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आतंकवाद का धर्म

मुद्दा

 

आतंकवाद का धर्म

राम पुनियानी


जब से प्रज्ञा सिंह ठाकुर, दयानंद पाण्डे आदि द्वारा आतंकी हमलों की साजिश रचने और उन्हें अंजाम देने की खबरें सामने आई हैं तब से ‘हिन्दू आतंकवाद’ शब्द आम प्रचलन में आ गया है. विभिन्न एजेंसियों द्वारा की गई जांच से यह पता लगा है कि हिन्दू राष्ट्र व हिन्दुत्व की विचारधारा से प्रेरित ये संगठन, मालेगांव, मक्का मस्जिद, अजमेर, गोवा एवं समझौता एक्सप्रेस धमाकों के पीछे हो सकते हैं. इन संगठनों में बजरंग दल, अभिनव भारत, सनातन संस्था आदि शामिल हैं.

इसके विपरीत, हिन्दुत्व की राजनीति के झंडाबरदारों का कहना है कि हिन्दू धर्म को आतंकवाद से जोड़ना पूर्णतः अनुचित है क्योंकि आतंकवाद पर केवल उन धर्मों का एकाधिकार है, जिनके पैगम्बर हुए हैं अर्थात इस्लाम, ईसाई धर्म और यहूदी धर्म. कुछ टिप्पणीकार कहते हैं कि इन तीनों धर्मों के अनुयायियों का धार्मिक आतंकवाद का लंबा इतिहास रहा है जबकि हिन्दुओं ने कभी आतंक का सहारा नहीं लिया.

ईसाईयत, यहूदी धर्म और इस्लाम में तीन समानताएं हैं. पहली, उनके अनुयायी स्वयं को इब्राहीम की संतान मानते हैं, दूसरी, तीनों धर्म एकेश्वरवादी हैं व तीसरी, उनकी एक ही धार्मिक पुस्तक है.

इब्राहीम को अपना पूर्वज मानने वाले तीनों धर्मों की मान्यता है कि ईश्वर ने पैगंबरों के जरिए, मानवता को अपना संदेश भेजा. इसके विपरीत, हिन्दू धर्म का कोई पैंगबर नहीं है और वह शनैः शनैः विकसित हुआ है. समय के साथ, नई परंपराएं व पंथ उसके हिस्से बनते गए. इन परंपराओं में वैदिक, उत्तर-वैदिक, मध्यकालीन व आधुनिक परंपराएं शामिल हैं. कोई हिन्दू नास्तिक भी हो सकता है, एकेश्वरवादी भी और कई भगवानों में आस्था रखने वाला भी.

हिन्दू धर्म के सिद्धांतों के इसी लचीलेपन व उदारता का फायदा उठाकर कुछ तत्व अपने बेहूदा विचारों को भी हिन्दू धर्म का हिस्सा घोषित कर देते हैं. धर्म एक जटिल संस्था है. इसमें धार्मिक संस्थान, पवित्र पुस्तकें, रीति-रिवाज, रूढ़ियाँ व परंपराएं शामिल हैं. इन सबका हमेशा एक-दूसरे से मेल खाना न तो संभव है व न आवश्यक.

आखिर एडोल्फ हिटलर और नेल्सन मंडेला एक ही धर्म के थे. महात्मा गाँधी और नाथूराम गोडसे का धर्म एक था. खान अब्दुल गफ्फार खान और ओसामा बिन लादेन एक ही धर्म के अनुयायी थे.


धार्मिक शिक्षाओं की व्याख्या, तत्कालीन सामाजिक संदर्भो में की जानी चाहिए. हर धर्म, शांति व सद्भाव को महत्व देता है परंतु साथ ही हर धर्म में हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराने वाले तत्व भी हैं. बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि किसी धार्मिक सिद्धांत की व्याख्या कौन व किस उद्देश्य से कर रहा है. एक ही उद्धरण की कई व्याख्याएं की जा सकती हैं. इब्राहीम को अपना पूर्वज मानने वाले धर्मों में हिंसा की यत्र-तत्र चर्चा मात्र से ये धर्म, हिंसा व आतंक के प्रणेता नहीं बन जाते. हिंसा और आतंक की जन्मदाता, सामाजिक परिस्थितियाँ होती हैं, धार्मिक सिद्धांत नहीं. कई बार शासक व राजा अपने साम्राज्य का विस्तार करने की अपनी महत्वकांक्षा को क्रूसेड्, जिहाद या धर्मयुद्ध का नाम देकर उस पर धर्म का मुलम्मा चढ़ा देते हैं.

हिन्दू धर्म एक ओर तो “वसुधैव कुटुम्बकम” की बात करता है तो दूसरी ओर जाति प्रथा के रूप में हिंसा उसके मूल ढ़ांचे का हिस्सा है. वेदों से लेकर मनुस्मृति तक में वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा का उल्लेख है और कुछ साधू-संत आज भी जाति प्रथा को औचित्यपूर्ण ठहराते हैं. महाभारत में भगवान कृष्ण स्वयं अर्जुन से अपना धार्मिक कर्तव्य पूरा करने के लिए हथियार उठाने का आव्हान करते हैं. रामायण में हिन्दू धर्म के रक्षार्थ, भगवान राम, शंबूक का वध करते हैं. हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धो का जनसंहार किया था.

आज भी, धार्मिक व जातिगत परंपराओं के नाम पर खाप पंचायतें युवा जोड़ों का कत्ल कर रहीं है. मेंगलोर के पब में लड़कियों की इसलिए पिटाई की गई क्योंकि वे हिन्दू पंरपराओं के विरूद्ध आचरण कर रहीं थीं. अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा इस आधार पर भड़काई जाती है कि हिन्दू धर्म ‘खतरे’ में है और उसकी ‘रक्षा’ की जानी चाहिए.

विभिन्न धर्मों के कई अनुयायियों का आचरण धर्मसम्मत नहीं होता. आखिर एडोल्फ हिटलर और नेल्सन मंडेला एक ही धर्म के थे. महात्मा गाँधी और नाथूराम गोडसे का धर्म एक था. खान अब्दुल गफ्फार खान और ओसामा बिन लादेन एक ही धर्म के अनुयायी थे. यह सोचना पूरी तरह से गलत है कि हिंसा के पीछे धर्म होता है.

दुर्भाग्यवश, आज की दुनिया में अमरीका की तेल संसाधनों पर कब्जा करने की लिप्सा ने जिस राजनीति को जन्म दिया है, वह धर्म का लबादा ओढ़े हुए है. अमरीका द्वारा स्थापित मदरसों में ही इस्लाम की दो महत्वपूर्ण अवधारणाओं-काफिर व जिहाद को विकृत अर्थ दिया गया ताकि अफगानिस्तान से रूसी सेनाओं को खदेड़ने के लिए अल् कायदा के लडाकों को तैयार किया जा सके.

अमरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़ा और उसे प्रचारित किया. इस शब्द का इतना उपयोग किया गया कि वह सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया और आमजन, हिंसा को एक धर्म-विशेष से जोडने लगे. ऐसे में यह स्वभाविक था कि जब हिन्दू राष्ट्र के पैरोकार कुछ हिन्दू संगठनों की आतंकी घटनाओं में संलिप्तता सामने आई तो कुछ पत्रकारों ने ‘हिन्दू आतंकवाद’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया.

हिन्दू आतंकवाद शब्द का उपयोग उतना ही गलत है जितना कि इस्लामिक आतंकवाद या ईसाई आतंकवाद का. ईसाईयत भी शांति की बात करता है और इस्लाम भी अल्लाह के प्रति समर्पण के जरिए शांति की स्थापना का पक्षधर है. इस सिलसिले में गाँधीजी के जीवन को हम धार्मिक शिक्षाओं के अनुरूप आचरण का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कह सकते हैं. ओसामा व गोडसे के राजनैतिक लक्ष्य थे, जिन पर उन्होंने धर्म का मुलम्मा चढ़ाया. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, दयानंद पांडे व अन्यों के गिरोह की कारगुजारियों के बावजूद, हमें उनकी कुत्सित हरकतों को ‘हिन्दू आतंकवाद’ की संज्ञा देने से बचना चाहिए. धर्म को राजनीति ही नहीं, आतंकवाद से भी विलग रखा जाना आवश्यक व वांछनीय है.

05.08.2010, 12.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Pallav Journo Delhi

 
 बहुत बढिया आलेख। धर्म अगर समाज को जोडने तक के दायरे में रहे तो वह ठीक है, अगर वो लोगों को बरगला रहा हो, तो ऐसे धर्म का फिर क्या काम? जैन और बौद्ध मत दोनो का विकास ही हिंदू धर्म में व्‍याप्‍त ब्राहम्णवाद की विकृतियों की वजह से हुआ था, प्राचीन चार्वाक मत भी हिंदू धर्म का एक सुधरा हुआ रूप था।

जहां तक मास मीडिया और उसकी इस डिक्शनरी का सवाल है, तो पत्रकारों को एक ढर्रे पर चलने की आदत पडी हुई है, कोई एक ट्रेंड बना दीजिए और वो उसे आसानी से फॉलो कर लेंगे, और फिर दुनिया का पावरफुल मीडिया तो वॉशिंगटन में बैठा हुआ है।
 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Laddakh

 
 पुनियानी जी, धन्यवाद.

लद्दाख के मुख्यालय लेह में पिछली देर रात बादल फटने से इतनी तबाही हुई है कि वहाँ के हिन्दू, मुसलमान और बौद्ध भूल चुके हैं कि वे किस संगठित धर्म के हैं. एक आदमी दूसरे आदमी को आदमी जैसा होकर देख रहा है.

हम तभी क्यों मनुष्य बन पाते हैं जब जान पर आ बनती है? आपने ठीक कहा कि इस्लामी आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद शब्द और उनका प्रचार दुश्मनियों को बाधा रहा है.

सच यही है कि जो भी मनुष्य अपनी तरफ के लोगों के भड़काने पर दूसरी तरफ के लोगों पर हमला करना चाहता है, वही आतंकी है. एक जैसा खून खौलता है. ऐसे लोग किसी भी धर्म के हों, इनकी मानसिकता एक जैसी होती है. बीमार ! ये संगठित हुए बिना किसी बात का जवाब नहीं दे सकते. और संगठित होकर सिर्फ अपने गिरोह की तरफदारी करके झगडा पैदा करते हैं.

इस वक्त मुझे लेह में मरने वाले करीब 100 लोगों और घायल लोगों और उनके परिवारों की चिंता है. पता नहीं किसका क्या मजहब है? जहां भी आफत सब पर आती है, हम एक हो जाते हैं, मगर जब नहीं आती, हम एक-दूसरे को मारने की ताक में रहते हैं. क्यों?

क्या इसका कोई इलाज है? जी हाँ. सबसे पहले हम अपने भीतर की गहरी जांच करें या करवाएं और नेक लोगों से नेक सीख लें. हर व्यक्ति जब तक सही नहीं हो जाता उसे उसके संगठित माहौल से दूर भी रखना होगा. बौद्ध धर्म में सबसे ज्यादा शान्ति क्यों है? क्योंकि वहाँ बचपन से ही एकांत में रहना और अपने आप को गहराई से देखना लाज़िमी है.

मैं बौद्ध नहीं हूँ. हिन्दू या मुसलमान होने का तो सवाल ही नहीं. मनुष्य होने की ही जुगत कर सकूं तो बहुत है. और इसके लिए कहीं कोई कठिनाई नहीं है. हम जैसे हैं वैसे हो जाएँ, बाहर से पड़ी धूल को झाड लें. पता नहीं इस धूल को हम अपना धर्म क्यों मान लेते हैं? हर व्यक्ति अलग है. इस अनूठेपन का विकास हो, ताकि दूसरों को वह विकास रास आये. सबको सबसे कुछ न कुछ मिले.


मगर, पुनियानी जी, जब तक हम संगठन या भीड़ में हैं, हिंसा अपरिहार्य है. फिर वही धर्म हमारा धर्म है. फिर दोनों तरफ से दलीलों की कोई कमी नहीं. फिर जिन्हें मरना या मारना ही है, उनके बीच रहने वाले मरेंगे ही. मरना ही चाहिए. अपने-अपने गिरोह ही सही हैं तो यह सजा काटनी ही पड़ेगी. निरपराध औरतें, बच्चे-बूढ़े बुरी तरह मरेंगे ही.

किस से पूछें कि ये किस जन्म या किस अपराध की सजा है. अभी और यहीं से विकास किये बिना मुक्ति नहीं है.
 
   

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