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खाप पंचायतें या पाप पंचायतें

मुद्दा

खाप पंचायतें या पाप पंचायतें

रघु ठाकुर

पिछले कुछ माहों में खाप पंचायतों का हस्तक्षेप बढ़ा है और सगोत्र विवाह को अमान्य करते हुए ऐसे विवाह करने वाले युवक-युवतियों को ग्रामीण समाज की खाप पंचायतों ने कानून हाथ में लेकर स्वत: दंडित करने के फैसले किए.

खाप पंचायत


अनेकों मामलों में तो एक या दोनों विवाह करने वाले पक्षों की हत्यायें कर दी गई हैं. अंतरजातीय विवाहों के प्रति भी इसी प्रकार की सामाजिक कट्टरता का प्रदर्शन हुआ है. चाहे झारखंड की निरूपमा पाठक का मामला हो या दिल्ली की बबली का, संबंधित परिवारों के लोगों ने अपने घर की लड़कियों की हत्या करना पसंद किया परंतु अंतरजातीय विवाहों को स्वीकार नहीं किया.

ऐसी घटनायें यदा-कदा पहले भी होती रही हैं परंतु वे अपवाद स्वरूप थीं. यह आश्चर्यजनक है कि शिक्षा और तकनीक का प्रसार और उपयोग बढऩे के बाद ऐसी घटनाओं में कमी होने के बजाय अंतरजातीय विवाहों के पक्षकारों को दंडित करने की घटनायें ज्यादा बढ़ रही हैं.

लगभग चालीस वर्ष पूर्व 1960 के दशक में भोपाल के मेडिकल कालेज के एक डाक्टर की हत्या अंतरजातीय विवाह रोकने के लिए हुई थी और इसी प्रकार कुछ वर्षों पूर्व नीतीश कटारा हत्याकांड हुआ, वह भी जातीय कारणों से. इन घटनाओं की चर्चा मीडिया ने काफी गंभीरता से की और अपराधियों को दंड दिलाने में महती भूमिका अदा की है.

हरियाणा के मिर्चीपुर गांव में दलित परिवारों के लडक़ों के माता-पिता को दंड का शिकार बनाया गया. हरियाणा, पंजाब और पश्चिम उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से अदालतों में उन आवेदकों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है, जो अंतरजातीय शादी करने की वजह से जातीय समाज की हिंसक प्रतिक्रिया से भयभीत है तथा न्यायपालिका के समक्ष सुरक्षा के लिये आवेदन लगाने को लाचार है. अनेकों प्रकरणों में न्यायपालिका ने ऐसे प्रेमी युगल को सुरक्षा प्रदान की है. तथा पंजाब के एक न्यायाधीश ने तो ऐसे बढ़ते आवेदनों पर चिंता प्रकट करते हुए प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है कि प्रशासन तंत्र तब तक हस्तक्षेप नहीं करता जब तक कि न्यायपालिका आदेश न दें. जबकि प्रशासन का यह वैधानिक दायित्व होता है कि वह नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करे.

हमें इन खाप पंचायतों के तर्क पर बहस करनी होगी. इन खाप पंचायतों का कहना है कि सगोत्र विवाह हिंदू धर्म के अनुसार वर्जित है. क्योंकि सगोत्र युवक और युवतियां एक ही रक्त वाले हैं तथा भाई-बहन जैसे है. कुछ लोगों ने और आगे जाकर तर्क दिया कि गांव के लडक़े और लड़कियां भले वे भिन्न जाति या गोत्र के हों पर एक-दूसरे को भाई-बहन जैसा मानते हैं या मानने चाहिये ताकि ग्रामीण समाज में विकृतियां न फैल पायें.

जहां तक गोत्र का प्रश्न है, गोत्र जाति का छोटा स्वरूप है और जाति बड़ा गोत्र है. अगर एक गोत्र के लोगों के पुरखे भी एक ही माता-पिता से पैदा हुए होंगे, अगर रक्त या समान माता-पिता के तर्क पर सगोत्र विवाह पर निषेध होना चाहिये तो फिर जातीय शादियों को भी प्रतिबंधित करना चाहिये क्योंकि वही लोग कि जो लोग लंबे अतीत से एक माता-पिता की संतान होने के बावजूद भी जाति में शादी होने को उचित मानते हैं तथा सगोत्र के मामले में अपने तर्क को अमान्य करते हैं. काका कालेलकर ने इसी आधार पर जाति के बाहर शादी के पक्ष में कहा था.

सगोत्र विवाह को जो लोग हिंदू धर्म या परंपराओं के विरूद्ध मानते हैं और जाति विवाह को जो लोग धर्म और परंपराओं के अनुकूल मानते हैं, यह दोनों दृष्टिकोण अतार्किक और गलत हैं. फिर ऐसी मान्यताओं के नाम पर कट्टरतायें और हिंसा किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं हो सकते. दरअसल जातिवाद, सगोत्रवाद या खाप पंचायतवाद कमजोर समाज की ऐसी बीमारियां हैं, जो ताकतवर के सामने झुक जाती हैं और कमजोर लोगों को दबाने का प्रयास करती हैं.

जहां तक गांव के भाई-बहन के रिश्ते का सवाल है तो यह न तो इतिहास की घटनाओं से सिद्ध होता है न किसी तर्क से. भगवान कृष्ण की जो गोपिकायें थी, क्या उनमें एक ही गांव की नहीं थी. कस्बा व शहर एक प्रकार से बड़े गांव हैं और फिर इस तर्क पर चला जाये तो कस्बों और शहरों में भी परस्पर विवाह प्रतिबंधित करना होगा.

समाज में फैले रही यौन विकृतियों के बारे में वास्तव में अगर पंचायत वालों को चिंता है तो उन्हें कारणों की खोज करना चाहिये जो समाज में विकृतियां फैला रहे हैं.


श्रीमती इंदिरा गांधी की शादी पारसी व्यक्ति के साथ हुई थी और हरियाणा, उत्तरप्रदेश तथा पंजाब के इन्हीं खाप पंचायतों के सदस्यों ने इन्हें भारी मतों से जिताया था. स्व. राजीव गांधी का विवाह एक ईसाई महिला से हुआ था, परंतु खाप और जाति पंचायतों को कोई आपत्ति नहीं हुई.

हमारे देश में लंबे समय का दर्शन रहा है-समरथ को नहिं दोष गोसाई, आज यथावत जारी है. हमने समाज को लोकतंत्र के अनुकूल ढालने का प्रयास नहीं किया है बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधि वोटों की खातिर समाज को उन कुपरंपराओं की ओर ढकेलते हैं और कट्टरपंथी समाज के सामने घुटने टेक देते हैं. स्व. राजीव गांधी ने मुस्लिम कट्टरपंथ के सामने घुटने टेके थे और लगभग सौ वर्ष से लागू महिलाओं को निर्वाह भत्ता का नियम निजी कानून के नाम पर समाप्त कर दिया था. आज उसी निजी कानून का तर्क खाप पंचायतों के नाम पर हिंदू कट्टरपंथी दे रहे हैं.

हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, कांग्रेस पार्टी के सांसद नवीन जिंदल और किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत इन खाप पंचायतों का न केवल समर्थन कर रहे हैं बल्कि कुछ तो उनके साथ आंदोलन की धमकी दे रहे हैं.

निजी कानून का जनतांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता. संसदीय लोकतंत्र में समाज की बेहतरी के लिए और व्यापक हितों को ध्यान में रखकर व्यक्ति और समूह स्वयंभू अपने अधिकारों और परंपराओं को राज्य के कानून के समक्ष त्यागते हैं. समाज का व्यापक विवेक व्यक्ति या छोटी इकाई के विवेक से सदैव श्रेष्ठ और श्रेयस्कर माना जाता है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का राज्य लागू होता है. बड़े से बड़े अपराधी को भी केवल वैधानिक प्रक्रिया से दंडित किया जा सकता है. व्यक्ति शिकायतकर्ता हो सकता है परंतु स्वत: निर्णय करने वाला न्यायाधीश नहीं हो सकता.

समाज में फैले रही यौन विकृतियों के बारे में वास्तव में अगर पंचायत वालों को चिंता है तो उन्हें कारणों की खोज करना चाहिये जो समाज में विकृतियां फैला रहे हैं. सैकड़ों टीवी चैनलों के माध्यम से इस प्रकार नग्नता भरे कार्यक्रम रोज आते हैं. समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठ पर जिस प्रकार अर्धनग्न चित्र छापे जाते हैं, इनके प्रति ये खाप पंचायतें कभी आक्रोश व्यक्त नहीं करतीं.

सभ्यता को नष्ट करने के इन वास्तविक केंद्रों के प्रति अगर वे चिंता करतीं तो उचित होता बजाय इसके कि फैलाने तंत्र के तो वे हिस्सेदार बने और फिर विकृतियों के प्रति शिकायत करे.

पता नहीं किस सोच के आधार पर मीडिया ने हत्याओं को ‘आनर किलिंग’ कहना शुरू कर दिया. क्या इन हत्याओं से समाज के सम्मान की रक्षा हो सकती है? सम्मान की परिभाषा क्या है ? ये बेगुनाह हत्यायें हैं, जिनके पीछे अंधविश्वास व अतार्किकता कारण है. अगर समाज या खाप पंचायत इन्हें अनुचित मानती हैं तो इनका बहिष्कार हो सकता है, परंतु हत्या करना एक जघन्य अपराध है, जो अक्षम्य है और खाप पंचायतों का पाप भी.

 

01.09.2010, 01.46 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sunil kumar bansingh (sunilbansingh@yahoo.com) ghatsila

 
 मेरे विचार से खाप पंचायत जैसे जंगली कबेलानुमा लोगों को और इनके समर्थन करने वालों को लोकतंत्र प्रक्रिया से बाहर कर देना चाहिए. न तो यह जंगली लोग वोट दे सके न ही चुनाव लड़ कर सके. जो भी लोकतंत्र, देश की कानून और संविधान विरोधी है, वे सभी लोग गद्दार है. 
   
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad/Jaunpur

 
 दरअसल! रघु जी की चिंता जायज है, पर जो इन्होने तर्क दिए है वह आज अप्रासंगिक हो रहे है. जैसे इनका भारतीय राजनीति में जो हश्र हुआ वह राजीव गाँधी या इंदिरा गाँधी का नहीं हुआ, वह भले ही नेहरू के वंशज होने के नाते या समरथ को नहीं दोष गोसांई वाली युक्ति का सवाल हो. पर ऐसा नहीं की 'इन खाप पंचायतों वालों ने सगोत्रीय शादियाँ न की हों या जाति से बाहर न किया हो, ऐसा नहीं है'. पर जब किसी सूबे के भूतपूर्व वर्तमान और भविष्य के मुख्यमंत्री और नए ज़माने के किसान नेता ने इसका दायित्व संभाला हो तब ऐसा कैसे नहीं होगा.

अब सवाल है रघु जी की जब आप जैसे बुद्धिजीवी राजनेता समाजवादियों को पूंजीवादियों की झोली में जाने से रोकने में सफल नहीं हो पाते है, खाप के अलमबरदारों की लथैट का भार और ताप तो किसी न किसी को झेलना ही पड़ेगा. चाहे वह उन्ही की जाती के ही क्यों न हों ? यह पागलपन ऐसी ही कौमों में होता है जो एक ज़माने में इन मान्यताओ के घोर विरोधी रहे हों.

गणेश जी के दूध पीने का सवाल हो या 'शिला पूजन' का तिक्कैत के टिके रहने का मामला. जिसकी लाठी उसकी भैंस.ये जवान जो सम्मान ही करना नहीं जानता किसी का करना 'उसी की हत्या से' उपजता है ‘आनर किलिंग’का मामला.

यदि वास्तव में इन किसानों की उपज को बचाना है तो सांस्कृतिक सदभाव बढ़ाना होगा नहीं तो यह चैनल तभी तो चलेंगे 'तेरे बिन लादेन' देख लीजिए. कहाँ जाये किसी सरकारी मशीनरी से ही तो इन चैनलों को भी मान्यता मिलती होगी, क्या मोटी रकम से यह खेल हो रहा है या और कोई तरीका है ?
 
   
 

ramesh kumar (rk140676@gmail.com) azamgarh

 
 जहां तक मेरी जानकारी है कि गोत्र की परिकल्पना ब्रह्मणों ने अपने हित के लिए की. उन्होंने एक विशेष कबीले को अपना नाम दिया और उस कबीले के बन गए पुरोहित ताकि उनका पेट भरता रहे. खाप(पाप) पंचायतों को वक़्त के साथ चलना चाहिए. रही बात अपनी परंपराओं को निभाने की तो ऐसी बहुत सारी परम्पराएं हैं, जिनको यदि निभाने लगा जायें तो ढ़ेर सारी समस्याएं खड़ी हो जाएंगी. जैसे एक परंपरा है नियोग. इसमें पति के मर जाने पर या पुत्र पैदा न कर पाने में अक्षम होने पर स्त्री अपने देवर या किसी करीबी पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बना सकती थी. क्या खाप वाले इस परंपरा को मानेंगे. इसी तरह ऐसी बहुत सारी परम्परायें है, जिन्हें बताने लगूं तो आपका सर भन्नाने लगेगा. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 जी हाँ! ये पाप की पचायतें हैं, जी हाँ! ये आत्मघात की पंचायतें हैं.
मेरे हुजूर! ये शैतानों के बाप की पंचायतें हैं !
 
   

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