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एक नाकाम पिता की कथा

मुद्दा

 

एक नाकाम पिता की कथा

प्रीतीश नंदी


अपने बच्चों की परवरिश करना एक दिलचस्प अनुभव है. इस रोमांचक सफर में एक के बाद एक बहुतेरी खुशियों और चिंताओं, उम्मीदों और अफसोसों का सामना करने के बाद एक दिन हमें पता चलता है कि हमारे बच्चे अब बड़े हो गए हैं. अब उनके सामने उनका अपना जीवन है. यही वह समय होता है, जब हम खामोशी के साथ यह आकलन करने की कोशिश करते हैं कि हमने अपनी जिम्मेदारियां कितनी अच्छी तरह से निभाईं. क्या हम उन मानदंडों को छू पाए, जो हमारे माता-पिता ने तय किए थे?

मेरा जन्म एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. मेरे पिताजी नागपुर के हिसलॉप कॉलेज में पढ़ाते थे. फिर हम कोलकाता चले गए. मेरे पिताजी की आय बहुत ज्यादा नहीं थी, इसलिए मां उनकी मदद करना चाहती थीं. उन्होंने ला मार्तिनिएर में बांग्ला पढ़ाना शुरू कर दी. वहीं मैंने भी अपनी पढ़ाई की. आज मैं जो कुछ भी हूं, उनकी शिक्षा के कारण ही हूं, लेकिन मैं इसे बहुत बाद में जाकर समझ पाया. इसी दौरान पिताजी हमसे दूर चले गए.

वहीं, जहां सभी पिता एक न एक दिन चले जाते हैं. 32 साल पहले उन्होंने एक अनजान शहर में अस्पताल के बिस्तर पर दम तोड़ दिया. वह एक मामूली-सी सर्जरी थी, लेकिन डॉक्टर की लापरवाही से केस बिगड़ गया. मैं उन्हें अलविदा भी नहीं कह पाया, क्योंकि जब तक मैं अस्पताल पहुंचता, तब तक वे कोमा में जा चुके थे.

मेरी मां कोलकाता को और उस छोटे से किराए के फ्लैट को बहुत चाहती थीं, जहां हम रहते थे. लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें मुंबई आने को मजबूर कर दिया. वे मेरे परिवार का हिस्सा बन गईं. 92 वर्ष की उम्र में जब उन्होंने आखिरी सांस ली, तब मैं उनके पास ही था, लेकिन मैं उन्हें भी अलविदा नहीं कह पाया. क्योंकि उनका मन कई बरस पहले ही वहां जा चुका था, जहां मेरे पिताजी थे. डॉक्टर इस स्थिति को अल्जाइमर कहते हैं. अब मेरे बच्चे बड़े हो चुके हैं. हालांकि मैं कभी भी उन्हें ज्यादा समय नहीं दे पाया, लेकिन मैंने हमेशा यह कोशिश की कि मैं अपने जीवन के अनुभवों का सार उन्हें दे सकूं.

मैंने उन्हें वे छोटी-छोटी चीजें सिखाने की कोशिश की, जो जिंदगी ने मुझे सिखाई थीं : लिखना, सोचना, कुछ रचना, रोज नई चीजों को खोज निकालना, खोज के इस रोमांच का मजा लेना और उन्हें अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लेना. मैंने उन्हें सिखाया कि आदतें नीरस होती हैं.

हम जल्द ही उनसे थक जाते हैं, ऊब जाते हैं. जबकि जीवन एक रोमांचक सफर की तरह है, जहां हमें रोज नए-नए तरह के अनुभव होते हैं. कुछ खूबसूरत. कुछ खतरनाक. कुछ उदास और हताश कर देने वाले. हम इन सभी से कुछ न कुछ सीखते हैं. मेरे बच्चों की जिंदगी की बुनियाद तैयार करने में उनकी मां और मेरी मां का योगदान था. मैंने केवल उसमें थोड़ा सा जादू पैदा किया. कम से कम मुझे तो यही लगता है, दुनिया के हर पिता की तरह.

मैंने कभी भी अपने पितृत्व को एक काम की तरह नहीं लिया. इसी बात पर मेरी अपनी पत्नी से कई बार बहस भी हुई है. आखिर, मेरे बच्चों की नैपीज वही धोती थी. उन्हें तैयार करके वही स्कूल भेजती थी. वही उनका होमवर्क कराती थी. स्कूल के कार्यक्रमों में भी वही जाती थी और पैरेंट-टीचर मीट्स में शिरकत करती थी.

पहले जिन चीजों से दूर रहने की हिदायतें दी जाती थीं, अब उन्हीं को सराहा जाता है. जिन विचारों को हम पहले स्वीकार नहीं करते थे, अब उन्हीं के आधार पर नए समाज का निर्माण हो रहा है.


उसकी शिकायत वाजिब है. मैंने अपने बच्चों के साथ खूब मौज-मस्ती की और मेरी पत्नी का मानना है कि मैंने उन्हें बिगाड़ दिया. यह ठीक नहीं था, लेकिन जीवन इसी तरह चलता रहा. लेकिन अब, इतने सालों बाद, मुझे महसूस होता है कि मैं गलत था.

मैंने अपने बच्चों को जो कुछ सिखाया, उसका नतीजा यह रहा कि वे कमजोर हो गए. वे जिस दुनिया में जी रहे हैं, उसका सामना करने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाए. दुर्भाग्यवश मुझे अपने बच्चों की परवरिश का उससे बेहतर कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझा था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इससे मैं अपने अपराध बोध से बरी हो सकता हूं.

हर बार जब खेल, राजनीति, कारोबार, स्वास्थ्य सेवा, सेना या शिक्षा में किसी नए घोटाले का खुलासा होता है, तब मैं उनकी निराशा को देख सकता हूं. मैंने उन्हें सिखाया था कि वे अपने देश को अपनी मां की तरह प्यार करें, लेकिन आज हमारा यही देश चोरों और उचक्कों के हाथों में चला गया है.

मेरे बच्चे क्रिकेट के दीवाने थे, लेकिन यह खेल अब सट्टेबाजों के इशारों पर नाचता है. जिस शहर को हम प्यार करते हैं, उस पर अब बिल्डरों, अपराधियों और नेताओं का कब्जा है. मेरी तमाम उपलब्धियां और पुरस्कार अब मुझे शर्मिदा कर देते हैं, क्योंकि इनमें से अधिकांश अब बिकाऊ हो चुके हैं.

दुनिया के पैमाने अब बदल चुके हैं. कला, संगीत, खेल हर चीज का आकलन केवल पैसे से ही किया जाने लगा है. मीडिया की भी यही हालत है. जबकि मैंने अपने बच्चों को यह सिखाया था कि वे पैसे के बारे में कभी बात न करें, क्योंकि यह शालीनता नहीं है!

पहले जिन चीजों से दूर रहने की हिदायतें दी जाती थीं, अब उन्हीं को सराहा जाता है. जिन विचारों को हम पहले स्वीकार नहीं करते थे, अब उन्हीं के आधार पर नए समाज का निर्माण हो रहा है. वर्तमान समय का बुनियादी आदर्श केवल एक ही है : जिस चीज से पैसा आए, वह ठीक है. हमारी इस नई दुनिया का एक ही आदर्श व्यक्तित्व है: गोर्डन गेक्को (एक काल्पनिक फिल्मी चरित्र, जिसने वॉल स्ट्रीट श्रृंखला की फिल्मों की अहम भूमिका निभाई है).

किसी व्यक्ति की समाज में क्या हैसियत है, इसका एकमात्र पैमाना यही है कि उसके पास कितनी धन-दौलत है. सफलता का आकलन आय से किया जाने लगा है. भारत दुनिया में किस पायदान पर है, इसका आकलन उसकी जीडीपी दर और उसके स्टॉक मार्केट की स्थिति से किया जाने लगा है.

इस जोड़-गणित में देश के वे 90 फीसदी लोग पीछे छूट जाते हैं, जिन्हें कभी यह नहीं सिखाया गया कि जिस दुनिया में वे जी रहे हैं, उसका सामना कैसे करें. कॉलेज में दाखिला लेने के लिए वे जालसाजी नहीं कर सकते. कॅरियर में तरक्की करने के लिए वे लोगों से धोखाधड़ी नहीं कर सकते. अमीर और रसूखदार बनने के लिए वे सौदे नहीं पटा सकते.

यहां तक कि वे खुद को नैतिकता के नए मापदंडों के अनुसार ढाल भी नहीं सकते, क्योंकि आपके और मेरे जैसे अहमक आदर्शवादी अभिभावकों ने उन्हें नहीं सिखाया कि आज की दुनिया में सफल होने के लिए क्या करना चाहिए. हमने उन्हें बाजार में अपना अस्तित्व बनाए रखने के कोई गुर नहीं सिखाए, जहां हर चीज बिकाऊ है. ऐसे में अगर हमारे बच्चे हमारे खिलाफ उठ खड़े हो जाएं, तो हम उन्हें कैसे दोषी ठहरा सकते हैं?

17.09.2010, 00.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sanjay kumar (sanjaysblc@yahoo.co.in.) raipur

 
 Your idea really liked it.
 
   
 

nirmal gupt (gupt.nirmal@gmail.com.) meerut

 
 प्रीतीश नंदी जी के इस लेख ने मन को गहरे अवसाद से भर दिया. हालात वाकई निराशाजनक हैं. 
   
 

Ramesh chopra (rchopra@kasyap.com) Ratlam M.P.

 
 सार्थक विचार है, आज के परिवेश में. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 दिल की बात ! शुक्रिया, प्रीतीश ! मुझे अपने दोनों बच्चों को उनके पहले दिन से लेकर हाल ही में उनकी शादियाँ हो जाने तक उनकी माँ होने का भी मौका मिला. जिसे टट्टी-पेशाब उठाना कहते हैं, मुझे इसका सौभाग्य भी मिला. मेरे माँ-बाप अनपढ़ मजदूर थे, इसलिए मेरे पास उनके मौन संघर्ष से सबक लेकर अपनी ज़िन्दगी स्वयं बनाने के अलावा कोई और सूरत नहीं थी.

आपकी तरह मैंने भी अपने बच्चों को ईमानदारी और साहस के साथ जीने का ही मूल मंत्र दिया. आज मेरी बेटी तो अकेली दुनिया में घूम सकती है, मगर बेटा उस से 3 साल बड़ा होकर भी मेरा सहारा आज भी खोजता है.

दर-असल मैं आपसे कहना यह चाहता हूँ कि बच्चों की बुनियादी ज़िन्दगी में हम अपने तौर-तरीके या फलसफे बेशक डालते रहें, आगे की ज़िन्दगी उन्हें एक नए मुकाम पर ले जाती है. कुछ चीजें बहुत अजनबी-सी करवटें बदलती हैं और हमारे पास उन्हें चुप देखने के अलावा कोई चारा नहीं होता. इसके लिए पछताने या शर्माने की कोई ज़रुरत नहीं है. गांधी जी के बेटे हरी दास के समूचे जीवन की बर्बादी की कथा यही बताती है कि कुछ बच्चे अपना बिलकुल अलग रास्ता लेने से बाज़ नहीं आते. बहाना भी खोज लेते हैं कि पिता ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया.
ज़माना कैसा भी हो, एक बात सदा से सही बैठती आई है : जब हमारे जूते में बच्चे का पांव पूरा आ जाए तो वह खुद जपनी ज़िन्दगी का मालिक और ज़िम्मेदार है. हम अपने बच्चों के सच्चे और सजग दोस्त बने रह सकें, यह जुनून ता-उम्र बना रहे; कोई हमें पहचाने न पहचाने.
हमारा वर्तमान लम्हा उस भविष्य की फिक्र खुद करेगा, जिसे हम नहीं देख सकते.
 
   
 

ratna rajshri delhi

 
 लेख ने दिल को छू लिया... 
   

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