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भ्रष्टाचार का खेल

बाईलाइन

 

भ्रष्टाचार का खेल

एमजे अकबर


भ्रष्टाचार के आखरी छोर को क्या खोजा जा सकता है? क्या कभी ऐसा होगा कि इस छोर पर आकर भ्रष्टाचार से तंग होकर जनता की भावनाएं भड़के और उदासीनता गुस्से में बदल जाये? उससे भी आगे बढ़कर क्या कभी ऐसा मौका भी आयेगा जब यह गुस्सा एक जनाक्रोश में तब्दील हो जाये.

दरअसल, भ्रष्टाचार ने खुद को और मजबूत करने के लिए सुरक्षित कवच ढूंढ़ लिया है. उसे अपने खात्मे की चिंता भी नहीं है, क्योंकि जब हमाम में सभी नंगे हैं, तो चिंता किस बात की. यह ऐसा सार्वभौमिक सत्य हो गया है, जो भ्रष्टाचारियों को बचने का सबसे बड़ा हथियार दे देता है. अगर समाज में सभी चोर ही हो जायेंगे, तो जाहिर है कि चोरी कानून बन जायेगी.

शायद हमारे देश में भ्रष्टाचार भी इसी मौके की तलाश में है. लुटेरों के भी कुछ अपने उसूल होते हैं और वे अपने पेशे से जुड़े हुए लोगों के घर में सेंध नहीं लगाते. क्योंकि उन्हें पता है कि इससे तो बस आपसी मतभेद होगा, हासिल कुछ नहीं होगा.

वे तो बस आम जनता के घर में सेंध लगाते हैं. क्योंकि उन्हें पता है कि जनता के पैसों से इकठ्ठा हुए सरकारी खजाने में इतनी आमद हैं कि वे पूरा खा जाने की कितनी भी कोशिश करें तब भी कुछ न कुछ तो बच ही जायेगा. यह लूट अब दिन-दहाड़े होती है, क्योंकि रात में चौकीदार के पहरे का खतरा रहता है. अब चोरी करने वालों को रात के साये की जरूरत नहीं है क्योंकि उन्हें पता है कि पहरुए खरीदे जा चुके हैं और बिका हुआ हाकीमखर्राटे ले रहा है.

मैं पिछले शनिवार को एक अंगरेजी दैनिक में छपे कुछ तथ्य रखना चाहता हूं. यह पूरी कहानी नहीं बस किसी कहानी का हिस्सा भर है. केंद्रीय सतर्कता समिति ने कॉमनवेल्थ खेलों के लिए स्टेडियम के रख-रखाव, सड़क निर्माण और लाइट्स ओद के निर्माण से जुड़ी हुई 16 परियोजनाओं की जांच की.

भ्रष्ट इससे राहत में हैं कि सभी राजनेताओं की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है. लेकिन इस शून्य से सरकार को ज्यादा राहत नहीं हासिल होने वाली.


समिति ने इस जांच में पाया कि 2477.22 करोड़ की लागतवाली इन परियोजनाओं के लिए जारी गुणवत्ता प्रमाण पत्र या तो जाली था, या फ़िर संदेहास्पद. इस पूरे प्रकरण में कहीं न कहीं से भ्रष्टाचार की गंध आ रही है.ऐसा नहीं है कि यह गंध केवल अपने देश से आ रही है. यह अंतरराष्ट्रीय है. लेकिन यह कॉमनवेल्थ गेम है और हम क्वीन बैटन के मेजबान हैं. जाहिर है यह बैटन क्वीन ऐलजाबेथ के सम्मान से जुड़ी है, तो इसके सम्मान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी हमारी है. लेकिन हमारी तो जैसे पहचान ही बन गयी है कि हमारा कोई भी आयोजन भ्रष्टाचार के साये से अछूता रह ही नहीं सकता. ब्रिटिश अधिकारियों ने इस घपले का छोटा सा सुराग दिया है.

कॉमनवेल्थ खेलों की आयोजन समिति ने एक ऐसे सौदे के तहत वीडियो उपकरणों के लिए एमए फ़िल्म्स यूके लिमिटेड नामक ब्रिटिश कंपनी को ब्रिटिश पाउंड्स में 1.68 करोड रुपये चुकाये हैं. जिनमें न तो टेंडर जारी किये गये और न ही कोई कागजी लिखा-पढ़ी हुई. इस कंपनी के ऑफ़िस का जो पता रजिस्टर किया गया है वह बस एक व्हेकिल हायर लिमिटेड है. कहां की कंपनी है, इसका कोई उल्लेख नहीं. और कंपनी का जो रेकॉर्ड है उसमें साफ़ कहा गया है कि यह कंपनी किराये पर कार देती है, सेनेटरी और रोड बैरियर बनाती है. वीडियो इक्िवपमेंट का कोई उल्लेख है ही नहीं.

इस पूरे प्रकरण का खुलासा होने पर कंपनी के डायरेक्टर ने बड़ी ही सहजता से 14 जुलाई को कंपनी से इस्तीफ़ा दे दिया. लेकिन आयोजन समिति बड़ी ही सफ़ाई से इन सब आरोपों पर परदा डालने की कोशिश कर रही है. पर विडंबना तो यह है कि इस परदे में इतने छेद हैं कि झूठ छिपाने से भी नहीं छिप रहा है.

खेल मंत्री एमएस गिल ने संसद में स्वीकार किया है कि इस तमाशे की शुरुआत 2003 में हुई थी और तब से कॉमनवेल्थ खेल की तयशुदा लागत 17.5 गुना बढ़ गयी. लेकिन यह सरकार तो ऐसी चुप बैठी है जैसे उसे कुछ पता ही न हो. क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह नहीं पता है कि संसद में क्या चल रहा है. क्या वे अखबार नहीं पढ़ते.

फ़िर यह खामोशी क्यों? मनमोहन सिंह शायद उन आरोपियों के साथ इन खेलों का उद्घाटन करने को तैयार हैं जिन पर लूट का मुकदमा चलना चाहिए. लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि खामोश बुत बनकर वह कीचड़ से लंबे समय तक दूर नहीं रह पायेंगे क्योंकि वह उनके पैरों के इर्द-गिर्द तक फ़ैल चुका है. एक समय ऐसा आयेगा कि इस खामोशी के खिलाफ़ इतनी ऊंची आवाज उठेगी जिसे भाषणों के शोर से दबाया नहीं जा सकेगा.ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या हम 1973 जैसी किसी स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं. 1971 के चुनावों में इंदिरा गांधी इतने बड़े अतंर से जीती थीं कि खुद कांग्रेस भी अपनी इस सफ़लता से हैरान थी.

दिसंबर 1971 में बांग्लादेश की सफ़लता ने उनके राजनीतिक कैरियर को सबसे बड़ी ऊंचाई दे दी थी. लेकिन एक साल के भीतर ही महंगाई ने ऐसा वार किया कि अवाम का मन बदलने लगा. 1974 तक तो यह आलम हो गया कि जय प्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के नैतिक अधिकार पर ही सवाल खड़ा कर दिया. लेकिन अब वक्त बदल गया है, क्योंकि 2010 में कोई जयप्रकाश नहीं है.भ्रष्टाचारियों के लिए यह सबसे बड़ी राहत है, क्योंकि खुद राजनेताओं की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है.

विपक्ष भी अपनी भूमिका तलाशने में अक्षम है. लेकिन ईमानदारी की यह शून्यता सरकार को लंबे समय तक राहत दे पायेगी, इसमें संशय है. महंगाई का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ा है जिनकी आमदनी एक दिन में बस सौ रुपये तक सीमित है. सही है कि गरीब के गले से विरोध के स्वर देर में फ़ूटते हैं, क्योंकि उसका ज्यादातर समय तो अपना पेट भरने की जुगत में ही निकल जाता है. लेकिन सब्र की भी इंतहा होती है और यह तय है कि 2009 के चुनावों में छला हुआ देश का मतदाता इसका जवाब जरूर देगा.

 

* लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं.

05.08.2010, 12.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 अकबर जी और पाठक साहिबान,

क्या आप विश्वास करेंगे कि दुनिया में आज भी ऐसी जगहें हैं, जहां के लोग बाज़ार नहीं जाते. मैं हिमालय में अक्सर ऐसी जगहों पर आता-जाता हूँ. वहाँ कुदरत सब देती है. याक आज भी कई जगह कामधेनु है. अगर उन तक भी बाज़ार और भ्रष्टाचार के ठेकेदार पहुँच गए तो दुनिया से वह बीज मिट जाएगा, जिसके बचे रहने से मनुष्य हर बार बड़ी से बड़ी बेवकूफियों से तबाह होने पर भी बचा रह गया है.

ये देश यों तो ज्ञान-विज्ञान का सबसे प्राचीन दावेदार है, लेकिन सामने जो हो रहा है, उसे देख कर भी अनदेखा कर देने का आदि हो चुका है. यहाँ साहित्यकार तक बिना संगठित हुए सच कहने से डरते है. नपुंसक ! अब वही बचेगा जो सजग है. देश भीड़ के मुर्दों से नहीं, व्यक्तियों से चलते और फलते हैं. एक बार वही बचे और अपने जैसे विवेकशील लोगों को बचायें.

जो लोग अपने गिरोह या कबीले को बचाना अपना धर्म समझते हैं, अब वही सबसे पहले मरेंगे. जिनके पास कुछ नहीं बचा वे कहीं भी निकल कर जीने लगे है. मैं उनमे एक हूँ. पृथ्वी का बोझ किसी न किसी बहाने कम होना ही है. ज़रूरी नहीं कि चेचक या हैजा फैले. भ्रष्टाचार से बड़ी और कोई ला-इलाज महामारी नहीं है. अगर वह बीमारी इस देश को प्राणों से प्यारी है तो यह देश मर चुका है. जीने का तरीका और सलीका जिन्हें आता है वो जी सकते हैं नए उपाय और नए हुनर से.
 
   

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