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मसजिद में दरवाजा नहीं होता

बाईलाइन

 

मसजिद में दरवाजा नहीं होता

एमजे अकबर


एक खुले दरवाजे वाले मकान के भीतर की स्वतंत्रता और निडरता को किसी धर्म या जाति के चश्मे से नहीं देखा जा सकता. मसजिद में दरवाजा नहीं होता. यह हमेशा खुली होती है. खुदा के प्रति आपकी आस्था और निष्ठा ही इसमें प्रवेश करने की योग्यता है. समर्पण ही इसका भाव. जो लोग प्रार्थना करने आते हैं उनमें एकरूपता है. सब एक ही लाइन में खड़े हैं. नौकर-मालिक सब एक लाइन में और उनके हाथ एक साथ ही खुदा की बंदगी के लिए उठते हैं. भेदभाव और अलगाव की भावना यहां धुंधली पड़ जाती है.

मौलाना अबुल कलाम आजाद कहते थे कि यह पूरा संसार ही खुदा की मसजिद की तरह है. देश भले ही यह कहता हो कि हमने यह काम भगवान के नाम पर किया है, लेकिन भगवान को अपने बंदों की हिफ़ाजत के लिए राष्ट्र की सीमाओं को नहीं ताकना पड़ता. मसजिद न तो कोई फ़ैक्ट्री है और न ही किला. फ़िर इसे अपने ऊपर किसी हमले का डर क्यों हो? ग्राउंड जीरो पर एक मसजिद का विरोध अमेरिकन अधिकारों के तहत हो रहा है. इसका नेतृत्व न्यूट जिनरिच और सराह पेलिन जैसे नेता कर रहे हैं.

इस विरोध का कारण बहुत स्पष्ट नहीं है. कोई युद्ध स्मारक उस युद्ध की याद दिलाने के लिए नहीं बनाया जाता. इसकी महत्ता तो इस बात में होती है कि यह हमें शांति का संदेश दे. यह उन योद्धाओं को सम्मान देने के लिए है जिन्होंने अपनी जान कुर्बान की है. टेस्टामेंट के शब्दों में उन्होंने आज अपना जीवन इसलिए दिया ताकि आपका कल बेहतर हो. एक युद्ध स्मारक विवादों से बचाव का प्रतीक है, विवादों को बढ़ावा देने का नहीं.

वल्र्ड ट्रेड सेंटर के पास मसजिद इस बात का संदेश होगी कि आतंकवाद की विभीषिका से बचने के लिए आम से खास तक सबका सहयोग जरूरी है. यह इस बात का संदेश होगी कि अगर आतंक के आकाओं से लड़ना है तो सबका साथ आना जरूरी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अज्ञानता के कारण अमेरिकी राजनीति के दक्षिणपंथी लोग ग्राउंड जीरो पर मसजिद बनने का विरोध कर रहे हैं. कुछ साल पहले मैं हवाई के पूर्वी-पश्चिमी केंद्र पर एक मीडिया सेमिनार में भाग लेने गया. सेमिनार में जो भी मुसलिम विचारक शामिल हुए थे, उनके लिए आयोजकों की ओर से प्रत्येक शुक्रवार को दोपहर की नमाज अदा करने के लिए एक छोटे से कमरे की व्यवस्था की गयी थी.

वहीं पर स्थानीय लोग भी एक छोटे से समूह में नमाज के लिए जुटते थे. कुछ गैर मुसलिम सहयोगी भी हमारे साथ हो लेते थे, क्योंकि उन्होंने कभी शुक्रवार की नमाज नहीं देखी थी. हालांकि वे इसमें किसी उद्देश्य को लेकर शामिल नहीं हुए थे, लेकिन नमाज के बाद उनमें से कुछ ने कहा कि इमाम ने पश्चिम के खिलाफ़ युद्ध की घोषणा नहीं की है और इसे धर्म और खेमे में बांटकर न देखा जाये. अज्ञानता भी जिनरिच और पेलिन के लिए एक बहाना ही है. वे सबसे शक्तिशाली राष्ट्र का नेतृत्व करने वालों में से एक हैं.

सही है कि कुछ मुसलमानों ने इसलाम को फ़ासीवाद के रास्ते पर ले जाने का काम किया है, लेकिन यह व्यक्ति का दोष है. इसलाम का नहीं.


उन्हें नादान और अज्ञान कहना मूर्खता होगी. ग्राउंड जीरो पर मसजिद का बनना उनकी राजनीतिक आकांक्षाओं को पुख्ता करने का एक और साधन हो जायेगी, जब वो हर मुसलिम को शक की निगाह से देखने लगेंगे. हर मुसलमान को उस पाप का भागीदार मान लिया जायेगा जिसे कुछ सनकी लोगों ने 9/11 के रूप में अंजाम दिया. और नेताओं की एक ऐसी कतार खड़ी हो जायेगी जो मुसलमानों के लेकर मिथ खड़ा करेगी. और फ़िर बीते ऐसे उदाहरण देकर सभ्यता और उन्माद के बीच में अंतर खड़ा किया जायेगा.

विडंबना तो यह है कि जिनरिच पैलिन अमेरिका के आदर्श और दर्शन को ही प्रस्तुत करने में असफ़ल हो रहे हैं. अमेरिका, एक ऐसा देश है जो लोकतांत्रिक है. धर्मनिरपेक्ष है. उदार है और खुले विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाला देश है. जिनरिच अमेरिकी मूल्यों का नेतृत्व नहीं करते, और पैलिन ऐसी अमेरिकी है जिनकी आवाज में असर नहीं है. वास्तव में अमेरिकी छवि का अंकन सही मायने में न्यूयॉर्क के मेयर माइकल रूबेंस ब्लूमबर्ग के माध्यम से होता है. ब्लूमबर्ग ने मसजिद बनाये जाने के विचार का समर्थन किया है.

सही मायनों में ब्लूमबर्ग के भीतर ही अमेरिकी आदर्श और विरासत की छवि देखी जा सकती है. उन्हें पता है कि किस तरह से भेदभाव की खुराक लोगों के दिमाग में डाल दी जा रही है. उन्हें पता है कि किस तरह से सकारात्मक बदलाव को राजनीति के खोमचे में डाल कर गायब करने की कोशिश की जा रही है. जिन्होंने बराक ओबामा को बिना किसी आधार के नोबेल शांति पुरस्कार दिया था उनके लिए ब्लूनबर्ग कहीं बेहतर नाम हो सकता था. वे लोगों के सम्मान के लिए लड़ रहे हैं.

उन लोगों को सही राह पर लाने के लिए लड़ रहे हैं, जिन्होंने राजनीति की आड़ में नीतियों की बोली लगा दी है. कट्टरता किसी भी आवेदन को खारिज करने का पैमाना नहीं बन सकती. हां, यह जरूर है कुछ स्वयंभू मुसलिम नेताओं ने इस संस्कृति को खतरा पहुंचाया है. इस संस्कृति पर आतंकी संस्कृति का ठप्पा लगा दिया है. और इन्हीं लोगों के चलते एक मसजिद के मायने पर सवाल खड़े हुए हैं. लेकिन कुछ लोगों के इस नापाक इरादों से पूरी कौम को तराशने को जायज नहीं ठहराया जा सकता.

जॉर्ज बुश का दिया हुआ शब्द इसलामिक फ़ासीवाद उनकी ही तरह खोखला और झूठा है. इसलाम 1400 साल पुराना है और फ़ासीवाद मुसोलिनी के हाथों से पैदा किया गया विचार है. इसलाम और फ़ासीवाद में बहुत अंतर है. सही है कि कुछ मुसलमानों ने इसलाम को फ़ासीवाद के रास्ते पर ले जाने का काम किया है, लेकिन यह व्यक्ति का दोष है. इसलाम का नहीं. रोमन कैथोलिक चर्च को मुसोलिनी से जोड़कर देखा जा सकता है भला. आतंकवाद एक साजिश है. साजिश हमेशा बंद दरवाजों के पीछे बुनी जाती है. मसजिद में दरवाजा नहीं होता.

 

* लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं.

20.08.2010, 00.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 अच्छा लिखा है अकबर साहब ने. इबादतगाह पर वाकई दरवाज़ा नहीं होना चाहिए. इसी में आदमी से आदमी के नज़दीक आने के ज्यादा आसार हैं, वर्ना मिर्ज़ा ग़ालिब कह गए हैं : "आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक/ कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक."
बेशक वक्त लगेगा, मगर दरवाज़े खुले रहें तो देर भी नहीं लगेगी. अमेरिका में एक मस्जिद अपने पैदा होने के साथ यही जज़्बात बयान कर रही है. दिल मिलने की बात है, फिर बाहरी चीज़ों के फर्क खूबसूरत हो जायेंगे. क्रिश्चियन और हिन्दू मस्जिद में और मुसलमान मंदिर में शान्ति से बैठे नज़र आयेंगे. गुरद्वारे में सब लंगर खायेंगे.
फिक्र न करें, अपना धंधा चौपट होते देख कर भी तमाम बदनाम तालिबान, तमान बिन लादेन, सारे ठाकरे-वाकरे, मोदी और आडवानी सही हो जायेंगे और नए और नेक रोज़गार पा जायेंगे. अकबर साहब के लेख में दो बार 'अज्ञानता' लफ्ज़ आया है, 'अज्ञान' काफी है. इसी तरह छठे पैरे में पहली पंक्ति में 'अज्ञान' की जगह 'अज्ञानी' होना चाहिए. इस छेड़खानी पर मुझ अज्ञानी की सावधानी को माफ़ किया जाए.
 
   

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