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बाढ़ में बही जरदारी की ज़मीन

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बाढ़ में बही जरदारी की ज़मीन

एम जे अकबर


पाकिस्तान में भारत के खिलाफ नफरत का दरिया बहुत गहरा होगा तभी तो उसने भारतीय मदद को ऐसे समय में ठुकराया जब परेशान बाढ़ पीड़ित लोग, खाने के बेशकीमती निवाले के लिए असहाय स्त्रियों से लूटमार करते हों, जब ब्रिटेन और अमरीका के अखबार मदद की गुहार करते विज्ञापनों से भरे पड़े हों. ऐसा समय जब राहत कार्यो के लिए स्वयं संयुक्त राष्ट्र को आगे आना पड़ा. हालात इतने विषम हैं कि विश्व बैंक ने पाकिस्तान की सहायता करने के लिए दो अरब डॉलर देने का प्रस्ताव दिया है. लेकिन तब भी पाकिस्तान ने भारत की 50 लाख डॉलर की मदद अमरीकी धौंस के बाद ही कबूल की.

पाकिस्तान की इस बेमतलब की हरकत पर डॉ मनमोहन सिंह ने जो प्रतिक्रिया दी, उससे साबित हुआ कि भलाई में उनका भरोसा कितना गहरा है: उन्होंने पाकिस्तान को और मदद की पेशकश कर दी. यकीनन, दुश्मनी का सही जवाब तो यही होता है दुश्मन से शराफत से हाथ मिला लिया जाए, भले इसके बाद हमें अपनी अंगुलियां ही क्यों न गिननी पड़ें. लेकिन यहां पाकिस्तान की जनता और सत्ता को एक समझने की गलती नहीं करनी चाहिए.

मुश्किल वक्त में भी सत्ता सियासत कर रही थी, लेकिन भूखे मरने वालों के पास नफरत करने का समय नहीं होता. इस तरह की आपदा का शिकार गरीब आदमी ही होता है क्योंकि अमीर आदमी का घर हमेशा पानी के खतरनाक स्तर से कहीं ऊपर ही होता है. इस बात पर कहीं मतदान नहीं करवाया गया कि बाढ़ की मार झेलने वाले पाकिस्तान के लोग भूखे मर जाना पसंद करेंगे, लेकिन भारत के पैसों से खरीदा गया अनाज नहीं खाएंगे.


इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं इतिहास का निर्णायक मोड़ साबित हो सकती हैं. 1971 में बांग्लादेश का निर्माण होने के कई कारण थे, लेकिन 1970 में पूर्वी पाकिस्तान में तूफान के बाद मची तबाही की याह्या खान सरकार ने जिस निराशाजनक और पूर्वाग्रही तरीके से अनदेखी की, उसी के बाद बंगालियों का यह यकीन पक्का हुआ था कि पाकिस्तान से उन्हें कभी न्याय नहीं मिलने वाला. इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि आज पाकिस्तानी जरदारी से उतने ही खफा हैं, जितने 1970 में बंगाली याह्या खान से थे.

खैबर से बलूचिस्तान तक बाढ़ ने जो कहर भरपाया है वह देश का 20% हिस्सा है, जो इटली जैसे देश से भी कहीं बड़ा है. इस जलप्रलय के बाद पाकिस्तान के जनमानस में एक अर्से से पल रहा यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है कि सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी समेत दूसरे लोकतांत्रिक संगठनों की तुलना में शायद पाकिस्तानी फौज की सत्ता ज्यादा बेहतर है.

जहां तक जरदारी का सवाल है, तो वे अपने लिए फ्रांस में एक महल खरीद सकते हैं. सिंधु घाटी की किसी वीआईपी जेल में नजरबंद होने से तो यह कहीं बेहतर है.


सेना प्रमुख कयानी ने बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए फौरन सैन्य टुकड़ियों को रवाना कर दिया था, जबकि आसिफ अली जरदारी चकित कर देनेवाली संवेदनहीनता और निर्विकार भाव से फ्रांस और ब्रिटेन की कामकाजी सैर पर चले गए.

फौज ने बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए एक दिन की तनख्वाह तत्काल पेश कर दी, लेकिन हुक्मरानों को यह नहीं सूझा. इसके ठीक उलट, जरदारी अपने लंदन के स्यूट में रोज़ाना हजारों डॉलर खर्च कर रहे थे और भुट्टो हुकूमत के घोषित उत्तराधिकारी के साथ हेलीकॉप्टर में बैठकर फ्रांस के अपने महल की ओर सुकून तलाश रहे थे. जरदारी के प्रवक्ता का कहना है कि फ्रांस का यह महल भुट्टो परिवार के पास 18 सालों से है. ज़ाहिर है जब भुट्टो परिवार इस्लामाबाद में सत्तासीन था, उसी समय यह महल उनकी जागीर बना होगा. पाकिस्तान में दो और दो का मतलब फ्रांस में एक आलीशान महल और इंग्लैंड में रियासत का होना माना जाता है.

पाकिस्तान का इंटरनेट एक दूसरी तरह की बाढ़ में डूबा हुआ है. नेट पर जरदारी को चुन-चुनकर गालियां दी जा रही हैं. अफसोस, सबसे बेहतर उदाहरण को यहां पेश नहीं किया जा सकता. ऐसा मानना सही होगा कि इस बाढ़ में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की विश्वसनीयता धुल गई है. और ये पार्टी पाकिस्तानी सत्ता पर केवल कानूनी रूप से ही काबिज़ है, राजनीतिक तौर पर तो उसकी पकड़ खत्म हो गई है. नवाज शरीफ के नेतृत्व वाली मुख्य विपक्षी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग पंजाब में भ्रष्टाचार और कुप्रशासन के कारण अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है. मुख्य दलों द्वारा दूसरी पार्टियों को बचाए रखने के पीछे भी अपने निहित स्वार्थ छुपे हुए हैं. राजनीतिक दलों की अकर्मण्यता ने एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया है जिसे पाकिस्तानी फौज ही भर सकती है.

पाकिस्तान की राजनीतिक पार्टियों को फौज से कहीं अधिक खतरनाक गुटों से असैन्य चुनौती भी मिलर रही है. इसे एक वाक्य में कहा जा सकता है– आतंकी गुटों वाले रूढ़िवादी संगठन, जैसा कि नए नाम वाला लश्कर-ए-तैय्यबा, प्रभावित लोगों के पास प्रशासन से बहुत पहले पहुँचने में कामयाब रहा. इंटरनेट पर चैट करने वाले नागरिकों की सबसे बड़ी उपलब्धि ये रही कि उन्होंने राजनीतिक शून्यता को भरने के लिए आमजन को एकजुट करने की पहल की. लेकिन आनन-फानन में तैयार हुए नागरिक समूह देश की सरकार का विकल्प नहीं बन सकते.

जरदारी का डर वाजिब है. क्या सत्ता से उन्हें बेदखल करना आज भी उतना ही अलोकप्रिय माना जाएगा जितना साल भर पहले होता? असल में, साल भर पहले तो ये असंभव ही होता और आज भी यह संभावित नहीं है. लेकिन एक ऐसे देश में जहां चुने गए अधिकारी बेसब्री भरी खुदकुशी पर आमादा हों, वहां कयानी एक धैर्यवान व्यक्ति के तौर पर उभरे हैं. जरदारी जॉन कैरी जैसे विशिष्ठ अमरीकी व्यक्ति से अपने रिश्ते प्रगाढ़ कर रहे हैं. हालांकि वॉशिंगटन की नापसंदगी इस हद तक नहीं है कि वह अपने हितों को नज़रअंदाज करते हुए किसी की बेदखली में हस्तक्षेप करे. अमरीका अफगानिस्तान में एक सीमाहीन युद्ध में उलझा है और इस्लामाबाद में सशक्त सरकार उसकी रणनीतिक जरूरत है. भले इसका मतलब कयानी की ताजपोशी ही क्यों न हो.

जहां तक जरदारी का सवाल है, तो वे अपने लिए फ्रांस में एक महल खरीद सकते हैं. सिंधु घाटी की किसी वीआईपी जेल में नजरबंद होने से तो यह कहीं बेहतर है.

 

* लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं.

22.08.2010, 03.29 (GMT+05:30) पर प्रकाशित