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गरीबों को चयन का अधिकार

मुद्दा

गरीबों को चयन का अधिकार

संदीप पांडेय

प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की मुख्य बात कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन वाली सरकार की चुनाव पूर्व घोषणा है. गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों को रुपए 3 प्रति किलो की दर पर 25 किलो अनाज. इस बात पर गरीब जश्न मनाये अथवा अपना सिर पीटे, यह समझ में नहीं आता.

इसमें पहली दिक्कत तो यह है कि गांव-गांव की यह कहानी है कि गलत लोगों के पास बीपीएल कार्ड है तथा पात्र लोग छूट गये हैं. गरीबी रेखा के नीचे की सूची दुरुस्त करना बड़ा दुरूह कार्य है. पिछली बार जब उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार ने अपनी बीपीएल सूची सही करनी चाही तो जिन गलत लोगों ने न सिर्फ बीपीएल सूचियों में घुसपैठ की है बल्कि बहुजन समाज पार्टी में भी सेंध लगा ली है, ने ऐसा हल्ला मचाया कि सरकार को अपना सर्वेक्षण रोकना पड़ा.

दूसरी दिक्कत यह है कि गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या केंद्र सरकार ही तय कर देती है जिसके आधार पर गांव स्तर पर भी एक निश्चित संख्या में ही बीपीएल कार्ड बनाये जाते हैं.

जब तक पहले से मौजूद किसी व्यक्ति का नाम गरीबी रेखा से नीचे वाली सूची से निकलता नहीं तब तक किसी नये व्यक्ति का नाम जोड़ा नहीं जा सकता. हाल ही में योजना आयोग ने देश में तेंदुलकर समिति की सिफारिश पर गरीबी रेखा के नीचे 37.2 प्रतिशत लोगों को माना है.

एन.सी. सक्सेना समिति ने 49 प्रतिशत लोगों को गरीबी रेखा के नीचे माना है. अर्जुन सेन गुप्ता समिति के अनुसार देश के 77 प्रतिशत असंगठित मजदूर 20 रुपए से कम खर्च करता है. गरीबों की वास्तविक संख्या तो काफी अधिक है. हम गरीबी का कोई मानदंड तय करें तो कुछ गरीब तो चयनित होने से ही रह जायेंगे.

अत: राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की तरह जिसमें किसी भी जरूरतमंद परिवार को अपना जॉब कार्ड बनवाने की छूट है, किसी भी ऐसे परिवार को जो यह समझता है कि वह गरीब है, को बीपीएल कार्ड मिलना चाहिए व उस कार्ड पर कम दर का अनाज, चीनी, दाल, आदि मिलना चाहिये. इसमें दुरूपयोग की संभावनायें मौजूद हैं. यदि यह माना जाये कि गरीब का वास्तविक प्रतिशत 80 के करीब है तो दुरूपयोग अधिकतम 20 प्रतिशत लोग ही करेंगे. इतना दुरुपयोग तो अभी भी हो रहा है. जिसको रोकने में सरकार अक्षम है और न ही इसे रोकने हेतु उसकी कोई इच्छा शक्ति ही दिखाई पड़ती है. गरीब यदि बीपीएल हेतु अपने को खुद चिन्हित करता है तो कम से कम कोई पात्र परिवार छूटेगा नहीं.

सरकार सारा कृषि उत्पाद सम्मानजनक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद ले तथा मजदूर की मजदूरी, चाहे वह अपने खेत पर हो अथवा किसी अन्य के; का पूरा भुगतान राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत किया जाये.


तीसरी दिक्कत यह है कि राशन ठीक से मिलता ही नहीं. फरवरी 2006 में हरदोई जिले की सण्डीला तहसील पर कई ग्रामीण बीपीएल के पांच साल के खाली राशन कार्ड लेकर धरने पर बैठै थे. इस मांग के साथ कि उन्हें पांच वर्षों का राशन दिया जाये. सूचना के अधिकार जैसे औजार का इस्तेमाल कर लोगों ने राशन व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया. अब जाकर कुछ राशन मिलने लगा है लेकिन पूरी माप व सही दर पर यह अभी भी नहीं मिलता.

रोजी-रोटी अधिकार अभियान की यह मांग है कि बजाय प्रति परिवार 35 या 25 किलो अनाज के प्रति व्यक्ति 14 किलो अनाज, 1.5 किलो दाल व 800 ग्राम खाने का तेल आबंटित होना चाहिये. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि बच्चों को बड़ों की संख्या में शामिल किया जाना चाहिये क्योंकि खाने की दृष्टि से वे बड़ों के बराबर ही खाते हैं.

गैर-चावल व गैर-गेहूं सेवन वाले इलाकों से मांग है कि स्थानीय स्तर पर पैदा किये जाने वाले अन्य अनाजों जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का, कोदो, कुटकी, सामा, आदि को भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था में शामिल किया जाना चाहिये.

बल्कि यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में खरीद व वितरण की व्यवस्था विकेंद्रित हो जाये तो यातायात व भंडारण का खर्च कम होगा. सरकार चाहे तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली का इस्तेमाल कृषि क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिए भी कर सकती है. सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद कि नई आर्थिक नीति के दौर में लोग कृषि छोड़ द्योग या सेवा क्षेत्र में जायें, अभी भी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा क्षेत्र कृषि ही है.

सरकार को ऐसी व्ययवस्था बनानी चाहिये कि सारा कृषि उत्पाद सम्मानजनक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद लिया जाये तथा मजदूर की मजदूरी, चाहे वह अपने खेत पर हो अथवा किसी अन्य के; का पूरा भुगतान राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत किया जाये. ऐसा करने से न सिर्फ कृषि पर छाया संकट कुछ हद तक दूर होगा बल्कि बेरोजगारी की स्थिति पर भी फर्क पड़ेगा.

किसानों की आत्महत्या रोकने के लिये कृषि संबंधित सारे ऋण ब्याज रहित होने चाहिये. मजदूर के लिये यह सहूलियत हो जायेगी कि उसे अभी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत अपने 100 दिनों का काम नहीं मिल पा रहा, वह अपनी कानूनी गारंटी हासिल कर पायेगा.

सरकार की यह मंशा कि राशन की जगह नकद दे दिया जाये गलत है. नकद घर तक पहुंचेगा तथा भोजन के लिये ही खर्च होगा इसकी संभावना कम ही है. महिलायें व बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे. रोजी-रोटी अधिकार अभियान का एक अत्यंत रचनात्मक सुझाव यह है कि राशन कार्ड महिलाओं के नाम पर बनाये जायें. राशन से ज्यादा भ्रष्टाचार नकद योजना में होगा. यह तो देखा ही जा रहा है कि पके-पकाये भोजन में अनाज देने की योजना से कम भ्रष्टाचार है.

अंत में यह सुझाव कि सभी धार्मिक स्थलों पर गुरुद्वारों जैसी लंगर की व्यवस्था हो, जिसमें बिना जाति या धर्म के भेदभाव के कोई भी जाकर भोजन प्राप्त कर सके. मंदिरों व मस्जिदों के बाहर भीख मांगने वाले लोगों को अंदर बैठा कर सम्मानजनक ढंग से भोजन कराने की व्यवस्था होनी चाहिये. यह स्थिति दान देने वाले तथा भोजन पाने वाले दोनों के लिए ही उचित होगी. इस तरह के सामुदायिक भोजन कार्यक्रम की गुणवत्ता किसी भी सरकारी भोजन के कार्यक्रम से बेहतर होगी तथा उसमें भ्रष्टाचार की भी संभावना कम होगी.

24.08.2010, 10.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

gangveer (gang_sr@rediffmail.com) nawanshaher , punjab

 
 सामुदायिक भोजन सिस्टम के अतिरिक्त, कृषि नीति होनी चाहिए.कॉपरेटिव सोसाइटी के जरिये जो छोटा किसान है, वो सामुदायिक खेती करे. इससे छोटे किसान की लागत कम होगी. अगर सरकार के पास अतिरिक्त अनाज है तो उससे ख़राब होने से बचाने का एक तरीका यह है कि पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम के जरिये हर एक बीपीएल और गैर बीपीएल को एख तयशुदा कीमत पर दे दिया जाये. 
   

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