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क्या भाजपा मध्यमार्गी पार्टी बन सकती है?

क्या भाजपा मध्यमार्गी पार्टी बन सकती है?

 

राम पुनियानी


हिंदुत्व का सहारा लिए बिना, कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत से ऐसा संदेश जा रहा है मानों भाजपा बदल रही हो और एक मध्यमार्गी पार्टी बनने की राह पर हो. वो अब सबको साथ लेकर चलना चाहती है. क्या ऐसा संभव है? क्या ऐसा हो सकता है?


कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भाजपा भारतीय प्रजातंत्र का कंज़रवेटिव ध्रुव बनने जा रही. उनका कहना है कि देर सबेर भारतीय प्रजातंत्र दो ध्रुवीय बन जाएगा जिसका एक ध्रुव होगी उदारवादी कांग्रेस और दूसरी कंज़रवेटिव भाजपा.


इन बातों में कोई दम नहीं है. हम कर्नाटक चुनाव को ही देखें. कर्नाटक में कांग्रेस के मतों का प्रतिशत जहां पिछली बार के 35.28 से घटकर 34.40 प्रतिशत रह गया, वहीं उसकी सीटों में बढ़ोत्तरी हुई. उसकी सीटें 65 से बढ़कर 68 हो गईं.


भाजपा को 33.86 प्रतिशत अर्थात कांग्रेस से कम वोट मिले परंतु उसने 110 सीटों पर विजय हासिल की. यह स्थिति हमारी चुनाव व्यवस्था की एक बड़ी खामी की ओर इंगित करती है. विधानसभा क्षेत्रों के पुर्नगठन की भी इस विडंबनापूर्ण स्थिति के निर्माण में कुछ भूमिका हो सकती है. कर्नाटक में अब हालत यह है कि सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी विपक्ष में बैठी है जबकि दूसरे नंबर पर रही पार्टी सरकार चला रही है.

हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना उस मुस्लिम राष्ट्रवाद की परिकल्पना से बहुत भिन्न नहीं है जिसकी जनक स्वतंत्रता पूर्व की मुस्लिम लीग थी और जिसका इस्तेमाल अभी हाल तक पाकिस्तान का सेना-मुल्ला गठजोड़ सत्ता में बने रहने के लिए कर रहा था. भाजपा के अधिकांश कार्यकर्ता आर.एस.एस. से हैं और आर.एस.एस. ही भाजपा के एजेंडा की अंतिम निर्धारक है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कई वर्षो से भाजपा कर्नाटक में स्वयं को स्थापित करने के लिए महती प्रयत्न कर रही थी. सबसे पहले भाजपा ने बाबा बुधनगिरी दरगाह बनाम दत्ता पीठम् के मुद्दें को उठाया. आखिर दक्षिण भारत में पैठ बनाने के लिए इस तरह के भावनात्मक मुद्दे से बेहतर क्या हो सकता था? जिन अन्य कारकों ने भाजपा की जीत में भूमिका निभाई उनमें शामिल हैं ईदगाह मैदान और उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा देने के मुद्दों पर विवाद और तटीय क्षेत्रों में अल्पसंख्यक-विरोधी हिंसा. यद्यपि भाजपा का तटीय क्षेत्रों में प्रदर्शन कोई विशेष अच्छा नहीं रहा परंतु वहां लंबे समय तक चली हिंसा ने पूरे राज्य का सांप्रदायिकीकरण कर दिया.


पिछले कई वर्षों में कर्नाटक का बहुत तेजी से शहरीकरण हुआ है और बेंगलोर देश के एक बड़े आई.टी. केंद्र के रूप में उभरा है. गुजरात में भाजपा के जनाधार का विश्लेषण यह बताता है कि भाजपा को शहरी क्षेत्रों, साक्षर वर्ग, हिंदू उच्च जातियों और आर्थिक रूप से समृध्द वर्गों में अपेक्षाकृत अधिक समर्थन मिलता है. कांग्रेस और भाजपा के जनाधारों में यह अंतर दोनों पार्टियों के एजेंडा के अंतर को रेखांकित करता है. भाजपा अपने सहयोगी ''वनवासी कल्याण आश्रम'' के जरिए आदिवासियों में अपनी पैठ बनाने में सफल रही है. ''सामाजिक समरसता मंच'' के जरिए भाजपा ने दलितों के एक हिस्से को भी अपने साथ कर लिया है.


इस पृष्ठभूमि में यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है कि भाजपा के एजेंडे से किस वर्ग को लाभ होगा. भाजपा/हिंदुत्व एजेंडे में मुख्यत: शामिल हैं: अल्पसंख्यकों के तथाकथित तुष्टिकरण का विरोध, संविधान की धारा 370 को रद्द किया जाना और समान नागरिक संहिता लागू किया जाना. इन मुद्दों की कोई विशेष चर्चा कर्नाटक चुनाव में नहीं हुई. क्या इससे हम यह निष्कर्ष निकालें कि भाजपा बदल गई है? आज की भाजपा क्या सन् 1980 के दशक की भाजपा से भिन्न है जब वो राम मंदिर मुद्दे के बल पर शक्तिशाली बनकर उभरी थी और नतीजे में अल्पसंख्यकों के विरूध्द पूरे देश में व्यापक हिंसा हुई थी?


यह मानने का कोई कारण नहीं है कि भाजपा बदल गई है. भाजपा आज भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पल्लू से बंधी हुई है. आर.एस.एस. भारत में धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र के स्थान पर हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है. हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना उस मुस्लिम राष्ट्रवाद की परिकल्पना से बहुत भिन्न नहीं है जिसकी जनक स्वतंत्रता पूर्व की मुस्लिम लीग थी और जिसका इस्तेमाल अभी हाल तक पाकिस्तान का सेना-मुल्ला गठजोड़ सत्ता में बने रहने के लिए कर रहा था. भाजपा के अधिकांश कार्यकर्ता आर.एस.एस. से हैं और आर.एस.एस. ही भाजपा के एजेंडा की अंतिम निर्धारक है. हां, चुनावी मजबूरियों के चलते कभी कभी उसे गिरगिट की तरह अपना रंग बदलना पड़ता है. भाजपा ने अपने शब्दों से न सही परंतु अपने कृत्यों से अपने प्रमुख समर्थकों को यह संदेश दे दिया है कि वो मुसलमानों के, दलितों के और पिछड़े वर्गो के खिलाफ हैं. मुसलमानों के प्रति भाजपा का विरोध उसके सच्चर कमेटी के विरोध से जाहिर है, उसका दलित विरोध, उसके किसी भी प्रकार के आरक्षण के विरोध से स्पष्ट है और मंडल आयोग की रपट को लागू होने से रोकने के लिए भाजपा द्वारा राममंदिर का मुद्दा खड़ा करने से यह साफ है कि भाजपा को पिछड़े वर्गो से भी कोई बहुत लगाव नहीं है. अब भाजपा को यह दोहराते रहने की जरूरत नहीं है कि वह किसके साथ है और किसके नहीं.


पिछले वर्ष हुए गुजरात चुनाव में भी भाजपा शायद अपने हिंदुत्व एजेंडा का इस्तेमाल नहीं करती परंतु सोनिया गांधी द्वारा उसके लिए ''मौत के सौदागर'' शब्द के इस्तेमाल ने उसे मजबूर कर दिया. भाजपा की राजनीति के लिए इतने उपयुक्त विशेषण के इस्तेमाल से भाजपा घबरा गई और उसने अपना चोला उतार फेंका. वो अपने असली, सांप्रदायिक रूप में आ गई.


संघ परिवार ने पहले स्वयं को गांधीवादी समाजवाद के रंग में रंगा. राम मंदिर की चमक के आगे यह रंग फीका पड़ गया. उसके बाद से उसने हिंदुत्व के मुद्दे बिना किसी हिचक के उठाने शुरू कर दिए. गुजरात में सन् 2002 के कत्लेआम के बाद हुए चुनाव में मिली सफलता ने उसे उसके हिंदुत्व के एजेंडे पर जमे रहने की उपादेयता बताई.


संघ परिवार यह जानता है कि वह अपने बल पर केंद्र में सत्ता में नहीं आ सकता. उसके लिए उसे अवसरवादी मध्यमार्गी पार्टियों के साथ गठबंधन बनाना पडेग़ा. वो अपना हिंदुत्व का एजेंडा टुकड़ों में लागू करेगा और हिंदू राष्ट्र के अपने सपने का साकार करने के लिए तब तक इंतजार करेगा जब तक कि सत्ता के सभी सूत्र उसके हाथों में नहीं आ जाते. हिटलर ने भी ठीक यही रास्ता अपनाया था. दूसरों के साथ गठबंधन करके प्रजातांत्रिक तरीके से सत्ता में आओ, सत्ता पर पूरी तरह काबिज हो जाने के बाद अपने गठबंधन के साथियों को नष्ट कर दो और साथ ही प्रजातंत्र का भी खात्मा कर दो. श्री देवगौड़ा की जो बुरी गत कर्नाटक में बनी वह भाजपा के गठबंधन के साथियों के भविष्य की ओर इशारा करती है. कौन कहता है कि इतिहास अपने आपको नहीं दोहराता?

05.07.2008, 13.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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