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किसकी सदी, किसकी सहस्रत्राब्दि
आज के दौर की तस्वीर-एक
किसकी सदी, किसकी सहस्त्राब्दि
?
एजाज अहमद
| जाने-माने मार्क्सवादी बुध्दिजीवी
एजाज अहमद ने सन 2000 में अंग्रेजी पत्रिका फ्रंटलाइन में (वर्ष 17 अंक
02, 04, 13, 17, 20) आज के दौर की तस्वीर को समझने के लिए एक सीरीज
किसकी सदी? किसकी सहस्त्राब्दि? लिखा, जिसे फ्रंटलाइन के अभिलेखागार से
प्राप्त किया जा सकता है. इन लेखों का हिंदी रूपांतरण पॉपुलर एजुकेशन
एंड एक्सन सेंटर (पीस) द्वारा संदर्भ सामग्री के तौर किया गया है.
प्रकाशन की अनुमति देने के लिए हम लेखक एवं पीस के आभारी हैं.
अनुवादः
श्री प्रकाश |
आज का दौर-1
क्रांतियों की सदी
आधुनिक सभ्यता की कई विशेषताएं हैं- अच्छी और बुरी दोनों ही. ये विशेषताएं 20वीं
सदी की खासियत हैं, क्योंकि ये विशेषताएं या तो अतीत में नहीं रहीं या फिर इतनी बदल
गयीं कि पहचानी नहीं जा सकती. अधिकांश रचनाएं उस विज्ञान व प्रौद्योगिकी के सवालों
को संभवत: सामने लाएं, जिनमें से किसी का भी जन्म इस सदी में तो नहीं हुआ, लेकिन
उसने मानव अस्तित्व के पूरे प्रतिमान को एक के बाद एक इतना बदल दिया कि पिछली सदी
के अंत तक जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.
उदाहरण के तौर पर अपनी पूर्ववर्ती सभी सदियों व सहस्त्राब्दियों की तुलना में
बीसवीं सदी उत्पादक शक्तियों, और इस तरह से संपत्ति पैदा करने की मानवीय क्षमता के
व्यापक विकास की गवाह रही है. प्रौद्योगिकी में आया यह तेज परिवर्तन औद्योगिक
उत्पादन और सूचना प्रौद्योगिकी में साफ दिखाई देता है. इसके अलावा कृषि क्षेत्र में
आये बदलाव भी इतने नाटकीय रहे कि पुराने अर्थ में परिचित खेतिहर समाज, जो
गैर-औद्योगिक साधनों से जीविकोपार्जन के लिए खेती व स्थानीय उपभोग के लिए उत्पादन
के आधार पर था, अब दुनिया के अधिकांश हिस्सों से लुप्त होता जा रहा है. इस उपलब्घि
के दूसरे छोर पर प्रौद्योगिकी के ध्वंसात्मक पहलू प्राकृतिक संपदा व पर्यावरण के
लिए खतरा बन गये हैं. मानव इतिहास में पहली बार यह स्पष्ट नहीं है कि प्रकृति की
विभिन्न प्रजातियां, और खुद पृथ्वी ही, विध्वंस की इस मार को झेल पायेगी या नहीं.
चाहे तो कोई इस या उस विशेषता या लक्षण को मन-मर्जी से अलग कर देख सकता है या कोई
चाहे तो ऐसे लक्षणों की आसानी से एक सूची बना सकता है. लेकिन किसी भी हालत में ऐसे
लक्षणों में से अधिकांश काफी महत्वपूर्ण व गंभीर हैं.
हालांकि विचारधारा का अंत, इतिहास का अंत, आधुनिकता का अंत, समाजवाद का अंत,
राष्ट्रों व राष्ट्र-राज्यों का अंत और इस तरह के कई-कई अंतों की जोरदार घोषणाओं के
बीच सदी का अंत हो रहा है, फिर भी यह बहुत जरूरी है कि आज के अपने दौर की एक
तर्कसंगत सूची बनाने का प्रयास किया जाय. उत्तर आधुनिक विचारधारा के इस मिजाज के
लिए मैंने कहीं 'उत्तर दशा' का इस्तेमाल किया है, जो किसी स्थायी किस्म की सांझ
होने की खुशी में लहालोट हो जाने जैसा लगता है. फिर भी अतीत के धुंधलके में गुम
होती सदी की तर्कसंगत तस्वीर बनाने के लिए बेहतर होगा कि इसकी केंद्रीय आकांक्षाओं
व संघर्षों का स्मरण किया जाय और तभी विज्ञान व प्रौद्योगिकी सहित शेष सभी मुद्दों
को उचित व सम्यक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. इसलिए यहां मैं उन मुद्दों पर
कहूंगा, जो इस सदी की विशेषता को पारिभाषित करते लगते हैं. (इस श्रृंखला में आगे
आने वाले लेख, इस लेख की तुलना में अधिक खास मुद्दों पर केंद्रित होंगे).
जब भी कोई बीसवीं सदी पर कुछ कहने के लिए खड़ा होता है, तो आसानी से समझ में आ जाता
है कि बीत चुकी सभी सहस्त्राब्दियों और जल्द ही खत्म हो जाने वाली वर्तमान
सहस्त्राब्दि की सभी सदियों के बरक्स इस सदी में ऐसा क्या है, जो इसे खास बनाता है.
और वह खास बात है एक केंद्रीय तथ्य के तौर पर समाजवाद का उभार. इसी समाजवाद के
इर्द-गिर्द विश्व स्तर की सर्वाधिक आकांक्षाओं व विवादों ने आकार ग्रहण किया. मसलन,
समाजवाद के पक्ष और विपक्ष में खड़े होने वाले संघर्ष, उपलब्धियां, विफलताएं व
पराजय, गुटबाजी व शत्रुता, युद्व, खूनखराबा, लेकिन साथ में यश और कीर्ति भी.
यह तो कहने का एक तरीका हुआ. लेकिन समान तर्क के साथ कहा जा सकता है कि यह सदी एक
तरफ साम्राज्यवादी प्रभुत्व और दूसरी तरफ इस प्रभुत्व के खिलाफ मुख्य तौर पर
समाजवाद और राष्ट्रीय मुक्ति की शक्तियों द्वारा चलाये गये संघर्षों के त्रिकोणीय
स्थिति से प्रभावित रही है. इनमें से कोई भी शक्ति बीसवीं सदी की पैदाइश नहीं है.
औपनिवेशिक पूंजीवाद का इतिहास लगभग आधी सहस्त्राब्दि का इतिहास है और उपनिवेशवाद का
शिकार कोई भी पराजित देश संघर्ष चलाये बगैर नहीं रह सका. इस तरह उपनिवेशवाद का
विरोध भी उतना ही पुराना है, जितना पुराना उपनिवेशवाद है. और समाजवाद के वैचारिक
अंकुर फ्रांसीसी क्रांति की आंच में 18वीं सदी का अंत आते-आते फूट पड़े. समाजवाद का
विचार, आधुनिक क्रांति जितना ही पुराना है. और 19वीं सदी के मध्य तक मार्क्स और
एंगल्स ने उस सर्वहारा क्रांति के सिध्दांत का सूत्रीकरण आरंभ कर दिया था, जिसे
20वीं सदी ने उत्तराधिकार में प्राप्त किया. फिर भी 20वीं सदी के दौरान समाजवाद व
उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति के साथ-साथ पूंजीवाद व उपनिवेशवाद जैसी सभी
ताकतों में भी भारी बदलाव आये. कुछ विस्तृत ब्यौरों को फिर से याद करें तो इन अति
महत्वपूर्ण परिवर्तनों का सम्यक परिदृश्य दिखेगा.
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इस तरह 19वीं सदी के अंतिम ढाई दशकों के दौरान ही यूरोप में मजदूर वर्ग के जनाधार
वाले दलों का दरअसल उदय हुआ और 1920 तक आते-आते जर्मनी, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम,
स्वीडन, नार्वे, फिनलैंड, इटली और नीदरलैंड जैसे देशों में ऐसे दल संसद में
महत्वपूर्ण जगहों पर भी पहुंच गये. इन दलों को विभिन्न वर्गों के मत प्राप्त थे.
फिर भी बोल्शेविक क्रांति ही वह मुख्य घटना बनी, जिसने देशों के एजेंडे पर
क्रांतिकारी बदलाव के सवाल को लाकर रख दिया. पूरे महादेश में मजदूर वर्ग के जनाधार
वाले दलों और क्रांति की संभावना के साथ आने से फासीवाद का जन्म हुआ. आश्चर्य नहीं
कि फासीवाद उन चार देशों - स्पेन, जर्मनी, इटली और ऑस्ट्रेलिया - में पूरी तरह
खूंखार बना हुआ था, जहां मजदूर आंदोलन मजबूत था. यह भी आश्चर्यजनक नहीं था कि
साम्राज्यवादी दौर में, पूरी सदी के दौरान और विश्व स्तर पर, धुर दक्षिणपंथियों के
फासीवादी रुझान लगातार मौजूद रहे.
बोल्शेविक क्रांति ने समाजवादी राजनीति को यूरोपीय परिघटना से अंतरराष्ट्रीय घटना
में बदल दिया. इस रूपांतरण के जिम्मेदार पांच कारक थे:
रूसी समाज में आये क्रांतिकारी मोड़ ने क्रांति के सिध्दांतों में व्यापक बदलाव ला
दिया. इसने मजदूर-किसान गठजोड़ की स्थापना सर्वहारा राजनीति की पूर्वदशा के तौर पर
की और खेतिहर वर्ग को एक क्रांतिकारी ताकत के रूप मे उभरने के लिए रास्ता खोला. अब
इसके बाद की सभी क्रांतियां खेतिहर समाजों में होनी थीं.
यूरोपीय बुर्जुआ विचारों के हर पहलुओं का विरोध करते हुए लेनिन और उनके सहयोगियों
ने बोल्शेविक सिध्दांत बनाया, जिसने राष्ट्रीय और औपनिवेशिक सवालों की वैधता को
स्वीकार कर लिया. इस तरह बोल्शेविक सिध्दांत ने एशिया, अफ्रीका, लातिन अमरीका और
यूरोप तक में राष्ट्रीय मुक्ति के लिए जारी युध्दों की आवश्यकता को वैधता दी. बाद
में हुईं सारी समाजवादी क्रांतियों को क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और वामपंथी राजनीति
में गहरा संबंध बनाना पड़ा था. वामपंथी राजनीति ने भारत से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक
जारी अन्य राष्ट्रवादी आंदोलनों पर गहरा प्रभाव डाला था.
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सभी समाजवादी क्रांतियां बीसवीं सदी
की क्रातियां हैं और इसी सदी में समाजवाद यूरोपीय परिघटना के दायरे
से बाहर निकला और दुनिया भर में फैला, इसलिए सारी मानवता के लिए
समान प्रस्थान बिंदु और सार्वभौमिक मुक्ति के लिए समान आकांक्षा
होने के कारण हम बेहिचक कह सकते हैं कि समाजवाद के लिए व्यावहारिक
संघर्ष बीसवीं सदी की प्रमुख घटना थी. |
दो दशकों, या उससे अधिक समय तक सक्रिय कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कॉमिटर्न) एकतरफ
तो एक नर्सरी की तरह था, जिसमें भारी संख्या में क्रातिकारियों ने समाजवादी
क्रांति के सिध्दांत व व्यवहार की समझ बनायी तो दूसरी ओर कम्युनिस्ट इंटरनेशनल
ने एक फोरम की तरह काम किया, जहां दुनिया भर के सशस्त्र कार्यकर्ताओं ने भाषा,
नस्ल, क्षेत्रीय या धार्मिक मूल वाली रूकावटों के बगैर एक-दूसरे से सीधे तौर पर
सीखा-समझा.
समाजवाद के सिध्दांत-व्यवहार ने इस विचार में यकीन जताया कि क्रांतिकारी बदलाव
संपत्ति और उत्पादन के आधार पर बने वर्गों यानी मजदूरो -किसानों की ही जरूरत नहीं
है, बल्कि तरह-तरह के शोषण से त्रस्त सारे सामाजिक समूहों की भी जरूरत है, जैसे
महिला, अल्पसंख्यक, पूंजीवाद से बरबाद शिल्पकारों, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के
लिए सक्रिय समूह आदि. राष्ट्रीय व धार्मिक सीमाओं से परे महिलाओं के कुछ समान
स्वार्थ हैं. जैसे वूमेन्स इंटरनेशनल का विचार सबसे पहले समाजवादी मिट्टी में ही
पैदा हुआ. और तब तक आधुनिक नारीवादी आंदोलन चर्चा में भी नहीं था. जब कम्यूनिस्ट
पार्टी के बारे में ग्राम्शी की 'सामूहिक बुध्दिजीवी' वाली प्रसिध्द अवधारणा सामने
आयी, तब समाजवादी एकता की अवधारणा को निजी, क्षेत्रीय स्वार्थों तथा समान, वैश्विक
स्वार्थों के बीच चलने वाली द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया के तौर पर लिया गया.
उपरोक्त आधार पर बनी सार्वभौमिक संस्कृति में दोनों तरह के संगठन और मूल्य शामिल
थे. जैसे राजनीतिक पार्टियां, श्रमिक संगठन, महिलाओं और छात्रों के जनसंगठन,
रंगकर्मियों के समूह, लेखक संगठन, फासीवाद विरोधी समितियां.
आंतरिक तौर पर नस्लवादी रवैये वाले पूंजीवादी भूमंडलीकरण के तीखे विरोध में
समाजवादी अंतरराष्ट्रीयतावाद ने जिस प्राथमिक मूल्य की तरफदारी की, वह था रैडिकल,
सार्वभौमिक बराबरी का. इस तरह समाजवादी आंदोलन 18वीं सदी के ज्ञानोदय/जागरण काल के
तार्किक व समतावादी मूल्यों का प्रमुख समर्थक बन गया. इसी आधार पर एरिक हॉब्सवाम ने
इसे 'वाम ज्ञानोदय' कहा. यह भी तथ्य है कि मार्क्सवाद पर उत्तर-आधुनिकों के होने
वाले हमले ज्ञानोदय पर भी होते हैं.
सभी समाजवादी क्रांतियां बीसवीं सदी की क्रातियां हैं और इसी सदी में समाजवाद
यूरोपीय परिघटना के दायरे से बाहर निकला और दुनिया भर में फैला, इसलिए सारी मानवता
के लिए समान प्रस्थान बिंदु और सार्वभौमिक मुक्ति के लिए समान आकांक्षा होने के
कारण हम बेहिचक कह सकते हैं कि समाजवाद के लिए व्यावहारिक संघर्ष बीसवीं सदी की
प्रमुख घटना थी.
उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों के भीतर कई मिलते-जुलते बदलाव आये. इस सदी के पहले
उपनिवेशवाद विरोधी सारे संघर्षों की खासियत थी कि वे पारंपरिक व्यवस्था और मूल्यों
के हक में पारंपरिक दायरे में ही उठाये और लड़े जाते थे. लेकिन इसके विपरीत बीसवीं
सदी के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों की अलग पहचान बनी. इस दौर में संघर्षों का
नेतृत्व आधुनिक किस्म के उन वर्ग समूहों व समाजों के पास आ गया, जो नये और अलग
किस्म के भविष्य के लिए लड़े थे. ऐसा नहीं था कि ये संघर्ष किसी पारंपरिक सांस्कृतिक
मूल्यों को छोड़कर चले थे, बल्कि इन मूल्यों के साथ ही औपनिवेशिक शोषण के मलबे पर एक
नये समाज की रचना करने की दृष्टि भी इन संघर्षों के केंद्र में थी. कई क्षेत्रों
में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन भिन्न-भिन्न स्तर की लोकतांत्रिक भावना से लैस समाज
सुधार के लिए जारी आंदोलनों के करीब आये.
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बोल्शेविक क्रांति ने कई तरीके से उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के भविष्य पर गहरा
प्रभाव छोड़ा था. जारशाही वाला रूस स्वयं औपनिवेशिक साम्राज्य का केंद्र था, जहां
क्रांति ने कई उपनिवेशवाद विरोधी योध्दाओं को सहज ही प्रभावित और प्रेरित किया था.
तब रूस ने हाल ही में अपने एशियाई विरोधी (जापान) के खिलाफ युध्द लड़ा था. इसके
अलावा रूस में राष्ट्रीय मुक्ति के पक्ष में बोल्शेविकों की घोषित नीति थी. साथ ही
वहां आजादी के लिए मजदूरों और किसानों में जन-जागरण व भागीदारी का काफी लोकप्रिय
विचार हवा में तैर रहा था. एक ऐसी क्रांति की चाह थी, जो आभिजात्य वर्ग द्वारा ऊपर
से थोपी न जाये, बल्कि जनता द्वारा नीचे से लाई जाये. उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों
और मौलिक परिवर्तन के लिए समाजवाद का मुख्य योगदान यह बताना था कि स्वयं शोषितों
द्वारा स्व-मुक्ति की प्रक्रिया ही मुक्ति का रास्ता हो सकती है. इसके अलावा कई
उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों में कम्यूनिस्टों की सीधी भागीदारी थी. बड़ी उपनिवेशवादी
ताकतें समाजवाद की दुश्मन थीं और इस तथ्य ने समाजवाद के हक में कई उपनिवेशवाद
विरोधी ताकतों के बीच लगाव पैदा कर दिया. यदि एशिया और अफ्रीका की सारी समाजवादी
क्रांतियों ने राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों का स्वरूप ले लिया तो हमारे महादेश के
सारे कम्यूनिस्ट और समाजवादी आंदोलनों ने भी राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य व वातावरण
में ऐसा ही किया. लेकिन यह क्रांतिकारी राष्ट्रवाद था, इसलिए इसने आज के 'इथनिक'
राष्ट्रवाद के ढर्रे पर स्वयं में ही कैद रहने और दूसरों को अलग-थलग कर देने के
मिजाज से राष्ट्रवाद को ग्रहण नहीं किया, बल्कि इसे उपनिवेश जैसे साझे दुश्मन के
खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आंदोलन के तौर पर लिया. इस तरह समाजवाद ने राष्ट्रवाद को अंध
देशभक्ति व धर्मांधता-कट्टरता से बचाते हुए गहरे प्रभावित किया और उसे सार्वभौमिक
बनाया.
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रैडिकल राष्ट्रवाद का भविष्य
कहीं गहरे समाजवादी कार्य योजना पर निर्भर था और एक के बगैर दूसरा
जिंदा नहीं रह सकता था. इस पर कम से कम बहस की गुंजाइश है कि
सोवियत संघ के बिखरने से साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रवाद को उतना
ही झटका लगा था, जितना मजदूर आंदोलनों को लगा था. |
उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों को समाजवादी देशों और दुनिया भर में फैले
कम्यूनिस्ट आंदोलनों से लगातार सहयोग मिला, जिससे सबकी मुक्ति के कार्यभार के
तौर पर राष्ट्रवाद की अवधारणा को काफी बल मिला. गिनीया-बसाऊ के महान
क्रांतिकारी नेता अल्मिकर काबराल ने एक बार याद दिलाया था कि अफ्रीकी महादेश
में उपनिवेशवाद विरोधी क्रांतियों में चलने वाली बंदूक की हर गोली मूलत:
समाजवादी देशों से आती है. इस तरह नेल्सन मंडेला से लेकर यासिर अराफात तक
दुनिया के विभिन्न रंगों वाले राष्ट्रवादी नेता, जो किसी भी तरह से स्वयं
कम्यूनिस्ट नहीं थे, कभी कम्यूनिस्ट विरोधी हमलों व गतिविधियों के हिमायती नहीं
बने. नासिर के मिस्र से लेकर एफएलएन के अल्जिरिया तक रैडिकल राष्ट्रवादी
सत्ताओं ने अपने देशों में कम्यूनिस्टों का दमन तो किया, लेकिन समाजवादी कार्य
योजना से प्रेरित सुधारों को भी लागू किया और साम्राज्यवाद से मुक्ति के अपने
संघर्ष में सोवियत संघ पर काफी भरोसा भी किया. यदि समाजवादी देशों का असंदिग्ध
सहयोग न मिला होता तो गुटनिरपेक्ष आंदोलन (बांडुग कार्य योजना) के बारे में
सोचना भी संभव नहीं था. दरअसल चाउ एन लाई और मार्शल टीटो इसके मुख्य कारक रहे.
संक्षेप में कहें तो रैडिकल राष्ट्रवाद का भविष्य कहीं गहरे समाजवादी कार्य
योजना पर निर्भर था और एक के बगैर दूसरा जिंदा नहीं रह सकता था. इस पर कम से कम
बहस की गुंजाइश है कि सोवियत संघ के बिखरने से साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रवाद
को उतना ही झटका लगा था, जितना मजदूर आंदोलनों को लगा था. इसमें भी कोई आश्चर्य
नहीं है कि वर्तमान इथनिक (जातीय) और धार्मिक राष्ट्रवाद, जो समाजवाद से किसी
किस्म की प्रेरणा नहीं ले पाये, पूरी तरह से दक्षिणपंथ और विनाशकारी भूमिका में
चले गये.
लेकिन साम्राज्यवाद जैसे बड़े दुश्मन के बारे में क्या सोच रही? उपनिवेशवाद का
इतिहास आधी सदी तक फैला रहा. 19वीं सदी के अंत में अफ्रीका के विभाजन के साथ
सारी दुनिया पर औपनिवेशिक विजय का समापन हुआ था. 20वीं सदी की शुरुआत में
यूरोपीय मजदूरों की पार्टियों के प्रसार को औपनिवेशिक ताकतों के बीच की आपसी
शत्रुता ने दबा दिया, जिसके कारण दुनिया के पुनर्विभाजन के लिए दो विश्व युध्द
तक हो गये. फिर फासीवाद के उदय के साथ जनसंहार के हथियारों की ईजाद हुई. और
इसने स्वयं मानव सभ्यता के लिए खतरा पैदा कर दिया. यदि फासीवाद ने व्यवस्थित
तरीके से क्रूरता के साथ लाखों असहाय लोगों का कत्ल किया तो 'उदार लोकतंत्रों'
की 'क्षमता' जापान के खिलाफ अमेरीका द्वारा परमाणु बम के इस्तेमाल की बर्बरता
में दिखाई दी. तो इन तरीकों के जरिये ही आखिरकार यह तय हुआ कि इस धरती पर किसका
वर्चस्व रहेगा: नाजियों का या अमेरीकियों का. इस लिहाज से 20वीं सदी की कथा
सारी दुनिया में अकेली मजबूत ताकत के रूप में अमेरीका के उभरने की भी कथा है.
इस पूरी प्रक्रिया के तीन चरण रहे.
19वीं सदी तक ब्रिटेन को पछाड़ते हुए अमेरीका एक महत्वपूर्ण और अग्रसर पूंजीवादी
शक्ति बन चुका था. दोनों विश्वयुध्दों में इसकी भूमिका निर्णायक थी. प्रथम
विश्व युध्द के अंत आते-आते न्यूयॉर्क ने उस लंदन को दबोच लिया, जो दुनिया का
वित्तीय केंद्र हुआ करता था. और यह युध्दोत्तर निपटारा अमेरीकी राष्ट्रपति
वुडरो विल्सन की देखरेख में हुआ था. फिर भी द्वितीय विश्व युध्द के बाद ही
औपनिवेशिक साम्राज्यों के ढहने के कारण अमेरीका पूंजीवादी दुनिया के एकमात्र
भूमंडलीय नेता के रूप में उभरा. गौरतलब है कि यूरोपीय शक्तियां एक दूसरे के
संसाधनों को तब तक काफी नुकसान पहुंचा चुके थे.
19वीं सदी के मध्य तक विश्व प्र्रतिस्पर्धी औपनिवेशिक साम्राज्यों में विभाजित था,
इसलिए पूरी तरह से एक भूमंडलीय बाजार का उभरना संभव नहीं था. इस भूमंडलीय बाजार के
लिए जरूरी था कि इसके दायरे में आने वाले क्षेत्रों में पूंजी की बेरोकटोक और
एकसमान पहुंच हो और इस पहुंच की गारंटी देने के लिए एक एकीकृत व अकेली सत्ता हो.
औपनिवेशिक साम्राज्यों के ढहने से अमेरीका को अपना वर्चस्व स्थापित करने में सहायता
मिली. लगभग आधी सदी तक अमेरिका ने अपने वर्चस्व के दायरे में विश्व बाजार का
पुनर्गठन किया.
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साथ ही समाजवादी चुनौती और राष्ट्रीय मुक्ति युध्दों की शक्तियों के
खिलाफ अपने सैन्य व राजनीतिक नेतृत्व की छत्रछाया में पूंजीवादी विश्व का एकीकरण
किया. पूंजीवादी विश्व के एकीकरण के कारण खड़ी पूंजी से ही अमेरीका विज्ञान व
प्रौद्योगिकी में तरह-तरह के विशाल क्रांतिकारी कदम उठाने में अग्रगामी भूमिका निभा
सका. इस भूमिका को अंजाम देने में यूरोप और जापान के सहयेगियों ने बढ़-चढ़ कर मदद की.
लेकिन एक जटिल समस्या भी थी. द्वितीय विश्व युध्द के जिस संकट ने
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नॉम चॉमस्की ने ठीक ही कहा है कि
युध्द वियतनाम ने नहीं, अमेरीका ने जीता था. अंगोला, मोजाम्बिक और
निकारागुआ जैसे दूर-दराज के इलाकों में भी यही कथा दोहरायी गयी. इस
बीच सोवियत संघ को अपने संसाधनों का व्यापक दोहन और भारी खर्च करना
पड़ा |
औपनिवेशिक सत्ता को ध्वस्त किया और पूंजीवादी विश्व में अमेरीका को इसके
वर्चस्ववादी हैसियत तक पहुंचाया, उसी संकट ने दुनिया में एकमात्र समाजवादी देश के
बतौर सोवियत संघ को अलग-थलग नहीं रहने दिया और समाजवादी हलचल दक्षिण-पूर्व यूरोप,
पूर्वी एशिया सहित लातिन अमेरीका/ कैरिबियन देशों तक फैल गयी. यदि सदी की पहली
चौथाई की प्रमुख घटना बोल्शेविक क्रांति थी तो सदी की दूसरी चौथाई में चीनी क्रांति
और तीसरी चौथाई में क्यूबा और वियतनाम की क्रांतियां हो चुकी थीं. (भारत में
क्रांति का न हो पाना उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि चीन में क्रांति का होना.
एशिया के आने वाले इतिहास में इस भारतीय विफलता का निर्णायक महत्व है, लेकिन इसकी
व्याख्या अलग से करनी होगी) बोल्शेविक क्रांति के बाद भड़के आंदोलनों को जितनी आसानी
से दबा दिया गया, वैसा चीनी क्रांति के बाद उभरे आंदोलनों के लिए संभव नहीं था.
1973 में चीले के पराजय के बाद ही साम्राज्यवाद के पक्ष में हवा बहनी शुरू हुई.
मीडिया ने अब तक इरादतन जितने भी शब्दाडम्बर खडे किये हैं, उनमें 'शीत युध्द' सबसे
बड़ा है. द्वितीय विश्व युध्द के बाद और सोवियत संघ के बिखरने के बीच के 45 वर्ष
निरंतर जारी विश्वव्यापी व क्रूरता से भरे गृह युध्द (सिविल वार) के रूप में बीता
है और ऐसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ. सच है कि अमेरीका और यूरोप के बीच कोई
गोलीबारी नहीं हुई और आधुनिक इतिहास में उत्तर-पश्चिमी यूरोप ने भी इतना लंबा
शांतिकाल नहीं देखा, फिर भी तीसरी दुनिया में करीबन 200 युध्द लड़े गये. इनमें से
ज्यादातर साम्यवाद को पीछे खींचने, उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रवाद को हराने और
औपनिवेशिक जाल से बाहर निकल आये देशों में उठ खड़े हुए नये-नये साम्राज्यवाद विरोधी
आंदोलनों को कुचलने के लिए थे. क्यूबा के ही खिलाफ 40 वर्षों का आर्थिक प्रतिबंध व
सैन्य कारवाई की धमकी से ही इस क्रूर यथार्थ का खुलासा होता है कि जिन छोटी-छोटी
जगहों पर महान क्र्रांतियां घटित हुईं, उनको शांति व स्वायत्ता की ऐसी स्थिति में
नहीं रहने दिया गया कि वहां समाजवाद जैसा कुछ खड़ा हो जा सके. अमेरीकियों के वियतनाम
छोड़ने के पहले वहां जन-धन का भारी विनाश किया गया. नॉम चॉमस्की ने ठीक ही कहा है कि
युध्द वियतनाम ने नहीं, अमेरीका ने जीता था. अंगोला, मोजाम्बिक और निकारागुआ जैसे
दूर-दराज के इलाकों में भी यही कथा दोहरायी गयी. इस बीच सोवियत संघ को अपने
संसाधनों का व्यापक दोहन और भारी खर्च करना पड़ा, क्योंकि नाटो (नार्थ अटलांटिक
ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) के संयुक्त सैन्य दल के सामने उसे एक हद तक अपनी सुरक्षा का
प्रबंध भी करना पड़ा था. क्रांति के बाद बनी अधिकांश सरकारें अपनी ही समस्याओं से ही
निबटने में उलझी रहीं. फिर भी साम्राज्यवाद के सैन्य व आर्थिक दबाव के बोझ के
मद्देनजर यह कहना अशोभनीय होगा कि वहां शांतिपूर्वक चलने वाली कोई प्रतिस्पर्धा थी,
जिसके कारण वे सरकारें अपने ही बोझ तले दब गईं. इस सदी का पहला तीन चौथाई दौर
समाजवादी ताकतों के विस्तार का रहा. प्रक्रिया के उलटने का दौर सदी के चौथे काल में
ही संभव हुआ और वह भी इतनी तेज गति से कि इसे सीआईए भी नहीं भांप सका. समाजवादी
विस्तार की प्रक्रिया के विपरीत दिशा में जाने की जटिलताएं इतनी हैं कि यहां
संक्षेप में कहना संभव नहीं है. लेकिन इतना कहा जा सकता है कि 1989-90 के बाद ही
अमेरीका ने अपने वर्चस्व के तीसरे दौर में, जो अब तक जारी है, प्रवेश किया. सोवियत
संघ के विघटन के बाद ही अमेरीका सही मायने में प्रतिद्वन्द्वी विहीन और अपरिवर्तनीय
एकमात्र 'सुपर पॉवर' बन सका. इस क्षमता से लैस होने के बाद ही अमेरीका के लिए संभव
हो सका कि वह पूंजी एकत्र करने वाले नवउदारवादी साम्राज्य को पश्चिमी यूरोप सहित
सारी दुनिया पर थोप सके. पश्चिमी यूरोप में व्यापक गरीबी के साथ-साथ व्यापक रोजगार
के अवसर मुहैया कराने वाला अमेरीकी मॉडल पहले से ही ब्रिटेन पर थोपा जा चुका है और
अब यूरोप पर भी इसे थोपने का प्रयास चल रहा है, जहां प्राय: पूरी तौर पर समाजवादी
जनवादियों (सोशल डेमोक्रेट) का शासन है.
यूरोपीय संघ के चोले में यूरोप एकीकृत 'बैंकर्स यूरोप' की तरह उभरा है. इस तरह
अमेरीका ने नाटो और संयुक्त राष्ट्र को अपनी नीतियां लागू कराने के औजार में बदल
दिया है, जो खाड़ी युध्द और कोसोवो में जघन्य बमबारी से जगजाहिर है. विश्व व्यापार
संग्ठन (डब्ल्यू0टी0ओ0) जैसे बहुस्तरीय एजेंसियों का एक खास पहलू रहा कि वे अमेरीकी
या अमेरीका द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे व्यवहार, वैधानिक नियमों और प्रबंधन के
प्रारूपों का भूमंडलीकरण करे. नवउदारवादी सत्ता थोपे जाने की वजह से ही कभी
समाजवादी खेमा कहे जाने वाले देशों के 'तीसरी दुनियाकरण' ने गति पकड़ी है और दक्षिण
व दक्षिण-पूर्व एशिया के एशियाई बाघ के नाम से चर्चित देशों सहित आस-पास के देशों
में अपनी खतरनाक नीतियां लागू कराने से पहली दुनिया में आये ठहराव का संकट कुछ कम
हुआ है. दरअसल, एशियाई देशों के वर्तमान संकट का इस्तेमाल वहां संपत्तिा खरीदने और
उन सरकारों को नवउदारवाद के जरिये लचीला बनाने में हो रहा है, ताकि एशियाई देशों तक
पहुंच को और आसान बनाया जा सके.
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सदी के अंत तक अमेरीका का कोई ठोस व वास्तविक दुश्मन नहीं बचा है और अब अमेरीका
अपने से नीचे के 6 देशों के कुल सैन्य खर्च से अधिक स्वयं पर खर्च कर रहा है.
अमेरीका अकेली सत्ता है, जो दुनिया में कहीं भी पहुंच सकता है और इस ग्रह पर मौजूद
किसी भी घर को सटीक बमबारी द्वारा बहुत आसानी से उड़ा सकता है. यूरोपीय देशों व
जापान सहित सारे अमेरीका के सहयोगियों के स्वार्थ उनके अपने समुद्र तटों से दूर के
इलाकों से भी जुड़े हैं और इसके लिए वे अमेरिका पर निर्भर हैं. इस तरह ये देश
अमेरीका के सामने नतमस्तक है. उत्पादन उपक्रमों का क्षरण हुआ, लेकिन अमेरीका सुविधा
संपन्न तकनीक-प्रबंधन वर्ग के लिए उच्च शिक्षा व प्रशिक्षण का वैश्विक केंद्र बना
रहा. सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अमेरीका के सहयोगी, खास तौर पर जापान,
तरक्की करते रहे, लेकिन दरअसल सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अमेरीका ही अग्रणी
कॉरपोरेट शक्ति बना रहा. खास तौर पर उस तीसरी दुनिया की सूचना प्रौद्योगिकी पर
अमेरीका का वैचारिक नियंत्रण बना हुआ है, जिसे दुनिया भर में फैले सेटेलाइटों के
जरिये अमेरीका में निर्मित समाचार परोसा जा रहा है.
तीसरी दुनिया के आभिजात्यों की उच्च शिक्षा और सूचना उद्योगों की वैचारिक सामग्री
पर एकाधिकार तीसरी दुनिया के राजनीतिक माहौल के लिए काफी नुकसानदेह साबित हुआ है.
मसलन, भारत में एक भी टेलीविजन चैनल या राष्ट्रीय अखबार नहीं है, जो आर्थिक व
राजनीतिक मसले पर अमरीकियों के वैश्विक दृष्टिकोण पर जाहिर थोड़े से विरोध को भी
दर्ज करे. लेकिन अमेरिका जो भी उपदेश देता है, वह इन देशी सूचनादाताओं की समझ में
सहज ही आ जाता है. समाचार गढ़ने के अलावा अमेरीका समाचारवाचकों को भी गढ़ता है. एक
दूसरे पर र्निर्भर संस्थानों के माध्यम से अमेरीका समाचारवाचकों की शैली, संवेदना
और झुकाव व रुझान भी तय तय करता है. वह भौगोलिक स्थानीयता के परे जाकर स्कूल
पाठयक्रम से लेकर खास किस्म की उच्च स्तरीय व्यावसायिक प्रशिक्षण भी देता है.
इस सदी का अधिकांश हिस्सा समाजवाद के समर्थन या विरोध में जारी संघर्षों से
प्रभावित रहा. 20वीं सदी का अंत 19वीं सदी के अंत से उल्लेखनीय समानता रखता है.
उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों के शुरुआती उभार की निर्णायक पराजय के बाद तथा 20वीं
सदी में आधुनिकतर और जनकेंद्रित आंदोलनों के उभार से पहले एशिया व अफ्रीका में
उपनिवेशवाद मजबूती से खड़ा था और उपनिवेशवाद विरोध गहरे दबा पड़ा था.
आज हम फिर एक बार ऐसे औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया के बीच खड़े हैं, जैसा इतिहास में
पहले कभी नहीं देखा गया. यह औपनिवेशीकरण पहले की तरह जमीन पर कब्जा नहीं जमाता,
बल्कि उत्पादन तंत्र, स्थानीय संसाधनों, श्रम क्षेत्रों और वैचारिक औजारों व
उपकरणों पर इतिहास में अब तक ज्ञात सर्वाधिक आक्रामक और समग्रता से नियंत्रण बनाता
है. राष्ट्रीय बुर्जुआ और दलाल के बीच का ऐतिहासिक फर्क आज विलीन हो रहा है. अतीत
का 'राष्ट्रीय' आज का दलाल बन गया है. इस व्यापक परिदृश्य में अभी हाल ही में बड़ी
चुनौतियों से खुद को मुक्त करने वाले एकमात्र महाशक्ति को एक किस्म की अजेयता,
बल्कि सर्वकालिकता का अहसास हो चला है. इतिहास-का-अंत जैसी विचारधारा के सारे
दार्शनिक उठापटक के पीछे जो कुछ उपदेश दिया जा रहा है, उसका सार यही बताना है कि यह
अजेय शक्ति सदा ही रहने वाली हैं.
19वीं सदी के खत्म होने के महज 13 साल बाद ही जब औपनिवेशिक पूंजीवाद अपराजेय लग रहा
था, बोल्शेविक क्रांति हो गयी और उसके अगले 5 वर्षों में ही, इतिहास में पहली बार,
भारत से लेकर मिस्र तक विभिन्न देशों में उपनिवेशवाद विरोधी बड़े-बड़े जनांदोलन उभर
कर सामने आ गये. अगले कुछ वर्षों में शंघाई व अन्य स्थानों पर चीनी क्रांति की
प्रारंभिक लड़ाइयां लड़ी गयीं थीं. क्रांतियों की सदी कही जाने वाली 20वीं सदी अपने
पूरे प्रवाह में प्रारंभ हो चुकी थी. इस अर्थ में आज भी 20वीं सदी के मूलभूत तर्क
के पलटने से हम डूब-उतरा रहे हैं. यह मूलभूत तर्क था सारी दुनिया में समाजवादी
आकांक्षाओं, लोकतांत्रिक मांग और उपनिवेशवाद विरोधी जनता के उठ खड़े होने का.
ऐतिहासिक अर्थों में 21वीं सदी की मुकम्मल शुरुआत नहीं हुई है. अब भी उसका आरंभ
होना संभव नहीं दीखता और तब तक शुरू होना संभव नहीं है, जब तक पलटने की प्रक्रिया
ही न पलट जाये.
04.07.2008, 18.22 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित
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