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अग्निवेश क्या सफल होंगे?

मुद्दा

अग्निवेश क्या सफल होंगे?

विश्वजीत सेन

इधर अखबारों में खबर आयी है- बिना हारे स्वामी अग्निवेश पुन: माओवादियों और भारत सरकार के बीच शांति स्थापित करने के पहल में जुट गए हैं. यह अच्छी खबर है, खासकर उन लोगों के लिए जो निरर्थक माओवादी हिंसा से तंग आ चुके हैं.

स्वामी अग्निवेश अपने प्रयास में कोबाड घांडी और नारायण सान्याल की सहायता लेंगे. ये दोनों फिलहाल जेल में हैं. लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा 'लेकिन' है, क्या यह प्रयास सफल होगा?

इसके पूर्व भी शांति वार्ता की पहल हुई है लेकिन वे सफल नहीं हुए. माओवादी इन वार्ताओं का इस्तेमाल रणनीति के रूप में करते रहे और ऐन मौके पर वार्ता से मुकर गये. कई बहानों का सहारा लिया गया. लेकिन बहाने तो किसी भी स्थिति में निकाले जा सकते हैं. मुख्य बात है शांति की चाहत! यह चाहत उनमें नहीं है.

उनमें इस चाहत के नहीं होने की वजह क्या है? पहली वजह तो यह है कि उनका 'लोकयुद्ध' अब एक फायदेमंद व्यापार में बदल चुका है. भारत की जनता आम तौर पर शांतिपूर्ण जीवन बिताना चाहती है. हथियार दिखाने पर वह कुछ भी करने को, कोई भी राशि हस्तांतरित करने को तैयार हो जाती है. अत: बन्दुक दिखाकर धन की उगाही एक फायदेमंद व्यापार बन चुकी है. माओवादी आसानी से इस व्यापार को 'अलविदा' कहने को तैयार नहीं होंगे.

उगाही की धनराशि पर माओवादी केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ भी अब कमजोर पड़ती जा रही है. सब कुछ स्थानीय दस्ते के नेतृत्व की ईमानदारी पर निर्भर है. स्थानीय दस्ता नेतृत्व कितना ईमानदार हो सकता है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है.

दूसरा ये कि माओवादियों का विश्वास शास्त्रार्थ पर नहीं 'शस्त्रार्थ' पर है. माओ का कहना था कि ''राजसत्ता का जन्म बंदुक की नली से होता है''. भारत के माओवादी भी यही कहते हैं. दरअसल जो वे कहना चाहते हैं, वह यह है-राजसिक जीवनशैली का जन्म बन्दुक की नली से होता है.

अग्निवेश इतना तो करें कि माओवादी दल के युवा नेताओं को अपना जरिया बनाएं. अप्रासंगिक हो चुके नेताओं को अपना जरिया बनाने से क्या फायदा?


देश के अलग-अलग हिस्सों में कई माओवादी नेता पकड़ाए, जिनके पास आलीशान कोठियां हैं, जिनके बच्चे महंगे विद्यालयों में पढ़ते हैं. लेकिन उनके उपर आय से अधिक संपत्ति जुटाने के जुर्म में मुकदमा दायर नहीं होता. क्योंकि सभ्य भाषा में जिसे 'आय' करना कहा जाता है, वैसा उन्होंने कुछ किया ही नहीं. वे केवल 'व्यय' करते रहे. उनके लिए आय गरीब लोग, छोटे व्यवसायी और ठेकेदार करते रहे.

'शांति वार्ता' के प्रति माओवादी इमानदारी नहीं बरतेंगे. इसकी दूसरी वजह है- उनके दिमाग पर छाया कोहरा. यह कोहरा घना है और आसानी से छंटने वाला नहीं है.

फ्रांसीसी चित्रकार पिकासो के पास एक बार एक विद्यार्थी आया. वह चित्रकार बनना चाहता था. पिकासो ने उससे कहा ''सामने एक घोड़ा घास चर रहा है.”

विद्यार्थी अचम्भित हो गया. कहने लगा-“लेकिन आप तो घनत्ववादी-क्यूबिस्ट-चित्रकला के सर्जक हैं. आप के हर कैनवास पर टेंढ़ी-मेढ़ी आकृतियां होती हैं. घोड़ा को अगर घोड़ा जैसा ही बना दिया तब चित्रकला की आधुनिक शैली का क्या होगा?''

पिकासो ने कहा-'' पहले एक अच्छा ड्राफ्ट्समैन बनो. आधुनिक शैली-वैली बाद में देखी जाएगी.'' पिकासो ने ऐसा इसलिए कहा कि रेखांकन में चरमोत्कर्ष अर्जित करने के बाद ही रेखाओं को तोड़ने की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है.

माओवादियों के दिमाग में जो कोहरा छाया है, उसकी वजह है. उन्होंने कभी मार्क्स को ही ठीक से नहीं पढ़ा. माओ को अपनी विचारधारा विकसित करने के लिए मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन से होकर आना पड़ा था. समाज-विकास के विज्ञान के नियमों को आत्मसात करना पड़ा था. उनकी कृतियों में इनके अनगिनत उदाहरण मिलते हैं. भारत के माओवादियों ने एक ही निवाले में माओ चिन्तन का संपूर्ण सार निगल जाना चाहा. नतीजे के रूप में उनका पेट झरने लगा. अब कुछ भी उन्हें नहीं पच रहा है.

लालगढ़, जंगलमहल में आदिवासियों के खून से रंगे हाथो को लहराकर वे कहते हैं- '' देखो, हम आदिवासियों के कितने बड़े शुभचिंतक हैं.''

जात-पात की कीचड़ में फंसे अपने पैरों की ओर इशारा कर वे कहते हैं- ''देखो, मैं जाति प्रथा का कितना बड़ा विरोधी हूं. मेरे कमांडर अरविंद यादव ने अभय यादव के बदले लूकस टेटे को मार गिराया.''

शांतिवार्ता के लिए स्वामी अग्निवेश प्रयासरत हैं. सुर्खियों में आने के लिए उनकी बेचैनी समझ में आने लायक है. दो थके, बूढ़े घोड़ों को लेकर वह एक दुर्गम यात्रा पर निकलने को इच्छुक हैं-कोबाड घांडी और नारायण सान्याल.

राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक एशिया के दुर्गम भूखण्डों से गुजरने पर हम पाते हैं कि उन्होंने भार ढ़ोने वाले जानवरों का चयन काफी अक्लमंदी से किया था. अग्निवेश इतना तो करें कि माओवादी दल के युवा नेताओं को अपना जरिया बनाएं. अप्रासंगिक हो चुके नेताओं को अपना जरिया बनाने से क्या फायदा? राहुल जी ने तिब्बत से दुर्लभ बौद्ध कृतियों को भारत लाने के उद्देश्य से एक यात्रा की थी. स्वामी अग्निवेश भी वैसा ही कुछ करना चाहते हैं. इसलिए 'यात्रा' के हर पहलु पर वे सावधानी बरतें, ऐसा हमारा सुझाव है.

24.09.2010, 10.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Dr. Amar Jyoti aligarh

 
 माओवादियों का घोषित लक्ष्य है व्यवस्था परिवर्तन। और व्यवस्था परिवर्तन मात्र शास्त्रार्थ से न कहीं हुआ है, न होगा। शांतिवार्ता के लिये शासकवर्गों की गम्भीरता आज़ाद की हत्या से स्वयंसिद्ध है। निहत्थे बन्दी टेटे की हत्या एक बर्बर और भयानक भूल थी। बेहतर होगा कि ऐसी भूलें दोहराई न जायें अन्यथा जनता माफ़ तो किसी को भी नहीं करती। 
   
 

bhoopen raipur

 
 किसी विचारधारा का विरोध ऐसे भ्रांतिपूर्ण तर्कों से देना कही से उचित नहीं है. माओवादी नैतिक रूप से इतने गलत नहीं हैं, जितना उन्हें आप साबित करने की कोशिश कर रहे है. उनके द्वारा उठाए गई मांगे तो वास्तविक हैं किन्तु सिर्फ साधन गलत हैं. आप किसी भी वर्तमान मुख्यधारा के राजनेता से माओवादी नेताओ की तुलना कीजिये, नैतिक रूप से माओवादी ज्यादा सही होंगे. कैसे, ये आप मेरे से ज्यादा अच्छे से जानते होंगे. 
   
 

amit kumar patna

 
 विश्व्जीत सेन ने बिल्कुल सही कहा है.माओवादिओं को थोडा सीख्नना चाहिये मार्क्स से.ठीक से पढें और सीपीम का बेजा विरोध बन्द करें. मैं विश्वजीत सेन को बधाई देता हुं.इतने अच्छे आलेख के लिये.ये मेधा पाटेकर,अरुन्धति राय,स्वामी अग्निवेश सबके निशाने पर कम्युनिस्ट पार्टी है. इन्हें इस बात का तनिक भी भान नहीं कि अगर सीपीएम कमजोर हुई तो सेकुलरिज्म,लोकतन्त्र और साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलन भी कमजोर होगा. जबसे सीपीएम ने न्यूक्लिअर डील का जबसे मुखालफत किया है तबसे सीपीएम पर हमला तेज़ हो गया है. आखिर ऐसा क्यों? बंगाल में अभी तमाम तरह की प्रतिक्रियावादी ताकतें सक्रिय हैं. ममता से लेकर माफ़िया और माओवादिओं के निशाने पर सीपीएम है. दरअसल ये लोग येन केन प्रकारेण शासक वर्ग को ही सपोर्ट कर रहे हैं भले ही बातों में ये क्रांतिकारी दिखाई पडें.आजकल सीपीएम को टार्गेट करना नवउदारवादी दौर का हिंदुस्तान में खास लक्षण है. विश्वजीत सेन ने इन बुद्धिजीवियों के असली चरित्र के प्रति हमारी आंखें खोली हैं.उन्हें बधाई.आप ऐसे आलेख और लिखें.  
   

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