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किसकी सदी, किसकी सहस्रत्राब्दि

आज के दौर की तस्वीर-एक

 

किसकी सदी, किसकी सहस्त्राब्दि ?

एजाज अहमद

 

 

जाने-माने मार्क्सवादी बुध्दिजीवी एजाज अहमद ने सन 2000 में अंग्रेजी पत्रिका फ्रंटलाइन में (वर्ष 17 अंक 02, 04, 13, 17, 20) आज के दौर की तस्वीर को समझने के लिए एक सीरीज किसकी सदी? किसकी सहस्त्राब्दि? लिखा, जिसे फ्रंटलाइन के अभिलेखागार से प्राप्त किया जा सकता है. इन लेखों का हिंदी रूपांतरण पॉपुलर एजुकेशन एंड एक्सन सेंटर (पीस) द्वारा संदर्भ सामग्री के तौर किया गया है. प्रकाशन की अनुमति देने के लिए हम लेखक एवं पीस के आभारी हैं.

अनुवादः श्री प्रकाश



 

 

 

 

 

 

आज का दौर-1
क्रांतियों की सदी

आधुनिक सभ्यता की कई विशेषताएं हैं- अच्छी और बुरी दोनों ही. ये विशेषताएं 20वीं सदी की खासियत हैं, क्योंकि ये विशेषताएं या तो अतीत में नहीं रहीं या फिर इतनी बदल गयीं कि पहचानी नहीं जा सकती. अधिकांश रचनाएं उस विज्ञान व प्रौद्योगिकी के सवालों को संभवत: सामने लाएं, जिनमें से किसी का भी जन्म इस सदी में तो नहीं हुआ, लेकिन उसने मानव अस्तित्व के पूरे प्रतिमान को एक के बाद एक इतना बदल दिया कि पिछली सदी के अंत तक जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.


उदाहरण के तौर पर अपनी पूर्ववर्ती सभी सदियों व सहस्त्राब्दियों की तुलना में बीसवीं सदी उत्पादक शक्तियों, और इस तरह से संपत्ति पैदा करने की मानवीय क्षमता के व्यापक विकास की गवाह रही है. प्रौद्योगिकी में आया यह तेज परिवर्तन औद्योगिक उत्पादन और सूचना प्रौद्योगिकी में साफ दिखाई देता है. इसके अलावा कृषि क्षेत्र में आये बदलाव भी इतने नाटकीय रहे कि पुराने अर्थ में परिचित खेतिहर समाज, जो गैर-औद्योगिक साधनों से जीविकोपार्जन के लिए खेती व स्थानीय उपभोग के लिए उत्पादन के आधार पर था, अब दुनिया के अधिकांश हिस्सों से लुप्त होता जा रहा है. इस उपलब्घि के दूसरे छोर पर प्रौद्योगिकी के ध्वंसात्मक पहलू प्राकृतिक संपदा व पर्यावरण के लिए खतरा बन गये हैं. मानव इतिहास में पहली बार यह स्पष्ट नहीं है कि प्रकृति की विभिन्न प्रजातियां, और खुद पृथ्वी ही, विध्वंस की इस मार को झेल पायेगी या नहीं. चाहे तो कोई इस या उस विशेषता या लक्षण को मन-मर्जी से अलग कर देख सकता है या कोई चाहे तो ऐसे लक्षणों की आसानी से एक सूची बना सकता है. लेकिन किसी भी हालत में ऐसे लक्षणों में से अधिकांश काफी महत्वपूर्ण व गंभीर हैं.

 

हालांकि विचारधारा का अंत, इतिहास का अंत, आधुनिकता का अंत, समाजवाद का अंत, राष्ट्रों व राष्ट्र-राज्यों का अंत और इस तरह के कई-कई अंतों की जोरदार घोषणाओं के बीच सदी का अंत हो रहा है, फिर भी यह बहुत जरूरी है कि आज के अपने दौर की एक तर्कसंगत सूची बनाने का प्रयास किया जाय. उत्तर आधुनिक विचारधारा के इस मिजाज के लिए मैंने कहीं 'उत्तर दशा' का इस्तेमाल किया है, जो किसी स्थायी किस्म की सांझ होने की खुशी में लहालोट हो जाने जैसा लगता है. फिर भी अतीत के धुंधलके में गुम होती सदी की तर्कसंगत तस्वीर बनाने के लिए बेहतर होगा कि इसकी केंद्रीय आकांक्षाओं व संघर्षों का स्मरण किया जाय और तभी विज्ञान व प्रौद्योगिकी सहित शेष सभी मुद्दों को उचित व सम्यक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. इसलिए यहां मैं उन मुद्दों पर कहूंगा, जो इस सदी की विशेषता को पारिभाषित करते लगते हैं. (इस श्रृंखला में आगे आने वाले लेख, इस लेख की तुलना में अधिक खास मुद्दों पर केंद्रित होंगे).

जब भी कोई बीसवीं सदी पर कुछ कहने के लिए खड़ा होता है, तो आसानी से समझ में आ जाता है कि बीत चुकी सभी सहस्त्राब्दियों और जल्द ही खत्म हो जाने वाली वर्तमान सहस्त्राब्दि की सभी सदियों के बरक्स इस सदी में ऐसा क्या है, जो इसे खास बनाता है. और वह खास बात है एक केंद्रीय तथ्य के तौर पर समाजवाद का उभार. इसी समाजवाद के इर्द-गिर्द विश्व स्तर की सर्वाधिक आकांक्षाओं व विवादों ने आकार ग्रहण किया. मसलन, समाजवाद के पक्ष और विपक्ष में खड़े होने वाले संघर्ष, उपलब्धियां, विफलताएं व पराजय, गुटबाजी व शत्रुता, युद्व, खूनखराबा, लेकिन साथ में यश और कीर्ति भी.

यह तो कहने का एक तरीका हुआ. लेकिन समान तर्क के साथ कहा जा सकता है कि यह सदी एक तरफ साम्राज्यवादी प्रभुत्व और दूसरी तरफ इस प्रभुत्व के खिलाफ मुख्य तौर पर समाजवाद और राष्ट्रीय मुक्ति की शक्तियों द्वारा चलाये गये संघर्षों के त्रिकोणीय स्थिति से प्रभावित रही है. इनमें से कोई भी शक्ति बीसवीं सदी की पैदाइश नहीं है. औपनिवेशिक पूंजीवाद का इतिहास लगभग आधी सहस्त्राब्दि का इतिहास है और उपनिवेशवाद का शिकार कोई भी पराजित देश संघर्ष चलाये बगैर नहीं रह सका. इस तरह उपनिवेशवाद का विरोध भी उतना ही पुराना है, जितना पुराना उपनिवेशवाद है. और समाजवाद के वैचारिक अंकुर फ्रांसीसी क्रांति की आंच में 18वीं सदी का अंत आते-आते फूट पड़े. समाजवाद का विचार, आधुनिक क्रांति जितना ही पुराना है. और 19वीं सदी के मध्य तक मार्क्स और एंगल्स ने उस सर्वहारा क्रांति के सिध्दांत का सूत्रीकरण आरंभ कर दिया था, जिसे 20वीं सदी ने उत्तराधिकार में प्राप्त किया. फिर भी 20वीं सदी के दौरान समाजवाद व उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति के साथ-साथ पूंजीवाद व उपनिवेशवाद जैसी सभी ताकतों में भी भारी बदलाव आये. कुछ विस्तृत ब्यौरों को फिर से याद करें तो इन अति महत्वपूर्ण परिवर्तनों का सम्यक परिदृश्य दिखेगा.
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