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वेतन नहीं कमाई देखिए

बाईलाइन

 

वेतन नहीं कमाई देखिए

एमजे अकबर


सांसदों की तनख्वाह और भत्तों पर गलत वजहों से बहस की जा रही है. हमें तो सांसदों की तनख्वाह बढ़ाने के लिए बाकायदा एक अभियान चलाना चाहिए, लेकिन केवल तभी जब हम उनकी ‘आमदनी’ में कटौती करने का कोई न कोई रास्ता खोज निकालें.

यदि सांसदों की जायज तनख्वाह में चंद हजार रुपयों की और बढ़ोतरी कर दी जाती है तो उससे पूरे देश को परेशान नहीं होना चाहिए. हमें उन करोड़ों रुपयों के बारे में फिक्र करनी चाहिए, जो हमारे सांसद अवैध तरीके से कमा लेते हैं. देश की आम जनता तनख्वाह पर गुजर-बसर करती है लेकिन सांसद अपनी वसूली के दम पर जिंदा रहते हैं.

यह सच है कि भ्रष्टाचार सांसदों तक ही सीमित नहीं है. कुलीनों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जो घूसखोरी की अमर विद्या के जरिये ‘आर्थिक अमरत्व’ हासिल कर लेता है. लेकिन सांसदों की एक अजीब समस्या है, जो उनके लालच छुपाने के लिए स्वनिर्धारित बहाना बन जाती है.

यहां तक कि जो सांसद घूसखोरी से तौबा करते हैं और किफायत से जीना जानते हैं, उन्हें भी अतिरिक्त पैसों की दरकार होती है. उनका जटिल काम और उसके लिए मिलने वाले अधिकारिक वेतन में कोई मेल ही नहीं है. क्या आप कभी किसी ऐसे सांसद से मिले हैं, जो महज 12 हजार रुपए की तनख्वाह में परिवार का पेट पाल रहा हो, दूसरे तरह के खर्चे उठा रहा हो और साथ ही अपने बच्चों को पढ़ा रहा हो?

यह सच है कि सांसद लाखों फोन कॉल मुफ्त कर सकते हैं और सैकड़ों हवाई उड़ानों का उन्हें कोई पैसा नहीं चुकाना पड़ता, लेकिन फोन कंपनियों द्वारा अभी तक ऐसी कोई तकनीक ईजाद नहीं की जा सकी है जिसमें इस तरह के मुफ्त फोन कॉलों को भोजन में तब्दील किया जा सके. उनकी तनख्वाह कोई थ्री-पीस सूट जितनी बड़ी नहीं होती बल्कि एक अदने से चड्डी जितनी ही होती है. लिहाजा सांसदों की यह मजबूरी बन जाती है कि वे तनख्वाह और जीवनशैली के बीच के फासले को पाटने के लिए `दान-दक्षिणा’ स्वीकार करें.

सांसदों की तनख्वाह कम रखी जाने के पीछे यह सोच थी कि चूंकि वे जनता के सेवक हैं, लिहाजा उन्हें जनता के पैसे पर बोझ नहीं बनना चाहिए. इस आदर्शवाद ने जल्द ही पाखंड की शक्ल अख्तियार कर ली. हालांकि कुछ अपवाद भी हैं. सामान्यतः वामपंथी धारणा वाले मुट्ठी भर सांसद ऐसे भी हैं, जो उतने ही पैर फैलाते हैं, जितनी लंबी चादर है और जो अपने राजनीतिक खर्चो के लिए पार्टी के संसाधनों का ही इस्तेमाल करते हैं. लेकिन वे सांसद, जो वकालत जैसा पेशेवर काम कर रहे हैं, और एक दिन की मेहनत में ही अपने समकक्ष सांसदों के महीने भर की तनख्वाह जितना कमा लेते हैं, अपने आप को घूस लेने के लिए हाथ फैलाने से रोक पाते हैं.

भारत के राजनेता जिस तरह की ऐश्वर्यपूर्ण जीवनशैली के आदी हो चुके हैं, उसके लिए अब कोई भी तनख्वाह काफी नहीं है चाहे वह 12 हजार हो या 60 हजार.


राजनेताओं के प्रति हमारा वैरभाव हमें आंशिक त्रुटि की ओर ले जाता है. किसी व्यक्ति के प्रति गुस्से के कुछ फायदे हो सकते हैं, लेकिन हमारी असली समस्या ये बदबूदार व्यवस्था है जो हमारे लोकतंत्र को चलाता है. आज हमारे राजनीतिक दलों के नेताओं को भारी मात्रा में पैसा मुहैया होता है. हमें ऐसा लग सकता है कि हमारे नेता अनाप-शनाप पैसा खर्च कर रहे हैं लेकिन यह उन्हें मिलने वाली रकम का बहुत थोड़ा-सा ही हिस्सा होता है. अब तक इस समस्या को सुलझाने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं हुए हैं क्योंकि यह लगभग असंभव है कि एक अदृश्य-सी चलायमान व्यवस्था में हस्तक्षेप किया जा सके.

चुनावों में अब जिस पैमाने पर पैसा खर्च किया जाने लगा है, उसने भी हमारे लोकतंत्र को एक दूसरी ही दिशा में मोड़ दिया है. यह चुनाव आयोग के नियम-कायदों से कोसों दूर है. हर चुनाव आयुक्त जानता है कि उम्मीदवार ने खर्चो का जो ब्योरा दिया है, वह फर्जी है लेकिन इसके बावजूद वह उस पर दस्तखत कर देता है. क्योंकि यदि सभी चुने गए 543 सांसदों को सजा सुना दी जाए तो संसद भवन एक भूत बंगला हो जाएगा, जहां सिर्फ महात्मा गांधी की आत्मा रहेगी. इन उम्मीदवारों के आंकड़ों में अंतर हो सकता है क्योंकि एक संसदीय क्षेत्र में कोई उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए 2 करोड़ रुपए भी खर्च कर सकता है और 25 करोड़ रुपए भी. और यदि वह थोक के भाव में वोट खरीदने की मंशा रखता है जैसा कि दक्षिण भारत में शुरु हो चुका है, तो मान लें कि 25 करोड़ रुपए तो शुरुआत में ही हवा हो जाएंगे.

चुनाव में खर्च करने के लिए धन के जो स्त्रोत हैं वहीं स्त्रोत निर्वाचन के बाद स्थाई स्रोत हो जाते हैं. हमारे दो तिहाई सांसदों के करोड़पति होने के पीछे दो कारण हैं. पहला कारण तो यह स्थाई धन का स्त्रोत है और दूसरा ज्यादा खतरनाक कारण है चुनाव का धनपतियों के खेल में तब्दील हो जाना. जो इस चमकदार दायरे से बाहर है वो तो बेचारा न्यूनतम जरूरत से ही घबरा जाता है, और अगर वो उतना पैसा इकठ्ठा नहीं कर सकता, तो वो कभी भी विश्वसनीय उम्मीदवार नहीं बन सकता.

मजे की बात तो यह है कि कोई भी नेता गरीबों के समर्थन के बिना चुनाव नहीं जीत सकता, लेकिन लोकसभा में अब गरीबों के लिए कोई जगह नहीं है. हैरत नहीं होनी चाहिए कि आज हमारा एक सांसद औसतन 1.86 करोड़ रुपयों से बढ़कर 5.33 करोड़ रुपयों का मालिक हो गया है. तब इस बात से वाकई क्या फर्क पड़ता है कि किसी सांसद की तनख्वाह 12 हजार रुपए है या 60 हजार रुपए? कुलीनों के इस समूह में कई तो ऐसे हैं, जिनके पास खुद के हवाई जहाज हैं और वे सार्वजनिक विमान सेवाओं का उपयोग करना पसंद नहीं करते जबकि उनके पास इसके लिए मुफ्त टिकटों का प्रावधान है.

भारत के राजनेता जिस तरह की जीवनशैली के आदी हो चुके हैं, उसके लिए अब कोई भी तनख्वाह काफी नहीं है. और अगर उनकी जरूरतों में उनके लालच को भी जोड़ दिया जाए, तब तो उसका कोई ओर-छोर ही नहीं होगा. किसी सांसद के पैसे बटोरने की अधिकतम क्षमता को ही उसकी कार्यक्षमता का मानक मान लिया गया है.

ये तो ईश्वर ही जानता है कि क्या हम इस अव्यवस्था में कभी कोई सुधार देखेंगे, लेकिन हम इसमें संशोधन की शुरुआत तो कर ही सकते हैं. हम अपनी संसद के बहुप्रचारित आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते को तो संसद भवन से हटा ही सकते हैं.

लेकिन सबसे दुखद सवाल यही है कि सांसदों के इस आय़ का परिणाम क्या होगा ?


* लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं.

29.08.2010, 09.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशित