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विश्वास का संकट

मुद्दा

 

विश्वास का संकट

प्रीतीश नंदी


हर आदमी धीरे-धीरे इसीलिए अकेला होता जा रहा है, क्योंकि उसने अब अपने आसपास के लोगों पर भरोसा करना छोड़ दिया है. यह सच है कि अब दुनिया उतनी सरल नहीं रही, जैसी वह कभी हुआ करती थी. लेकिन जैसे ही हम भरोसा करना छोड़ देते हैं, वैसे ही हम खुद को भीतर से बंद कर लेते हैं और अकेलेपन की कंदरा में खो जाते हैं. हम प्यार कम करते हैं और डरते ज्यादा हैं.

हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जो भरोसा करना भूलती जा रही है. इससे भी बुरा यह कि हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां भरोसे की इसी खाई के इर्द-गिर्द नए उद्योग पनप रहे हैं. वे हमें मजबूर करते हैं कि हम कम से कम भरोसा करें और भय की भावना से ज्यादा से ज्यादा ग्रस्त हों.

सुरक्षा के नाम पर होने वाला समूचा कारोबार जाने-पहचाने खतरों से हमारी रक्षा नहीं करता. इसके उलट वह तो भय का ऐसा माहौल बना रहा है, जहां हम किसी भी अनजानी चीज से खुद को डरा हुआ महसूस करते हैं. मेडिकल ट्रीटमेंट भी इसी राह चल रहे हैं. पहले हमें बीमारियों का डर रहा करता था. आज हम बीमारियों के अंदेशे तक से डरे हुए रहते हैं.

लिहाजा हम बार-बार अपनी जांच करवाते हैं, पैथोलॉजी टेस्ट करवाते हैं, डॉक्टरों की चौखट पर बार-बार आमद दर्ज करवाते रहते हैं. नए अध्ययनों के नाम पर अखबारों में जो डराने वाले लेख छपते हैं, वे किसी भी भले-चंगे आदमी को अपनी सेहत को लेकर शंकाओं से भर देने के लिए काफी हैं.

बीते हफ्ते मैंने एक ऐसे ऑटो ड्राइवर के बारे में पढ़ा, जिसे एक बच्ची से बलात्कार के संदेह में पुलिस ने उठवा लिया था. वह अब भी संदिग्ध आरोपी ही है. उसके खिलाफ जो सबूत मिले, वे कुछ भी साबित नहीं करते. उसे जमानत मिल सकती है, लेकिन कोई भी उसकी गारंटी देने को तैयार नहीं. यहां तक कि उसके करीबी दोस्त और उसका अपना परिवार भी उसका विश्वास नहीं करते.

उसके पास अपनी जमानत के पैसे नहीं हैं. उसकी बीवी उसे छोड़कर जा चुकी है और किसी और व्यक्ति के साथ ब्याह रचाकर नया घर बसा चुकी है. वह कहती है कि वह ऐसे किसी आदमी के साथ गुजारा नहीं कर सकती, जिस पर इतने घृणित अपराध का संदेह है.

उसके परिवार ने उससे इसलिए किनारा कर लिया है, क्योंकि उन्हें डर है कि उसके बचाव के लिए कोई कदम उठाने पर उनका अपने पास-पड़ोस में ही उठना-बैठना बंद हो सकता है. वो अपने घर भी नहीं लौट सकता क्योंकि उसे डर है कि वहां उसे मार दिया जाएगा.

इस आदमी के खिलाफ पाए गए सबूत अभी अदालत में भी नहीं पहुंचे, लेकिन उसकी जिंदगी पहले ही तबाह हो चुकी है. उसे गिरफ्तार किए जाने की खबर भर ने उसके जीवन की तस्वीर बदलकर रख दी. इस आदमी को इस बात की सजा नहीं मिल रही है कि उसका अपराध साबित हो गया है. उसे इस बात की सजा मिल रही है कि हमारा समाज अब भरोसा करने की ताकत खो चुका है. हम हमेशा किसी भी व्यक्ति की बुराइयों को मान लेने के लिए तैयार रहते हैं.

मैं एक अति सुरक्षित बहुमंजिला इमारत के चौबीसवें माले पर रहता हूं, जिसमें बिना आईडी कार्ड कोई दाखिल नहीं हो सकता. इसके बावजूद कितनी दफे मैंने घर का दरवाजा खुला छोड़ा है? कभी नहीं. कितनी दफे मैंने अपनी कार को जरा देर के लिए अनलॉक छोड़ दिया है? कभी नहीं. कितनी बार मैं किसी जरूरतमंद की मदद करने के लिए सड़क पर अपनी गाड़ी रोकता हूं? उतनी बार नहीं, जितनी बार मुझे रोकना चाहिए.

कितनी बार मैं किसी भूखे आवारा कुत्ते को कुछ खिलाने के लिए रुकता हूं? उतनी बार नहीं, जितनी बार मैं रुक सकता हूं. क्यों? क्योंकि मेरे जेहन में यह डर पैवस्त हो चुका है कि ऐसा करने पर मैं मुश्किल में पड़ सकता हूं. कितनी बार मैं किसी हादसे के शिकार व्यक्ति की मदद करता हूं? बमुश्किल कभी.

क्योंकि मुझे डर है कि इससे मुझे किसी पुलिस केस में घसीट लिया जाएगा. कितनी बार मैं किसी लावारिस बच्चे को पैसा देकर उसकी मदद करता हूं? उतनी बार नहीं, जितनी बार मैं करना चाहता हूं. क्योंकि मुझे डर है कि शायद इस तरह मैं भीख मांगने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा होऊंगा. हमारी हर छोटी से छोटी हरकत के पीछे भरोसे की कमी झलकती है.

हम प्यार कम करते हैं और डरते ज्यादा हैं. हम वहां भी कुछ न कुछ गलत होने का अंदाजा लगा लेते हैं, जहां कुछ भी गलत नहीं था.


इसी कारण हमें टूटती दोस्तियों और बिखरते रिश्तों की कहानियां सुनना अच्छा लगता है. ऐसे मौकों पर हम हमेशा यह कहने को तैयार रहते हैं: ‘मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था!’ हम हमेशा अपने दोस्तों, नाते-रिश्तेदारों, सहकर्मियों, बच्चों को चौकस रहने की हिदायत देते रहते हैं. मां की अपने बच्चे को पहली यही हिदायत होती है कि किसी अजनबी से खाने की चीज न ले.

बीवियों की अपने पति को यही चेतावनी होती है कि खूबसूरत सेक्रेटरी रखने के बारे में सोचें भी नहीं. दोस्त एक-दूसरे को मशविरा देते हैं कि खूबसूरत या कामयाब व्यक्ति से शादी करने से पहले दो बार सोच लें. दरअसल आप जब भी किसी से कोई सलाह मांगते हैं तो बदले में आपको चेतावनियां ही मिलती हैं. हर चीज के बारे में हमारी पहली प्रतिक्रिया होती है: ‘देखना, जरा संभल के.’

भरोसे की इसी कमी को मीडिया भुनाता है. मेरी बेटियां हॉलीवुड की नामी-गिरामी शख्सियतों का एक शो देखती हैं. इस शो में कुल जमा यही बातें की जाती हैं कि किस तरह सभी एक-दूसरे को धोखा दे रहे हैं. हम भूल जाते हैं कि मीडिया और समाज का आपसी रिश्ता होता है. हम भरोसा तोड़ने की जितनी कहानियां दिखाते हैं, हमारे संबंध उतने ही कम भरोसे के लायक बनते जाते हैं.

केवल विवाह और प्रेम संबंध ही नहीं टूट रहे हैं, अविश्वास की खाई हमारे परिवार, समाज और हमारे समुदाय में भी पसरती जा रही है. उत्तरप्रदेश में यादव दलितों पर भरोसा नहीं करते. बिहार में दलित ब्राrाणों पर भरोसा नहीं करते. पाकिस्तान में सुन्नी शियाओं पर भरोसा नहीं करते. मुंबई के स्थानीय लोग किसी पर भरोसा नहीं करते. हरियाणा में बड़े-बुजुर्ग अपनी बेटियों पर ही भरोसा नहीं करते. वे खानदान की इज्जत के नाम पर बेरहमी से उनका कत्ल कर देते हैं.

हर आदमी धीरे-धीरे इसीलिए अकेला होता जा रहा है, क्योंकि उसने अब भरोसा करना छोड़ दिया है. यह सच है कि अब दुनिया उतनी सरल नहीं रही, जैसी वह कभी हुआ करती थी. लेकिन जैसे ही हम भरोसा करना छोड़ देते हैं, वैसे ही हम खुद को भीतर से बंद कर लेते हैं और अकेलेपन की कंदरा में खो जाते हैं.

हम प्यार कम करते हैं और डरते ज्यादा हैं. हम वहां भी कुछ न कुछ गलत होने का अंदाजा लगा लेते हैं, जहां कुछ भी गलत नहीं था. कुछ भी शक और गफलत के दायरे के परे नहीं रह गया है. भरोसा नहीं करने और गलतियां ढूंढ़ने की अपनी इसी प्रवृत्ति के चलते हम दिन-ब-दिन नाखुश, भयभीत और शंकालु होते चले जा रहे हैं.

भरोसे की कमी के चलते ही हमारे भीतर डर अपना डेरा डाल लेता है. यही डर दिन-ब-दिन हमें नुकसान पहुंचाता जा रहा है, क्योंकि जिंदगी को महज डरकर नहीं जिया जा सकता. जिंदगी में भरोसे की भी जगह है. जिंदगी में सम्मान, प्रेम और विश्वास की भी जगह है. यदि हम इन सबसे महरूम हो गए तो हमारे जीवन में कोई अर्थ नहीं रह जाएगा.

05.08.2010, 12.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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