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राजनीति का घटियापन

मुद्दा

राजनीति का घटियापन

प्रीतीश नंदी

पिछले हमारी जितनी भी समस्याएं हैं, उनमें कोई भी ऐसी नहीं है, जिसका समाधान नहीं किया जा सकता हो. समस्याएं इसलिए इतनी जटिल मालूम होती हैं, क्योंकि वे हमारी राजनीति की पेचीदगियों में उलझकर रह गई हैं. अगर हम अपनी घटिया राजनीति से मुक्त हो जाएं तो हमारी समस्याओं को आसानी से सुलझाया जा सकता है.

अखबारों में भारत की पेचीदगियों के बारे में जो कुछ छपता रहता है, स्थिति इसके ठीक विपरीत है. वास्तव में भारत में शासन-प्रशासन चलाना कठिन नहीं है. हमारे लोग सीधे-सरल हैं. वे राजनेताओं की बातों पर भरोसा करते हैं. उन्हें सुनने को तैयार रहते हैं. आम तौर पर वे तब तक शांत रहते हैं, जब तक पानी गले से ऊपर न चला जाए. लेकिन वे किसकी सुनें? देश पर राज करने वाले तो पैसा कमाने में मुब्तिला हैं. उन्हें उनकी कतई फिक्र नहीं है. वास्तव में हमारी असल समस्या यही है.

कश्मीर समस्या का संबंध केवल आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट (एएफएसपीए) और उमर अब्दुल्ला से ही नहीं है. यह दिल्ली की भी नाकामयाबी है, जो समय पर सही कदम नहीं उठा पाई. अभी तक इस मामले में जो भी फैसले लिए गए हैं, वे बिना सोची-समझी प्रतिक्रियाओं से ज्यादा कुछ नहीं हैं. लेकिन गरीबी, अन्याय, बेरोजगारी और टूटे वादों से निराश लोगों की समस्याओं को सुलझाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए.

इससे भी बदतर स्थिति यह है कि उनके भविष्य के लिए भी कोई भरोसेमंद योजनाएं नहीं हैं. सरकार के पास हजारों बहाने हैं, जिनमें सबसे अहम है आतंकवाद. लेकिन बहाने बनाने से समस्याओं का समाधान नहीं होता. इसके लिए नई पहल करनी पड़ती है. अगर सही कदम उठाए जाएं तो इस समस्या का समाधान करना मुश्किल नहीं है. कश्मीर के लिए सुलझे हुए नजरिए की जरूरत है. संवेदनात्मक रवैया अख्तियार करने की जरूरत है.

ऐसा महसूस होना चाहिए कि कश्मीर एक उभरते हुए देश का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन होता यह है कि आतंकवादियों की पनाहगाह बताकर उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है. कश्मीरी आज भी पथराव के जरिए ही विरोध प्रदर्शित कर रहे हैं. वे बम नहीं बरसा रहे हैं. जिसका मतलब है कि इस समस्या को सुलझाया जा सकता है. इतने लोगों की जान जाने के बावजूद कश्मीर अभी तक एक राजनीतिक समस्या ही है.

नक्सलियों की भी यही स्थिति है. आदिवासी आतंकी नहीं हैं. वे सीधे-सादे लोग हैं, जो इस बात से भयभीत हैं कि सरकार ने अपने व्यावसायिक हितों के लिए उनकी जमीन और उनकी आजीविका के साधनों को उनसे छीन लिया है. उन्होंने कई तरीकों से विरोध जताने का प्रयास किया, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी. किसी ने उनकी परवाह नहीं की. यहां तक कि गरीबों की हिमायती मानी जाने वाली माकपा सरकार ने भी उन पर ध्यान नहीं दिया.

नक्सल समस्या का समाधान करना चाहते हैं तो आदिवासियों की जमीनें और उनकी आजीविका के साधन उन्हें लौटा देने चाहिए. नक्सलवाद भी एक राजनीतिक समस्या है.


वास्तव में जब-जब उन्होंने विरोध किया, उन्हें निर्ममता से कुचल दिया गया. इतना ही नहीं, सभी राजनीतिक पार्टियां उनका शोषण करने का प्रयास करती हैं. ऐसे में अगर वे राह से भटक जाएं तो क्या इसके लिए उन्हें दोषी ठहराया जा सकता है? हां, उनके नेता जरूर गुमराह हैं, लेकिन क्या सरकार का यह सोचना सही है कि वह उन्हें कुचल देगी. कुचल देने से किसी समस्या का समाधान नहीं होता. इससे केवल हालात और बदतर हो जाते हैं. यदि हमारे राजनेता वास्तव में नक्सल समस्या का समाधान करना चाहते हैं तो उन्हें आदिवासियों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए. उनकी जमीनें और उनकी आजीविका के साधन उन्हें लौटा देने चाहिए. नक्सलवाद भी एक राजनीतिक समस्या है.

खाद्य संकट की भी यही कहानी है. हमारी धरती इतना अनाज पैदा करती है कि वह देशभर के लोगों का पेट भर सके, लेकिन वह लोगों के लालच को शांत नहीं कर सकती. हम सभी ने सड़ते अनाज से पटे पड़े गोदामों की शर्मनाक तस्वीरें देखी हैं. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए थे कि वह अनाज गरीबों में बंटवा दे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. क्योंकि कृत्रिम अभाव की स्थिति निर्मित कर मुनाफा कमाया जा सकता है और खाद्य पदार्थो की राजनीति मुनाफे के आधार पर ही चलती है. इसीलिए भारत में गरीब भूखे मर जाते हैं.

इसीलिए हमारे यहां कुपोषित बच्चों की तादाद अफ्रीका के निर्धनतम देशों से भी अधिक है. दुख की बात यह है कि ऐसा तब हो रहा है, जब हमारे गोदाम अनाज की बोरियों से पटे पड़े हैं. नहीं, हमें और गोदामों की जरूरत नहीं है, जैसा कि मंत्रालय का दावा है. भुखमरी और कुपोषण एक राजनीतिक समस्या है. यह अनाज के अभाव से उपजी समस्या नहीं है.

भ्रष्टाचार भी एक राजनीतिक मसला है. भारतीय उतने भ्रष्ट नहीं हैं, जितना हमें लगता है. जब आप किसी निजी कंपनी के सीईओ से मिलने जाते हैं, तो उसके दफ्तर के बाहर बैठा चपरासी आपसे ‘चाय-पानी’ की मांग नहीं करता. लेकिन जरा किसी मंत्री से मिलने की कोशिश करें. मंत्री के दरवाजे पर जितने भी लोग बैठे होते हैं, उन सभी को एंट्री फीस चाहिए. सरकारी दफ्तरों का माहौल ही कुछ ऐसा होता है कि वहां भ्रष्टाचार पनपता है.

इसकी शुरुआत सरकारी नौकरों को दी जाने वाली कम तनख्वाह से हुई थी, लेकिन अब भ्रष्टाचार हमारे तंत्र का जरूरी हिस्सा बन गया है. ऊपर से लेकर नीचे तक सभी (चुलबुल पांडे की तरह) भ्रष्टाचार को अपनी शान समझते हैं. किसी को रिश्वत मांगने में शर्म नहीं आती. लेकिन यदि हम चाहें तो भ्रष्टाचार का खात्मा कर सकते हैं. यह पूरी तरह से एक राजनीतिक समस्या है.

खेल भी इससे अछूते नहीं हैं. हम तब तक खेलों में तरक्की नहीं कर पाएंगे, जब तक हम अपने खेल प्रशासन से राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों को नहीं हटा देते. उन्होंने हमारी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई है और हमारे खिलाड़ियों की जुझारू क्षमता को नुकसान पहुंचाया है. अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों में जाने वाले भारतीय दल में खिलाड़ियों से ज्यादा अधिकारी होते हैं. नतीजा यह है कि आबादी के लिहाज से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश के पास पर्याप्त मात्रा में विश्वस्तरीय खिलाड़ी नहीं हैं. जो कुछ खिलाड़ी उभरते भी हैं, वे कुछ समय बाद पक्षपात व लालफीताशाही से कुंठित होकर दृश्य से बाहर हो जाते हैं. खेलों से राजनीति को निकाल बाहर करें तो हम खेलों में अव्वल मुल्क बन सकते हैं.

हमारी अधिकतर समस्याओं की जड़ में राजनीति है. यदि हम इस बुनियादी समस्या का समाधान कर पाएं तो हम एक बेहतर देश का निर्माण कर सकते हैं. यदि नहीं, तो ये हालात बने रहेंगे. हम खुद से लड़ते रहेंगे और अद्भुत क्षमताओं के बावजूद हम एक राष्ट्र के रूप में अपनी संभावनाओं का पूरा उपयोग नहीं कर पाएंगे.

24.09.2010, 03.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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