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अयोध्या पर फैसले की घड़ी

बाईलाइन

 

अयोध्या पर फैसले की घड़ी

एम जे अकबर


मुसीबत की घड़ी में कोई भी फैसला करना आसान नहीं होता. सुप्रीम कोर्ट ने छह दशकों की पीड़ाओं और कष्टों को कैलेंडर की एक तारीख पर समेट दिया है. यदि माह के अंत से पहले फैसला नहीं सुनाया जाता है तो वह निष्प्रभावी ही रह जाएगा, क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच के एक जज रिटायर हो रहे हैं.

अब भारत के पास इतनी शक्ति नहीं रह गई है कि सामाजिक, राजनीतिक और वैधानिक कड़वाहट के छह और दशकों की शुरुआत करे. यदि समय ही हर समस्या का समाधान होता तो कोई दिक्कत ही नहीं होती.

भारत में कई समस्याएं उभरती हैं और समय के ग्लेशियर में विलीन हो जाती हैं. लेकिन धार्मिक आस्था के साथ कुछ इस तरह की भावनाएं जुड़ी होती हैं कि उनके आगे समय भी हार मान लेता है. जो लोग धार्मिक आस्था की गहराई का अनुभव नहीं करते, वे मानते हैं कि यह मसला अब महत्वहीन हो चुका है.

राहुल गांधी ने शायद इसी भावना के वशीभूत होकर कहा था कि समय आ गया है कि हम देश के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण मसलों पर अपना ध्यान केंद्रित करें. लेकिन यहां इतिहास के पन्ने उलट लेना ठीक रहेगा.

बाबरी-अयोध्या विवाद नया नहीं है, लेकिन लंबे समय तक इस विवाद के स्वर मुखर नहीं थे. यह किसी ज्वालामुखी की तरह अचानक फूटा और इसके लावा ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को अपनी चपेट में ले लिया. शायद यह आशंका लौहपुरुष सरदार पटेल को बहुत पहले से थी.

भारत की गहरी समझ रखने वाले सरदार पटेल ने जवाहरलाल नेहरू को सुझाव दिया था कि वे सोमनाथ मंदिर और बाबरी मस्जिद के मसलों का त्वरित निराकरण खोजने का प्रयास करें, जो हिंदुओं के अवचेतन में गहराई से पैठे हुए हैं.

नेहरू इसे लेकर सहज नहीं थे, लेकिन उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में कोई हस्तक्षेप नहीं किया. वैसे देखा जाए तो सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करना मुश्किल नहीं था, क्योंकि किसी ने उस स्थान पर मस्जिद का निर्माण नहीं किया था. पटेल ने चेताया था कि यदि राम जन्मभूमि विवाद का समाधान नहीं किया गया तो पांच दशक बाद यह फिर हमें सताएगा. और ऐसा ही हुआ.

अयोध्या का मामला सोमनाथ से इसलिए अलग था, क्योंकि वहां बाबर के जमाने में बनाई गई एक मस्जिद थी. ठीक 20 साल पहले 25 सितंबर को जब लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक अपनी रथयात्रा प्रारंभ की तब उन्होंने इन दोनों को आपस में जोड़ दिया. दो दशक गुजरने के बावजूद अभी तक इस मसले का कोई समाधान नहीं खोजा जा सका है.

क्या सभी पक्ष अदालत के अहातों के बाहर ही किसी समझौते पर राजी हो जाएंगे? यदि इसका जवाब है नहीं तो इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच को इस मामले में अपना फैसला सुनाना चाहिए.


शायद हम इस बात से शांत हैं कि 1992 के बाद से ही अयोध्या मसले पर किसी तरह की हिंसा नहीं हुई है. ऐसा सोचना गलत है. भारतीय, चाहे वे किसी भी धर्म या पंथ के हों, स्वभावत: हिंसा से घृणा करते हैं, लेकिन कभी-कभी वे खासे आक्रामक भी हो जाते हैं. भले ही ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों की स्मृति में 92 की यादें धुंधला गई हों, लेकिन यह आम लोगों के जेहन से कभी मिट नहीं सकती.

यदि कोई फैसला नहीं आता है तो इसके नतीजे भयावह हो सकते हैं. कांग्रेस प्रवक्ता के बयान से जाहिर है कि कांग्रेस हमेशा की तरह अनिश्चय की स्थिति में है. यह तब तक तो ठीक था, जब अदालत अपना समय ले रही थी. लेकिन अब समय खत्म हो गया है.

आखिर माननीय हाईकोर्ट अपना फैसला सुनाने जा रही है. अगर सरकार यह सोचती है कि वह इस फैसले को किसी तरह के कानूनी पचड़े में उलझा देगी तो इससे मूर्खतापूर्ण कोई बात नहीं हो सकती. यदि अदालत फैसला नहीं सुनाती है तब भी वह लोगों तक पहुंच जाएगा- शायद मीडिया के जरिए. लोकतंत्र की एक सच्चाई यह भी है कि दबाकर रखी गईं सूचनाएं पानी की तरह रिसकर बह जाती हैं.

मामले के सभी पक्ष अब यह महसूस कर रहे हैं कि सरकार इस देरी का उपयोग एक रणनीति की तरह कर रही है. ऐसी स्थिति का एकमात्र हितकारी नतीजा यही निकल सकता है कि सभी पक्ष आपसी कड़वाहट को भुलाकर एक हो जाएं और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल लें. हंसें नहीं, भारत की राजनीति में इससे भी अजीबोगरीब चीजें हो चुकी हैं और इतिहास उनका गवाह रहा है.

अदालत को यह उम्मीद करने की आजादी है कि छह दशकों में जो नहीं हुआ था, वह छह दिनों में हो जाएगा यानी एक मैत्रीपूर्ण समझौता. लेकिन इतना तो तय है कि मंगलवार का दिन कसौटी पर होगा. सवाल केवल एक है : क्या सभी पक्ष अदालत के अहातों के बाहर ही किसी समझौते पर राजी हो जाएंगे? यदि इसका जवाब है नहीं तो इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच को इस मामले में अपना फैसला सुनाना चाहिए. मुसीबत की घड़ी से बाहर निकलने का हाल-फिलहाल तो एकमात्र यही रास्ता है.

26.09.2010, 00.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

simpi bilaspur

 
 अयोध्या में मंदिर बनायेंगे मस्जिद बनायेंगे-पता नहीं कैसे. इस तरह की ड्राइंग रूम लक्ज़री की बातें होती हैं. मंदिर मस्जिद तो मुद्दा ही नहीं होना चाहिए. उस देश में जहाँ 70 करोड़ लोग एक समय भूखे सोते हों... अभी तो भारत में करोड़ों लोगों का जीवन स्तर कुत्ते से भी ऊपर नहीं उठ पाया है. लाखों लोग कोई तो रोटी डाल दे, यह आस लगाये भीख मांगते हैं. पीने का पानी हमारे यहाँ नहीं है..रोटी-पानी है नहीं..मंदिर मस्जिद सुझ रहा है.

कम से कम जो झेल रहे है, उन्हें तो नहीं सुझता होगा यह सब..उन्हें रोटी दिखती होगी..पक्का है...अगर विश्वास नहीं हो..तो एक काम करें, जितने भी लोग इस तरह की बाते करते हैं, आक्रोशित होते हैं, भड़कते भड़काते है...उन्हें बिना पर्स के, पैसे के मात्र सप्ताह भर रखा जाये. उन्हें शर्तिया सिर्फ रोटी नज़र आने लगेगी और दो ही धर्म नज़र आयेंगे, दो ही वर्ग होंगे. एक जिनके पेट भरे हैं और दूसरे जो भूखे हैं. मत चाटो ये अफीम और मंदिर मस्जिद की कवरेज मीडिया ही बंद करे. रिपोर्टिंग करे न, भूख से मरते लोगो की.
 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com)

 
 क्या संगठित धार्मिक भावनाओं से बेहतर और समझ-बूझ वाली भावनाएं कभी इस देश के काम नहीं आएँगी ? प्रेम सदा परेशान ही रहेगा? सृष्टि से मुफ्त में मिलने वाली अक्ल से कभी दोस्ती भी होगी?

यदि नहीं, तो भूल जाइए कि कोई भी फैसला टिकाऊ होगा. अपनी-अपनी मूर्खताओं को लेकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाले लोग इस बात के लिए हमेशा आज़ाद हैं कि वे अपने गिरोह्बाज़ घमंड का झंडा उठा कर नए-नए बहाने खोजें और नफरत की आग लगाते रहें.

यह धंधा सिर्फ उस रोज़ मंदा पड़ेगा, जिस रोज़ नयी मसल के असल नौजवान समझ ही नहीं पायेंगे कि ये पुराने मुर्दे क्या कह रहे हैं और क्यों ? यानी, जिस रोज़ संगठित धर्मों की एक नहीं चलेगी और उनकी तमाम घिनौनी खाज मिट जायेगी. वरना "कुछ बात है कि 'हस्ती' मिटती नहीं हमारी !"
 
   

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