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ब्लैकबेरी के बहाने

बहस

ब्लैकबेरी के बहाने

प्रीतीश नंदी

मैं ब्लैकबेरी का इस्तेमाल नहीं करता. मेरा बेटा और मेरी बेटियां जरूर ब्लैकबेरी रखते हैं. मैं दुनिया के सबसे बोरिंग फोन का इस्तेमाल करता हूं. एक ऐसा फोन, जो स्मार्टफोन की दौड़ में अब काफी पीछे छूट गया है. किसी जमाने में नोकिया काफी जाना-माना ब्रांड होता था, लेकिन अब ब्लैकबेरी और आईफोन के दौर में नोकिया बीते दिनों की बात हो गया है.

फिर क्या वजह है कि मैं नए जमाने के किसी स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने के बजाय पुराने फैशन के एक फोन से ही अपना काम चला रहा हूं? मेरी दलीलें सुनने में जरा हास्यास्पद लग सकती हैं. सबसे पहली बात तो यह कि मुझे टच फोन जरा भी नहीं भाते.
मुझे भोजन को छूने से कोई गुरेज नहीं है. मैं आज भी छुरी-कांटे के बजाय हाथों से ही खाना पसंद करता हूं. लेकिन किसी फोन का इस्तेमाल करने के लिए उसकी स्क्रीन को सहलाना मुझे नहीं जमता. खासतौर पर मेरी उम्र वाले किसी शख्स के लिए तो यह थोड़ा अजीब ही है. शायद मैं पुराने तौर-तरीके का आदमी हूं.

मुझे किसी रोबोट के साथ खेलना नहीं आता, मुझे तामागोची चलाना नहीं आता और न ही मेरा आईपैड से किसी तरह का नाता है. मैं केवल जीवित व्यक्तियों के साथ ही रोमांटिक हो सकता हूं.

जहां तक ब्लैकबेरी का सवाल है तो उसमें मेरी कोई खास दिलचस्पी नहीं. उसका इस्तेमाल करना मेरे बूते की बात नहीं. इसके अलावा मुझे सुंदर डिजाइनों वाले फोन लुभाते हैं. ब्लैकबेरी मेरे सौंदर्यबोध की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. उसका डिजाइन नीरस है. उसमें कल्पनाशीलता नहीं है. लेकिन मैं यहां फोन के बारे में क्यों बात कर रहा हूं? नहीं, सवाल फोन का नहीं है.

सवाल तकनीक का है. ब्लैकबेरी एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करता है, जिसके कारण आप और हम बिना किसी डर के एक-दूसरे से बातें कर सकते हैं, अपने छोटे-मोटे राज साझा कर सकते हैं, चुटकुले सुना सकते हैं या एकाध सौदा तय कर सकते हैं. यह ऐसी तकनीक है, जिसके मार्फत हम अपने दोस्तों से वे सारी बेतुकी बातें कर सकते हैं, जो हम किसी और से कभी नहीं करेंगे. हम कभी नहीं चाहेंगे कि कोई और उन बातों को सुने भी या उसे उनकी भनक भी लगे.

यह हमारी निजता है, जिसका अधिकार हमें हमारे संविधान ने दिया है. भारत का नागरिक होने के नाते यह आपका और मेरा अधिकार है. कई सालों से सरकार भरसक यह कोशिश करती रही है कि हमारी इस निजता में सेंध लगा दे. वह हमारी तहकीकात करती है, अक्सर तो इस तरह कि हमें खबर भी नहीं होने पाती. जब कैबिनेट मंत्रियों और विपक्ष के नेताओं तक को नहीं बख्शा जाता तो फिर आप और हम क्या चीज हैं. इसका यह मतलब है कि कोई भी अदना सा अफसर जब चाहे सुरक्षा का हवाला देते हुए आपको अपना निशाना बना सकता है.

अगर ब्लैकबेरी पर पाबंदी लगा दें या आरआईएम पर दबाव बनाते हुए उसके गुप्त कोड उजागर करवा दें तब भी अपराधियों के सामने दूसरे विकल्प हमेशा मुहैया रहेंगे.

केवल इसी कारण कि उसे आपसे खुन्नस है कि आप उसके घर के सामने अपनी कार खड़ी करते हैं या एक दफे उसकी बीवी ने आपसे किसी पार्टी में मुस्कराकर हैलो कहा था. वैसे भी फोन पर बातचीत और मैसेज के आधार पर किसी अपराधी की धरपकड़ इतनी आसान नहीं है. भारत जैसे बड़े और बातूनी मुल्क में, जहां करोड़ों लोग अपने हैंडसेट पर कई भाषाओं में चैट कर रहे होते हैं, वॉइस, एसएमएस, ईमेल, चैट सेवाओं और सोशल नेटवर्किग साइटों का उपयोग कर रहे होते हैं, इतने बड़े पैमाने पर डाटा की छानबीन करना तकरीबन नामुमकिन है.

लिहाजा अगर सरकार आतंकवादियों, भ्रष्टाचारियों और टैक्स हजम कर जाने वालों को धर दबोचना चाहती है, तो इसके लिए यह सबसे बेहतरीन तरीका नहीं है. मुमकिन है कोई व्यक्ति जीवन भर घटिया चुटकुलों, अश्लील जुमलों, भविष्यवाणियों, सेल्स की बातचीतों और आपस में झगड़ रहे प्रेमियों की दलीलों की छानबीन करता रहे और उसके हाथ एक भी काम का सुराग न लगे. वैसे भी हमारी अदालतें फोन पर बातचीत जैसे सुरागों को ज्यादा महत्व नहीं देती हैं.

तो फिर इस कवायद का क्या मतलब है? क्या वजह है कि हम सऊदी अरब और यूएई (मैंने सुना है बहरीन भी) की तर्ज पर ब्लैकबेरी बनाने वाली कंपनी आरआईएम से यह मांग कर रहे हैं कि वह सरकार के सामने अपने सुरक्षा कोड उजागर कर दे ताकि छानबीन करना संभव हो जाए.

क्या सरकार यह दलील देना चाहती है कि भारत के लाखों नागरिकों की निजता उसके लिए गौण है? क्या सुरक्षा कारणों का हवाला देकर आम आदमी के फोन की जासूसी करना ही राष्ट्रहित में है? जहां तक मुझे पता है, आज तक किसी भी आतंकवादी के पास से ब्लैकबेरी बरामद नहीं हुआ. वे लोग सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल करते हैं. अगर ब्लैकबेरी पर पाबंदी लगा दें या आरआईएम पर दबाव बनाते हुए उसके गुप्त कोड उजागर करवा दें तब भी अपराधियों के सामने दूसरे विकल्प हमेशा मुहैया रहेंगे.

वे स्काइप का इस्तेमाल कर सकते हैं. वे ढेरों इंटरनेट फोन सिस्टम का इस्तेमाल कर सकते हैं. जब तक सरकार उन पर भी पाबंदी लगाएगी, तब तक और नई तकनीकें खोज ली जाएंगी. आतंकवादी और अपराधी सयाने होते हैं. वे कानून से एक कदम आगे चलते हैं. लिहाजा ब्लैकबेरी पर पाबंदी लगाने में कौन सी तुक है? इससे केवल आप और मुझ जैसे लोगों को ही नुकसान होगा, जो अपनी निजता का सम्मान करते हैं. अगर सरकार हमारी बातचीतों की छानबीन कर भी ले तो उससे उसे क्या हासिल होगा, यह हम नहीं जानते.

हम केवल दो बातें जानते हैं. पहली यह कि ऐसा होने पर हमारे शब्दकोष से निजता नाम का शब्द खत्म हो जाएगा. दूसरी यह कि इन एजेंसियों द्वारा अपनी कारगुजारियों को जायज ठहराने की गरज से ज्यादा से ज्यादा बेगुनाह लोगों को परेशान किया जाएगा. उन्हें बलि का बकरा बनाया जाएगा. जो पत्रकार या आरटीआई कार्यकर्ता या उन जैसे ही लोग जरूरत से ज्यादा जानते हैं, उन्हें ब्लैकमेल किया जाएगा. उनकी जान को भी खतरा हो सकता है.

क्या हम राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर एक ऐसा ही देश बनाना चाहते हैं? यदि आरआईएम अपने गुप्त कोड उजागर करने से इनकार कर देती है तो निजता के अधिकार के प्रति अपना समर्थन जताने के लिए मैं भी ब्लैकबेरी का इस्तेमाल करना शुरू कर दूंगा. सौंदर्यबोध जाए जहन्नुम में. फिलहाल तो ब्लकबेरी मेरे निजता के अधिकार का प्रतिनिधित्व करता है. मैं इतनी आसानी से अपने इस अधिकार को अपने हाथ से जाने नहीं दूंगा. और न ही आपको ऐसा करना चाहिए.

10.08.2010, 16.49 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Snowa Borno (snowa.bormo@gmail.com) Leh

 
 So Nice of You, Pritish ji,
Very interesting and Wisdomful thoughts you have expressed.

I'm known as Indian Himalayan Mystic Writer and working in the deeper fields of Life and Death among the Internationals. Once my parents were very close to J.Krishnamurti and Osho. We are dedicated to all the great work of the Buddha of all times. During the work I learned some more languages like Hindi and Urdu as a born Indian. Then I start to write fictions. A welknown hindi writer from Himachal Pradesh helped me a lot. We used Internet and Tellepathy to write the deeper relations of a Woman and a Man to become One.

After the bublication of my short stories in Hindi magazines and books from Samvad Prakashan, a kind od Hindi mafia is behind me and trying to torture me and my family members again and again, though we are free from Torture or Respect. They invite me to their programs and want to see me with them. But my work is naturally against these idiotic thing.

Though I never use phone directly, but we are using the means you have said about. Soon these means will be disappeared and we will be using something else.

But, what I want to reach to say :
The real communication is DHYAN : Zen. The inner connection !
When there is no any outer communication, you can easily communicate with the help of Dhyan. But this is for silent people. Speaking but seeing the thoughts inside. This is for peace and real development.
I'm Himalayan Mystic and I can contact my real friend without any kind of phone or internet.

But as you have said, we should use these outer things to develop our outer life and inner sense of humour and sense of Beauty. Otherwise we are just passing the time and crying again and again among the problems.

I thank you and thank the editor.
 
   

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