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पाखंड के लिए नोबेल

बाईलाइन

 

पाखंड के लिए नोबेल

एम जे अकबर


अब समय आ गया है कि ईमानदारी के लिए भी नोबेल पुरस्कार दिया जाए. एक समझदार विकल्प तो यह होगा कि शांति के नोबेल पुरस्कार को समाप्त कर दिया जाए, क्योंकि इसके लिए सही उम्मीदवार की तलाश करने के लिए कमेटी को हर साल खूब तकलीफ उठानी पड़ती है. हालांकि इसके बावजूद वह एक ऐसे आदमी को यह पुरस्कार थमा सकती है, जिसने हाल ही में जंग का ऐलान किया हो.

वैसे मेरी सलाह में रुसी वित्त मंत्री अलेक्सेई कुद्रीन ईमानदारी के पहला नोबेल पुरस्कार के सबसे अच्छे उम्मीदवार हो सकते हैं. सितंबर के पहले हफ्ते में उन्होंने एक समाचार एजेंसी इंटरफैक्स को कहा कि रूस की अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए उनके देशवासी सबसे अच्छा योगदान यही कर सकते हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा स्मोकिंग करें और शराब पिएं. उनके शब्द थे, “यदि कोई व्यक्ति सिगरेट का एक पैक पी रहा है तो इसका मतलब यह है कि वह सामाजिक सेवाओं में, बढ़ती जन्मदर काबू करने में आदि में अपनी मदद दे रहा है. लोगों को समझना चाहिए, जो शराब पीते हैं और जो सिगरेट के कश लगाते हैं वे देश की ज्यादा मदद कर रहे हैं.”

ईमानदारों की फेहरिस्त में एक नाम और जोड़ा जा सकता है. १क् सितंबर को संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के अंडर सेक्रेटरी जनरल शा जुकैंग ने महासचिव बैन की-मून से कहा : ‘मैं जानता हूं कि आप मुझे पसंद नहीं करते, मिस्टर मून - लेकिन मैं भी आपको पसंद नहीं करता..’. अलबत्ता पुरस्कार तो फिर भी कुद्रीन को ही दिया जाना चाहिए. जुकांग ने यह बात नशे की झोंक में कही थी, लेकिन कुद्रीन पूरी तरह होशोहवास में थे.

उनका तर्क बिल्कुल साफ है. स्मोकिंग से कैंसर होता है और कैंसर समय से पहले ही लोगों की जान ले लेता है. कोई मुर्दा कभी पेंशन के लिए दावा नहीं कर सकता, जो राज्य के लिए अच्छा है. इससे एक और फायदा यह होता है कि आयु का अनुपात युवाओं के पक्ष में झुक जाता है. इसके अलावा सिगरेट या शराब पीने के लिए खासा कर चुकाना पड़ता है और यह पैसा सीधे सरकारी खजाने में जाता है.

लिहाजा, यह बुरा ख्याल नहीं है कि देश को बचाने के लिए हम अपनी जान दे दें. घाटे की अर्थव्यवस्था से निराश कोई भी वित्त मंत्री ठीक इसी तरह बात करेगा. हालांकि कायदा यही कहता है कि मंत्रीगण ऐसे मौके पर अपना धैर्य बनाए रखें और अपने मौजूदा वोटों को बचाने के लिए अनाज, बिजली और सुरक्षा का वादा करते रहें भले ही इससे देश का भविष्य अंधकारमय हो जाए.

हमारे मंत्रियों की स्वघोषित गरीबी देखकर क्या हमें नोबेल कमेटी को यह भी सुझाव नहीं देना चाहिए कि वे गरीबी का भी नोबेल पुरस्कार प्रदान करें.

डॉ मनमोहन सिंह कभी इस तरह की बात नहीं कह सकते, लेकिन इसके बावजूद कई बार देखा जा सकता है कि वे खुद को जब्त करने की कोशिश कर रहे हैं. वे सालों से अर्थशास्त्र के सिद्धांतों को राजनीति के तकाजों की भेंट चढ़ाते आ रहे हैं और अब यह दिखने लगा है. जब सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सरकार को निर्देश दिया कि अनाज को खुले में सड़ने देने के बजाय उसे गरीबों में बांट दिया जाए, तो इस पर मनमोहन सिंह का रुख बेहद तीखा था, उन्होंने कहा कि खैरात बांटना सरकार का काम नहीं है. यदि अनाज सड़ता है तो सड़ जाए. गरीबों को भोजन चाहिए तो बाजार उनके लिए खुले हैं. जाहिर तौर पर अर्थशास्त्र का गणित यह है कि चूहे मुटाते रहें. यदि यह बात किसी और ने कही होती तो यकीनन उस पर अदालत की अवमानना करने का मामला दायर हो सकता था.

प्रधानमंत्री राजनेता हैं. वे राजनीति के खेल की बारीकियों को किसी भी स्वयंभू पेशेवर से बेहतर समझते हैं. पुराना अनुभव हमें बताता है कि उनका लोगलुभावनवाद किसी समुदाय के लिए होगा न कि गरीबों के लिए. जाति ही सत्ता की चाबी है. गरीबी की कोई तयशुदा पहचान नहीं होती जबकि जाति और मजहब सियासत के अहम हथियार है. यह अकारण नहीं है कि डॉ सिंह की कैबिनेट अगले साल जातिगत जनगणना करवाना चाहती है.

राजनेता होने के नाते वे जानते हैं कि उनकी सबसे अहम जिम्मेदारी यही है कि वे तब तक सरकार चलाते रहें, जब तक राहुल गांधी खुद यह घोषणा नहीं कर देते कि अब वे राजपाट संभालने के लिए तैयार हैं डॉ सिंह सत्ता के इस वेटिंग रूम में भी अपनी शालीनता बनाए हुए हैं और इसके लिए उनके शांत सेंस ऑफ ह्यूमर को श्रेय देना चाहिए. जैसे कि उन्होंने अपनी मंत्रिमंडल को संयुक्त राष्ट्र की भ्रष्टाचार विरोधी आचार संहिता पढ़ने को कहा है. क्या उनका ये विचार है कि पूरा मंत्रिमंडल वान की मून द्वारा दंड दिए जाने के विचार से कांप उठेगा?

अलबत्ता ये संभव है कि वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा (जिनके अनुसार उनकी निजी संपत्ति महज 26,741 रु. है) जैसे मंत्री संयुक्त राष्ट्र के गरीबी प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकते हैं. हमारे इस उत्तर-गांधीवादी समय में यह वाकई शर्मनाक है कि आनंद शर्मा जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के बैंक खाते में इतने भी पैसे न हों कि वे उससे एक अच्छा सूट खरीद सकें, बशर्ते वे यह सूट बैंक खाते के बजाय अपने घर की आलमारी में रखे पैसे से न खरीद लें.

हमारे बहुत सारे मंत्रियों की गरीबी को देखकर क्या हमें नोबेल कमेटी को यह भी सुझाव नहीं देना चाहिए कि वे गरीबी का भी नोबेल पुरस्कार प्रदान करें? यहां हमें उन लोगों पर ध्यान नहीं देना चाहिए, जिन्हें लगता है कि हमारे राजनेताओं के लिए पाखंड का नोबेल पुरस्कार ज्यादा ठीक रहेगा.


* लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं.

12.09.2010, 12.34 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 दुनिया के हर सत्ता-लोलुप के लिए ज्यादा से ज्यादा ज़हरीले पेय और सिगरेट बनाये जाएँ और उन पर लिखा रहे : "ईमानदार और अहिंसक व्यक्ति के स्वास्थय के लिए हानिकारक ! मनुवादियों, मार्क्सवादियों और माओवादियों को आधे मूल्य पर. मनुष्यों को स्वविवेक की छूट."

दुनिया का बोझ सबसे पहले सत्ता-पिपासु और हिंसक विचारों से हल्का होना चाहिए. लेकिन यह तो एक मज़ाक है. मरेंगे तो वही जो मरते आये हैं भूख, दंगे और सस्ती- ज़हरीली शराब से.
 
   

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