सलमान होने का मतलब
कला
सलमान होने का मतलब
प्रीतीश नंदी
पिछले अरसे बाद ऐसा हुआ है कि किसी फिल्म के प्रोमो ने मुझमें इतनी दिलचस्पी जगाई
है कि मैं उसका पहले दिन का पहला शो देखने के लिए बेताब हूं. मुझे इस बात का अनुमान
नहीं है कि फिल्म अच्छी होगी या बुरी. संभावना तो यही है कि फिल्म चलताऊ ही होगी.
हाल ही में इस तरह की दो फिल्में आई थीं और वे दोनों भी ऐसी ही थीं. यह अलग बात है
कि उन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर खूब पैसे बटोरे.
उनमें से एक आमिर खान की फिल्म थी, जिसके बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के बाद आमिर ने
मार्केटिंग के महारथी का रुतबा हासिल कर लिया. इसकी एक वजह यह भी रही कि आमिर ने
शाहरुख खान की सल्तनत में सेंध लगा दी थी. शाहरुख खान ‘रब ने बना दी जोड़ी’ जैसी
फिल्म में अपने जाने-पहचाने रंग-ढंग के साथ मौजूद थे, लेकिन इस फिल्म के प्रदर्शन
के महज दो हफ्तों बाद रिलीज हुई आमिर की फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया.
देखते ही देखते सभी का ध्यान सुरिंदर साहनी से हटकर संजय सिंघानिया पर केंद्रित हो
गया. मेरी नजर में दोनों ही फिल्में सामान्य थीं, लेकिन आमिर की फिल्म बहुत बड़ी
हिट हो गई. साथ ही इसने बॉलीवुड को कामयाबी का एक नया मंत्र भी दे दिया- खूनखराबे
से भरा ‘तमिल तड़का’.
इसकी सफलता के बाद इसी शैली की एक और फिल्म आई, लेकिन वह तमिल के बजाय तेलुगू मूल
की थी- वांटेड. आप इससे बुरी किसी दूसरी फिल्म की कल्पना नहीं कर सकते. कमजोर
कहानी, ढीली बुनावट, बिना किसी कुशलता के एक साथ नत्थी कर दिए गए अलग-अलग बिखरे हुए
हिस्से. इसके बावजूद अगर इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के झंडे गाड़ दिए तो
उसकी वजह थे सलमान खान. सलमान अपने चिर-परिचित अंदाज में परदे पर आए थे और उनका यही
जादू काम कर गया. स्क्रीन पर सलमान का होना ही काफी होता है.
अगर आप मेरी तरह फिल्म को उसके प्रीमियर या टीवी पर नहीं देखते हैं. अगर आप फिल्म
को मल्टीप्लेक्स के बजाय पुराने ढर्रे वाले सिंगल स्क्रीन टॉकीज में देखते हैं, तो
आप समझ सकते हैं कि सलमान का जादू क्यों चलता है. अकड़ से भरी उनकी चाल पर सीटियां
बजती हैं. पुराने ढब के इन टॉकीजों में सलमान की हर अदा पर तालियां पड़ती हैं. उनके
संवादों को दर्शक दोहराते हैं. कई ऐसे भी होते हैं, जो इससे पहले भी कई बार वह
फिल्म देख चुके होते हैं. वे भी सलमान के साथ-साथ डायलॉग बोलकर सुनाते हैं.
सलमान अकेले ऐसे सितारे हैं, जिनके प्रशंसक उनसे अभिनय की उम्मीद नहीं करते. वे बस
इतना ही चाहते हैं कि सलमान ठसक के साथ अकड़कर चलें, गाहे-बगाहे एकाध करारे डायलॉग
छोड़ते रहें और जरूरत पड़ने पर अपने से भी कद्दावर गुंडों की ठुकाई कर दें. हां, वे
एक क्षण के लिए अपनी तालियां सबसे ज्यादा सहेजकर रखते हैं, वह पल होता है जब सलमान
अपनी शर्ट उतारते हैं. फिर चाहे सलमान को यह काम किसी की पिटाई करने के लिए करना
पड़े या कोई चालू किस्म का गाना गाने के लिए.
आमिर इससे ठीक उलट हैं. वे कभी नहीं चाहते कि उनसे कोई गलती हो. उनके लिए हर रोल
जिंदगी और मौत का सवाल होता है. उनकी फिल्में भी सलमान की फिल्मों के ठीक उलट होती
हैं. वे इतनी एहतियात के साथ बनाई गई होती हैं कि प्रत्येक दृश्य से फिल्म की भावना
और अहसास नजर आते हैं. फिल्म के दृश्यों में आमिर का व्यावहारिक कौशल नजर आ ही जाता
है, लेकिन उन्हें इसलिए नजरअंदाज कर दिया जाता है क्योंकि वे आमिर हैं और कुछ भी
गलत नहीं कर सकते. अब तो आमिर के प्रोड्यूसरों ने भी खुलकर शाहरुख खान के साथ नंबर
गेम की जंग छेड़ दी है.
अखबारों में पूरे-पूरे पन्नों के विज्ञापन छपवाए जाते हैं, जिनमें आमिर की फिल्मों
के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के आंकड़े होते हैं. यह सिलसिला तब तक जारी रहता है, जब तक
फिल्मी पंडित इस जोड़-गणित से तौबा नहीं कर लेते. अक्षय कुमार के निर्माताओं ने भी
कुछ समय के लिए नंबर गेम की इस होड़ में शिरकत की, पर पिछली कुछ फिल्मों के पिटने
के बाद वे अब खामोश हो गए हैं. लेकिन अक्षय का करिश्मा अब भी बरकरार है. अक्षय
जानते हैं कि उनके पास हंसी-ठिठोली का ऐसा माद्दा है कि यदि पटकथा में थोड़ी-बहुत
झोल भी हो तो वे उसे छुपा लेंगे. शायद इसी भरोसे से अक्षय आंख मूंदकर कोई भी फिल्म
साइन कर लेते हैं.
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क्या मैं खुद कभी इस तरह की कोई फिल्म बनाऊंगा? शायद नहीं. क्या मैं इस
तरह की कोई फिल्म देखने का सुझाव दूंगा? कतई नहीं. |
यह दिलचस्प है कि आज सलमान को छोड़ बाकी सारे फिल्मी अभिनेता ‘स्टार’ नहीं लगते. वे
अब स्टार से ज्यादा बिजनेसमैन दिखने लगे हैं. शाहरुख तो एक बिजनेस पत्रिका के कवर
पर भी अवतरित हो चुके हैं. अब वे स्टार के बजाय किसी प्रोडच्यूसर सरीखा व्यवहार
करते ज्यादा नजर आते हैं. यही हाल आमिर का भी है. वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि
व्यवसायी या प्रोड्यबसर की छवि के साथ एक बड़ा प्रशंसक वर्ग तैयार नहीं किया जा
सकता. आम आदमी किसी बनिये की सराहना नहीं कर सकता.
जब मैं छोटा था, तब अधिकतर फिल्मों में खलनायक गांव का महाजन या शहर का सफेदपोश
साहूकार ही होता था. अब भारत की तस्वीर बदल गई है और लोगों के लिए पैसा कोई खराब
चीज नहीं रह गई है, लेकिन हमारे देश का आम आदमी आज भी किसी अमीर आदमी के बजाय अपने
हीरो को ही रुपहले परदे पर देखना पसंद करता है. पूरे दो दशक तक हमारे बॉलीवुड का
हीरो एक ऐसा एंग्री यंग मैन रहा, जो सिस्टम से अकेले लड़ता था और अकेले ही
गुनहगारों का पर्दाफाश भी कर देता था.
इसीलिए मैं एक बार फिर चुलबुल पांडे के बारे में सोच रहा हूं. मुझे कोई शक नहीं है
कि ‘दबंग’ किस तरह की फिल्म होगी. लेकिन मैं ऐसी फिल्मों को पसंद करता हूं, जिनमें
कोई सिरफिरा किस्म का हीरो उतनी ही सिरफिरी किस्म की कहानी के साथ हमारे सामने आता
है और परदे पर अजीबोगरीब हरकतें करते हुए दर्शकों का दिल जीत लेता है. आज सलमान से
बेहतर इस काम को और कोई अंजाम नहीं दे सकता.
क्या मैं खुद कभी इस तरह की कोई फिल्म बनाऊंगा? शायद नहीं. क्या मैं इस तरह की कोई
फिल्म देखने का सुझाव दूंगा? कतई नहीं. लेकिन क्या मैं सीटियां बजाते, तालियां
पीटते सलमान के दीवाने प्रशंसकों के बीच किसी एकल ठाठिया टॉकीज में यह फिल्म देखने
जाऊंगा? जी हां. फिल्म देखने के इस सबसे मजेदार अनुभव के लिए ही मैं पैसे खर्च करता
हूं. यह मुझे अपने बचपन के दिनों की याद दिलाता है. यह मुझे उन फिल्मों की याद
दिलाता है, जहां हमारी फिल्में निहायत ‘फिल्मी’ किस्म की हुआ करती थीं और हमारे
फिल्मी हीरो कुछ भी कर सकते थे.
02.09.2010,
03.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित