिक घटनाओं पर किताबें या नाटक लिखने, शोध पत्र तैयार करने या फिल्में बनाने से भी कतराएंगे.

इतिहास, सेक्स, आस्था, भावना, ये सभी व्यक्तिगत पसंद के मामले हैं. लोकतंत्र का मतलब यह नहीं होता कि वह किसी की पसंद या नापसंद का समर्थन करे. लोकतंत्र का अर्थ होता है सभी पहलुओं का गरिमा के साथ सहअस्तित्व.


आखिर यह कैसे मुमकिन है कि आप महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस के आपसी मतभेदों के बारे में कुछ लिखें और उनमें से किसी के अनुयायियों की भावना को ठेस न पहुंचे? इससे तो सत्य के पुनमरूल्यांकन की कवायद ही थम जाएगी. अनुसंधान और विद्वत्ता की आत्मा ही मर जाएगी. यदि यह कानून पास हुआ तो यह हमारे लोकतंत्र पर एक बहुत बड़ा धब्बा होगा.

यह घटना मेरा ध्यान एक बड़े मसले की ओर खींचती है- आज कोई भी छोटा-मोटा समूह, कोई भी हो-हल्ला मचाने वाला जत्था भारत की उदारवादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की महान परंपराओं के साथ खिलवाड़ कर सकता है.

आजा नचले फिल्म के गीत की एक पंक्ति की गलत व्याख्या करते हुए यह मतलब निकाल लिया जाता है कि वह किसी जाति विशेष के विरुद्ध है और सेंसर बोर्ड द्वारा फिल्म को हरी झंडी दिए जाने के बावजूद उस गीत को बदलना पड़ता है. महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे पर आधारित एक नाटक पर इस डर से रोक लगानी पड़ती है कि वह गांधी समर्थकों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है. इसी विषय पर बनी एक अन्य फिल्म नाइन ऑवर्स टु रामा पर भी पाबंदी लगाई गई थी.

आपातकाल के दौरान किस्सा कुर्सी का नामक एक फिल्म पर न केवल पाबंदी लगा दी गई थी, बल्कि उसकी रीलों को भी नष्ट कर दिया गया था. चंद मुस्लिम समुदायों को शांत करने के लिए सलमान रुश्दी की सेटेनिक वर्सेस प्रतिबंधित कर दी गई थी. दो क्लासिक उपन्यास डीएच लॉरेंस का लेडी चैर्टलीज लवर और हेनरी मिलर का ट्रॉपिक ऑफ कैंसर आज भी प्रतिबंधित हैं. वेबसाइटों पर तो रोक लगती ही रहती है. सेंसर बोर्ड यह हवाला देते हुए पुरस्कृत फिल्मों में कतरब्योंत करता रहता है कि कोई फलां-फलां संवेदनशील तबका इससे आहत हो सकता है.

इतिहास, सेक्स, आस्था, भावना, ये सभी व्यक्तिगत पसंद के मामले हैं. लोकतंत्र का मतलब यह नहीं होता कि वह किसी की पसंद या नापसंद का समर्थन करे. लोकतंत्र का अर्थ होता है सभी पहलुओं का गरिमा के साथ सहअस्तित्व. लेकिन दिन-ब-दिन यह देखने में आ रहा है कि अलग-अलग धर्म, पंथ, संप्रदायों के लोगों के छोटे-मोटे समूह विरोध का स्वर मुखर करने में पीछे नहीं रहते, जबकि हम जैसे बहुसंख्य लोग खामोश रहते हैं क्योंकि हम किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते. इससे होता यह है कि उन मुट्ठी भर लोगों का हौसला बुलंद होता जाता है. उनकी मांगें दिन-ब-दिन बढ़ती चली जाती हैं.

यदि यही सब कुछ चलता रहा तो हम जल्द ही एक ऐसा देश बनकर रह जाएंगे, जिसमें हर चीज पर प्रतिबंध है. किताबों पर प्रतिबंध, फिल्मों पर प्रतिबंध, गीतों पर प्रतिबंध, कॉमिक स्ट्रिप चरित्रों पर प्रतिबंध, बियर बारों, पूल पार्लरों पर प्रतिबंध, अंतरजातीय विवाह पर प्रतिबंध. हम क्या खाएं, क्या पिएं, क्या पहनें, क्या पढ़ें, क्या देखें, इंटरनेट पर क्या खोजें, किस बारे में मजाक करें, किस मसले पर बहस करें, इस सब पर प्रतिबंध.

यदि हम सावधान नहीं हुए तो जल्द ही हम ऐसा देश बनकर रह जाएंगे, जहां गुंडे-बदमाश सीना चौड़ाकर सड़कों पर घूमेंगे और यह मांग करेंगे कि हम अपनी आस्थाओं को उनकी आस्थाओं के सामने कमतर समझें और उनके हर हुक्म की तामील करें. यह वे तय करेंगे कि हमारे लिए क्या भला है और क्या बुरा. हमारी सेहत के लिए क्या अच्छा है और क्या नहीं और सरकार हमारी रक्षा करने के बजाय राजनीतिक औचित्य का हवाला देते हुए उनके सामने घुटने टेक देगी. चाहे इसका मतलब हमारी उस स्वतंत्रता का हनन ही क्यों न हो, जिसे हम लंबे समय से संजोए हुए हैं.

22.07.2010, 00.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Laddakh

 
 शुक्रिया, प्रीतीश जी, गीदड़ और सियार इकट्ठे होकर हुआ-हुआ करते हैं. अपनी गली में हर कुत्ता शेर है. मगर सच्चा, नया और अनोखा विचार सदियों तक हर नस्ल और हर तहजीब को पढना, अपनाना और फैलाना ही पड़ता है. आपको याद होगा प्रीतीश जी, आपने 1980 के दशक में जिन ओशो रजनीश को ‘मूर्ख दार्शनिक’ कहा था, 1985 में जब सारी दुनिया ने उनका बहिष्कार किया, तो उनके पक्ष में लड़ने वालों में आप सबसे आगे थे. यह है स्वतंत्रता का सम्मान! जिन बन्दर टोला और मुम्बैया गली के शेरों की तरफ आप सीधी ऊँगली उठा रहे हैं, वो सब ओशो रजनीश के खिलाफ रहे. हर कहीं से उन्होंने ओशो के खिलाफ मुक़दमे दर्ज कराये. आज हर कहीं ओशो मौजूद हैं अपनी 1000 से अधिक चिंतनपूर्ण किताबों के साथ. और ये किताबें कुतरने वाले चूहे और संगठित गीदड़ कितने मुर्दा नज़र आ रहे हैं. इन्हें कौन याद करेगा, जबकि समझ-बूझ वाला एक व्यक्ति भी इन्हें नहीं पूछता?
सच्ची आवाज़ ने कभी संगठित चूहों की परवाह नहीं की है. इन जाहिलों से सावधान रहना ज़रूरी है, मगर इनसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं है.
 
   

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