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माननीय का वेतन

बात निकलेगी तो

माननीय का वेतन

प्रीतीश नंदी

मैं कुछ ही दिनों पहले तक एक सांसद था. मुझे वो छह साल बहुत पसंद थे. उन दिनों हर कोई मुझे सर कहा करता था, मेरी उम्र की वजह से नहीं बल्कि इसीलिए कि मैं एक सांसद था. भले ही उन दिनों मैं कभी भी ट्रेन से यात्रा नहीं करता था, लेकिन मुझे इस बात की खुशी रहती थी कि मैं कभी भी, किसी भी ट्रेन से अपने परिवार के लिए आरक्षित प्रथम श्रेणी के डिब्बे में जहां चाहूं जा सकता हूं. जब भी मैं हवाई यात्रा करता था, मेरे आसपास मेरे सामान को उठाने के लिए हमेशा लोग होते थे, इसीलिए नहीं कि मैं बिजनेस क्लास में सफर करता था बल्कि इसीलिए कि मैं एक सांसद था. और हां, जब भी मैंने किसी जरूरतमंद को मदद देने के लिए किसी सरकारी अफसर को पत्र लिखा, वो काम कर दिया गया. नहीं, इसीलिए नहीं कि मैं एक पत्रकार था बल्कि इसीलिए कि मैं एक सांसद था.

इस काम में 4000 रुपए के करमुक्त वेतन के अलावा भी कई अतिरिक्त सुविधाएं थीं. बाद में अचानक इस वेतन को चार गुना बढ़ाकर 16000 कर दिया गया, इसके अलावा 20,000 दफ्तर के खर्चों के लिए और 20,000 रुपए निर्वाचन क्षेत्र भत्ते के रूप में दिए जाने लगे. मैं कार खरीदने के लिए ब्याजमुक्त रकम उधार ले सकता था, चाहता तो मेरे पेट्रोल खर्चे वहन किए जाते, जितने चाहे फोन कॉल मैं मुफ्त में कर सकता था.

मेरा घर मुझे मुफ्त में मिला था. साथ ही इसमें मौजूद फर्नीचर, बिजली, पानी, माली और पौधे भी. इसके अलावा मुझे सोफा कवर और पर्दे धुलवाने के भत्ते मिलते थे और साथ में 1000 रुपए संसद की कार्रवाई में भाग लेने के लिए अलग से भत्ते के रूप में मिलता था. यह बहुत ही हास्यास्पद भत्ता था, क्योंकि मुझे हमेशा से लगता था कि संसद की कार्रवाई में भाग लेना एक सांसद का पहला कर्तव्य है. और हां, हमें 1 करोड़ रुपए साल (जो कि अब बढ़ाकर 2 करोड़ रुपए साल कर दिया गया है) अपने निर्वाचन क्षेत्र पर खर्चे करने के लिए मिलते थे. कुछ उद्यमी सांसदों को कई अतिरिक्त लाभ भी मिलते थे, जिनके बारे में आप अपनी कल्पनाशक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं. एक तरफ तो मैं अपने काम के लिए अत्याधिक रूप से ज्यादा वेतन पाने की बात से शर्मिंदा रहता था, वे हमेशा और ज्यादा की मांग करते रहते थे.

आज, लोक सभा के 543 सांसदों में से 315 करोड़पति हैं. ये 60% है. राज्यसभा में हाल ही में निर्वाचित 54 सांसदों में से 43 भी करोड़पति हैं. उनके द्वारा घोषित संपत्तियों का औसत 25 करोड़ रुपए आता है. ये कुछ अत्यधिक अमीर लोगों का समूह है, जिनके हाथ में हमने अपनी नियति दे रखी है.

हमारे लोकसभा सांसदों की औसत संपत्ति पिछली संसद में 1.86 करोड़ के मुकाबले मौजूदा संसद में 5.33 करोड़ हो गई है. ये 200% ज्यादा है. और, जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे सारे सांसद अपनी संपत्तियां घोषित करने के लिए नहीं जाने जाते हैं. इनमें से ज्यादातर ऐसे रंग चढ़े हुए हैं, जिसे पहचानना हमारे कर कानूनों के बस की बात नहीं है. मुझे लगता है कि यह ठीक है. सांसद होने के नाते आपको काफी अधिकार मिल जाते हैं और जरूरी नहीं कि एक सार्वजनिक मंच पर इन सबके बारे में चर्चा की जाए.

क्या सांसद पद पर रहते हुए अमीर हो जाते हैं? आंकडे बताते हैं कि 2004 के चुनावों में खड़े हुए 304 सांसद जब पिछले साल के चुनावों में फिर खड़े हुए तो इस बीच उनकी औसत संपत्ति में 300% का इजाफा हो चुका था.


अगर आपको लगता है कि सत्तारूढ़ पार्टी में होना फायदेमंद हैं, तो आप बिल्कुल सही हैं. कांग्रेस के 10 में से 7 सांसद करोड़पति हैं. भाजपा के पाँच सांसद करोड़पति हैं. जबकि शिरोमणि अकाली दल, तेलंगाना राष्ट्र समिति और जनता दल (सेकुलर) जैसी छोटी पार्टियों के सारे सांसद करोड़पति हैं. वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, द्रमुक, राष्ट्रीय लोक दल, बहुजन समाजवादी पार्टी, शिवसेना, नेशनल कांफ्रेंस और समाजवादी पार्टी में औसत 60% से ज्यादा करोड़पति सांसद हैं. सिर्फ बंगाल आधारित दो पार्टियां सीपीएम और तृणमूल, मैदान में करोड़पति नहीं उतारतीं.

सीपीएम के 16 सांसदों में 1 करोड़पति हैं, जबकि तृणमूल के 19 सांसदों में से 7. ये आंकडे राज्यवार औसत में दिखाई देते हैं. पश्चिम बंगाल और केरल में कुछ करोड़पति सांसद हैं, जबकि पंजाब और दिल्ली में सिर्फ करोड़पति सांसद ही हैं. हरियाणा इस विशिष्ठता में सिर्फ एक सांसद के चलते रह जाता है, क्योंकि वो बेचारा सासंद करोड़पति नही है.

क्या सांसद पद पर रहते हुए अमीर हो जाते हैं? बेशक वे होते हैं. आंकडे बताते हैं कि 2004 के चुनावों में खड़े हुए 304 सांसद जब पिछले साल के चुनावों में फिर खड़े हुए तो इस बीच उनकी औसत संपत्ति में 300% का इजाफा हो चुका था. और हां, हम यहां सिर्फ घोषित संपत्ति के बारे में बात कर रहे हैं.

लेकिन, हम शिकायत नहीं कर सकते हैं. हम खुद ही अमीरों के लिए वोट करते हैं. पिछले चुनाव में जीतने वाले सांसदों में से 33% ऐसे थे जिनकी संपत्ति 5 करोड़ से ज्यादा थी, जबकि 10 लाख से कम संपत्ति वाले 99.50% उम्मीदवार चुनाव में असफल रहे. पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर को छोड़ कर हर राज्य में करोड़पति सांसदों के पक्ष में वोट दिया गया है. इस मामले में हरियाणा प्रति सांसद 18 करोड़ के औसत मूल्य के साथ सबसे अव्वल है. आंध्र 16 करोड़ के साथ बहुत पीछे नहीं है.

पर नहीं, ये हमारे सांसदों के लिए काफी नहीं है. ये उनके लिए काफी नहीं है कि वे अमीर हैं, जिनका वो प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उनसे मुकाबले तो वो कई गुना अमीर हैं, और हर पद, अवधि उन्हें और ज्यादा अमीर बना देती है. ये उनके लिए काफी नहीं है कि वे परोक्ष रूप से अपने परिवारजनों को फायदेमंद पदों पर काब़िज बनाए रखते हैं. क्या ये काफी नहीं है कि हम और आप कमरतोड़ू करों के माध्यम से उनके भोग-विलास और अन्य खर्चों की भरपाई करते हैं. ये काफी नहीं है कि वास्तव में संसद में एक साल में बमुश्किल 60 दिन ही काम होता है. बाकी का समय बाल की खाल निकालने और हल्ला मचाकर एक-दूसरे पर दोषारोपण करने में निकल जाता है.

अब वे मांग कर रहे हैं कि उनका वेतन 500% बढ़ा दिया जाए और उनको दी जाने वाली सुविधाएं चार गुनी कर दी जाए. सरकार ने शांति बहाली के लिए भी से 300% बढ़ोत्तरी स्वीकार कर ली है, लेकिन ये हमारे सांसदों के लिए काफी नहीं है. वे और ज्यादा चाहते हैं, बहुत ज्यादा चाहते हैं.

और नहीं, मैं ये भी नहीं उल्लेख कर रहा कि पिछले साल चुने गये 150 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं, जिनमें से 73 गंभीर अपराध के हैं, बलात्कार और हत्या जैसे अत्यंत गंभीर अपराध हैं. क्या आपके सच में लगता है कि ये लोग एक औसत भारतीय की कमाई का 104 गुना कमाने के लायक हैं ?

25.08.2010, 18.38 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

rohit pandey (aboutrohit) gorakhpur

 
 प्रीतीश जी, आप तो समाजशास्त्री हैं.आपको क्या लगता है कि जनता अमीरों को चुनकर सामंती व्यवस्था को तो नहीं स्वीकार कर रही है. सांसदों के अमीर होने के पहले हमने चुनाव में देखा और लिखा भी कि गरीब देश के अमीर उम्मीदवार. आपने सही कहा कि समस्या यह है कि हमने अमीरों के हाथ में अपनी नियति दे दी है. अमीरों को सत्त्ता में बैठा कर गरीब देश गरीबी से मुक्ति चाहता है. सांसदों के पास अपने आर्थिक साम्राज्य को साधने और आपराधिक मुकदमे से समय मिले तब तो वे जनता के बारे में सोचें. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 यहीं से तमाम छीन-झपट शुरु होती है. यहीं से सारी हिंसा आती है. इस शातिर सत्ता से बड़ा कोई आतंक नहीं है. ये अलग बात है कि औसत भारतीय ऐसे ही देवी-देवताओं की पूजा करता है और ऐसे ही हरामखोरों को चढ़ावा चढ़ाता है. भुगतो ! 
   

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