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टोनी ब्लेयर का सच-झूठ

बाईलाइन

 

टोनी ब्लेयर का सच-झूठ

एम जे अकबर


हाल ही में प्रकाशित टोनी ब्लेयर के संस्मरणों की किताब का सबसे ज्यादा आश्वस्त करने वाला पहलू एक फोटोग्राफ में नजर आया. यह एक बुकस्टोर की तस्वीर थी. किताब की जिल्द पर लाल रंग की पर्ची चिपकी थी, जिस पर लिखा था : ‘हाफ प्राइज’. ठीक ही है. जो आदमी अपने देश को झूठ बेचता रहा, उसकी किताब डिस्काउंट पर बेची जा रही है. किताब के पन्ने आत्मदया के भाव से रंगे हुए हैं, लेकिन ब्रिटेन के लोगों ने उसे जिस तरह नजरंदाज किया, उसे जाहिर हो गया कि वे ब्लेयर के प्रति क्या राय रखते हैं.

ब्लेयर की दिक्कत यह नहीं है कि मार्च 2003 में वे इराक के खिलाफ एक बेकार की जंग में जॉर्ज बुश के सहयोगी बन गए थे. गलतियां हर बड़े नेता से होती हैं. ब्लेयर की दिक्कत यह है कि वे बिना किसी पछतावे के झूठ बोलते रहे. उन्होंने मनगढ़ंत बहाने बनाए और एक एेसे मुल्क से जंग छेड़ दी, जो कभी ब्रिटेन की राह में रोड़ा नहीं बना था. ब्लेयर के विदेश मंत्री जानते थे कि इस लड़ाई की तमाम दलीलें झूठी हैं और इसीलिए उन्होंने इस्तीफा भी दे दिया, लेकिन लेबर पार्टी के बाकी लोगों ने सत्ता के लिए अपने जमीर को गिरवी रख दिया.

यह संयोग ही है कि ब्लेयर की यह ‘कहानी’ उस दिन छपकर आई, जब अमेरिका ने इराक में कॉम्बैट अभियान के अंत की आधिकारिक घोषणा की. ओबामा के इस कदम से जाने कितने अमेरिकी टिप्पणीकारों और अफसरों ने राहत की सांस ली होगी क्योंकि अब उन्हें किसी तरह का दिखावा नहीं करना पड़ेगा.

कुछ अमेरिकी विश्लेषकों ने इस जंग को सही ठहराने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा लिया था, लेकिन अमेरिका के रक्षा सचिव रॉबर्ट गेट्स ने स्वीकारा कि उनके पास एक बुनियादी सवाल का जवाब नहीं है. उन्होंने कहा : ‘जिस लड़ाई की बुनियाद ही ठीक न हो, उसके नतीजे अगर अमेरिका के लिए अच्छे भी हों तब भी उस पर सवालिया निशान तो हमेशा ही रहेंगे.’

ब्लेयर जानते हैं कि जंग की बुनियाद क्या थी. बुश ने अपने राज्य सचिव कॉलिन पॉवेल को हुक्म दिया था कि वे संयुक्त राष्ट्र के सामने सफेद झूठ बोलें. पॉवेल ने अपनी विश्वसनीयता को दांव पर लगाते हुए कहा कि अमेरिका को सद्दाम के पास ऐसे हथियारों के पुख्ता सबूत मिले हैं, जो व्यापक पैमाने पर जनसंहार का कारण बन सकते हैं. ब्लेयर झूठ बोलने में किसी से पीछे नहीं रहे. उन्होंने अपनी संसद में यह कह दिया कि हम विशाल नरसंहार से महज 45 मिनटों के फासले पर हैं.

जब आप लगातार झूठ बोलते हैं तो एक सीमा के बाद अपने लिए कुछ वहम भी गढ़ लेते हैं. इसीलिए जब ब्लेयर अपनी किताब में यह स्वीकार करने पर मजबूर हो गए कि उन्होंने झूठ कहा था, तब वे खुद की तुलना नेल्सन मंडेला से करने लगे! इस तरह की गुस्ताखी आम लोगों के बूते की बात नहीं हो सकती. लेकिन बात यहीं तक होती तो भी गनीमत थी. इसके बाद ब्लेयर यह भी कह डालते हैं कि ‘मुझे पूरा यकीन है, गांधी भी ऐसे ही थे.’

लंदन में एक बुकस्टोर का हैरान-परेशान मालिक सोच रहा है ब्लेयर की किताब को फिक्शन की श्रेणी में रखे या नॉन फिक्शन की? मेरे ख्याल से इसे हॉरर स्टोरी की श्रेणी में रखना चाहिए

लेकिन वे यह रहस्य नहीं सुलझा पाए कि आखिर क्यों इराकियों ने एंग्लो-अमेरिकन फौज के आगे हथियार नहीं डाले और बुश-ब्लेयर गठजोड़ का पलक-पांवड़े बिछाकर स्वागत नहीं किया, जो उन्हें सभ्यता और मैकडॉनल्ड की राह पर ले जाने के लिए कमर कसे हुए थे.

आखिर क्यों सद्दाम के पतन के बावजूद इराकियों ने हार नहीं मानी और एक अजेय सेना से लड़ाई जारी रखी? चूंकि उन्हें इस दुनिया के तौर-तरीकों से तो इस सवाल का जवाब नहीं मिल सकता था, लिहाजा उन्होंने सोचा कि इसका जवाब जन्नत में मिल सकता है.

वे लिखते हैं कि उन्होंने इस्लाम और ‘चरमपंथ’ के रिश्ते को समझने में भूल की. केवल ‘चरमपंथी’ ही पेंटागन और वाइटहॉल से भेजे गए उन सैनिकों से लड़ सकते थे, जो अपने साथ तोहफे में चॉकलेट और लोकतंत्र लेकर आए थे. यदि वे ‘मध्यस्थ’ होते तो वे आजादी के इन अग्रदूतों का स्वागत ही करते, जबकि इस दौरान ये अग्रदूत संग्रहालयों में लूटपाट करते रहे, तेल मंत्रालय पर काबिज हुए और फिर सीरिया और इर्रान जैसे दूसरे मुल्कों की ओर कूच कर गए. मानहानि के लिए कानून है, लेकिन पाखंड के लिए कोई कानून क्यों नहीं है?

बुश और ब्लेयर का सेंस ऑफ ह्यूमर भी बड़ा अजीबोगरीब है. जब ब्लेयर प्रधानमंत्री की नौकरी गंवा बैठे तो उनका नाम मध्य एशिया में विशेष शांतिदूत के तौर पर प्रस्तावित कर दिया गया. गुरुवार को जब बराक ओबामा ने इजरायल और फलस्तीन सहित मिस्र और जोर्डन को बातचीत के लिए बुलाया था, तब उन्हें अहसास हुआ होगा कि कमजोर याददाश्त के क्या फायदे हैं. वे तो अब भूलना भी भूल चुके हैं.

यूरोप के एक अखबार में बड़ा मजेदार कार्टून छपा है. लंदन के एक बुकस्टोर का हैरान-परेशान मालिक अपनी मैनेजर से पूछ रहा था कि वह ब्लेयर की किताब को फिक्शन की श्रेणी में रखे या नॉन फिक्शन की? मेरे ख्याल से इस किताब को हॉरर स्टोरी की श्रेणी में रखा जाना चाहिए.


* लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं.

05.09.2010, 11.29 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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