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भूल जाने की कला

बहस

भूल जाने की कला

प्रीतीश नंदी

पिछले हफ्ते ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि हमारी याददाश्त कितनी सीमित है. वक्त के साथ सारे घाव भर जाते हैं, सब बदल जाता है. यहां तक कि सबसे बड़ी त्रासदियां भी नई घटनाओं और कभी-कभी नई त्रासदियों के कारण स्मृति से हट जाती हैं. ये इतना ज्यादा है कि जिस बात के प्रति हम पिछले कुछ सालों, महीनों या हफ्तों से आसक्त थे अचानक हमारी चेतना से गायब हो जाती है.

ये कुछ ऐसा है कि जैसे पूरे देश ने एक साथ ही डिलीट बटन दबा दिया हो. कभी कभी ये दुखद है, हालांकि ज्यादातर बार ये बहुत अच्छा भी है. ये दिखाता है कि भारत ने योगा को दिल से अपना लिया है और वह अपने क्रोध, नाराज़गी और विद्वेष को भुला कर आगे बढ़ सकता है. शायद इसीलिए हमारा राष्ट्र इतना महान है.

राष्ट्रमंडल खेलों को ही देखें. ब्रिटिशों के प्रति हमारी घृणा जिसने हमारे स्वतंत्रता संग्राम को हवा दी बहुत पहले से ही विलुप्त हो चुकी है. आज हम खेलों का आनंद मित्रों की तरह उठाते हैं. अगर हम अच्छा करते हैं और कई मेडल जीतने में कामयाब रहते हैं, तो हमें लगेगा कि ये इतिहास को बिल्कुल उपयुक्त जवाब है. हम ब्लैक होल त्रासदी और जलियांवाला कांड को भूल चुके हैं. सच कहूं, मुझे भी बाकी याद नहीं आ रहे हैं.

लेकिन मैं इससे ज्यादा वो ट्रेनें, डाकखाने, वो गॉथिक चर्च, वो आर्ट डेको वास्तुकला, वो स्कूल और कॉलेज याद रखना चाहूंगा जो ब्रिटिश अपने पीछे छोड़ गए हैं. और उनके सबसे बड़े योगदान अंग्रेजी भाषा जिसने हमें पूरी दुनिया, विज्ञान और तकनीक, वैश्विक अर्थव्यवस्था से उतने जल्दी रूबरू होने में कितनी मदद की है, को कैसे नज़रअंदाज किया जा सकता है. हमें कभी भी चीनीयों की तरह बाकी विश्व से जुड़ने में तकलीफ नहीं उठानी पड़ी. अंग्रेजी ने इसके लिए हमें सबसे महत्वपूर्ण औजार उपलब्ध कराएं हैं, भले ही श्रीमान मुलायम सिंह इस बात से इत्तेफाक न रखते हों.

लेकिन इसमें साठ साल लगे. अब अयोध्या के फैसले की ओर देखते हैं. इस फैसले की घोषणा होने से पहले ही, हर किसी को पता था कि नया भारत अयोध्या से परे काफी आगे बढ़ चुका है. सारा सुरक्षातंत्र ये सुनिश्चित करने के लिए लगाया गया था कि कोई राजनीतिक दल इस फैसले का फायदा उठा कर अराजकता ना फैला पाए.

इन दो दशकों में हिंदुओं और मुसलमानों दोनों समुदायों ने उस विवादग्रस्त मुद्दे को दरकिनार कर दिया है, जिसने हिंसा के ऐसे भंवर को जन्म दिया, जिसमें लाखों पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को अपनी जान गंवानी पड़ी. एक ऐसा भंवर, जिससे उनका कुछ लेना-देना नहीं था. यह एक रथयात्रा के साथ राजनीतिक तमाशे के रूप में शुरु हुआ. धीरे से इसने राष्ट्रीय गौरव के एक मुद्दे का मुखौटा धारण कर लिया और अचानक ही एक भयंकर मानवीय त्रासदी में बदल गया. भाजपा के इसे जीवित रखने की सारी कवायदों के बावजूद, ये बहस अब मर चुकी है. आज हर कोई, विशेषकर युवा वर्ग, शांति और प्रगति के लिए तरसता है.

लेकिन क्यों हम दशकों और शताब्दियों के बारे में बात करें ? मैं शर्त लगाता हूं कि जैसे ही खेल खत्म हो जाएंगे, निकट इतिहास के सबसे भ्रष्ट और शर्मनाक कार्यक्रम से जुड़े उन्माद को भी तुरंत ही भुला दिया जाएगा.

क्या अब आप चकित हैं कि क्यों महात्मा गांधी के देश में “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” से ज्यादा “मीन कम्फ” बिकती है.


अगर कलमाड़ी साहसपूर्वक अगले कुछ दिन निकाल देते हैं और बच जाते हैं, तो ऐसा विश्वास करने का कोई भी वजह नहीं कि उन्हें कभी लतियाया जाएगा. उद्घाटन समारोह में जितनी लानतें उन्हें लोगों से मिली थीं, उसे ही उनकी बड़ी चोरी के लिए पर्याप्त सज़ा मान लिया जाएगा.

जब रामालिंगा राजू इतनी आसानी से बच कर निकल सकता है, तो क्यों हमें कलमाड़ी की असावधानियों को याद रखने के लिए इतना कठिन प्रयास करना चाहिए? यहां तक कि 26/11 के बावजूद भी आर.आर.पाटिल महाराष्ट्र के गृहमंत्री के रूप में वापस आ गए हैं. सिर्फ विलासराव को मुख्यमंत्री पद पर वापस लाना बाकी है, लेकिन वो बिल्कुल भी जल्दी में नहीं है क्योंकि उनके पास केंद्र में अपना समय व्यतीत करने के लिए एक आरामदायक जगह है.

हमारी सामूहिक याददाश्त लगातार कम होती जा रही है, इस बात का एक अच्छा उदाहरण ये हो सकता है कि पाकिस्तानी दल का भारतीय दल के बाद सबसे ज्यादा जयध्वनि से स्वागत हुआ. ये पूरे विश्व के लिए बहुत ही चौंकाने वाला हो सकता है कि एक तरफ तो हम पाकिस्तान को भारत में आतंकवाद फैलाने और कश्मीर को अस्थिर करने के लिए हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बेहद कड़वाहट से कोसते हैं, और दूसरी तरफ उनके खिलाड़ियों, अभिनेताओं, गायकों और उनके पेजथ्री लोगों का इतने गर्मजोशी से स्वागत करते हैं.

हाल ही में उनके दो पेजथ्री लोगों को बिग बॉस में प्रवेश मिला है. इनमें एक विपरीतलिंगी कपड़े पहनने वाला व्यक्ति है, जो पाकिस्तानी टीवी पर एक चैट शो चलाता है.

दूसरी प्रतिभागी एक ऐसी चूमने और ढिंढोरा पीटने वाली कलाकार है, जिसने अपने पूर्व प्रेमी क्रिकेटर मोहम्मद आसिफ को यह कह कर शर्मिंदा कर दिया है कि वह उनके मैच फिक्सिंग के गोरखधंधे के बारे में तब से जानती थीं, जब वे उनके साथ बिस्तर में लिपटती-चिपटती थीं.

पाकिस्तानी पॉप गायक अली जाफर को तेरे बिन लादेन में न सिर्फ एक हिट फिल्म मिली बल्कि उन्हें यशराज द्वारा और फिल्मों के लिए साइन भी किया गया. वो भी उस शहर में, जहां की सड़कों पर मनसे और शिवसेना राज करते हैं. इसी शहर में अदनान सामी एक फ्लैट में अपनी दो भारी भरकम पत्नियों के साथ हंसी खुशी से रहते हैं.

लेकिन सबसे ज्यादा मुखर उदाहरण बॉक्स ऑफिस का है. इस पर किस्मत ने 30 साल तक राज किया. फिर 1975 में शोले आई. उसके 20 साल के बाद ही दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे उसको टक्कर दे पाई. उसके पाँच साल बाद गदर ने उससे टक्कर ली. सिंग इज़ किंग अपनी हिस्सेदारी का दावा करने वाली ही थी कि दो महीने बाद गज़नी ने आकर उसे अपने बसेरे से उखाड़ फेंका. उसके एक साल बाद थ्री इडियट आई और उसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. इसके 8 महीने बाद ही दबंग ने उसको टक्कर दे दी. और अब, तीन हफ्तों में रजनीकांत सब अपने साथ ले गया. ये साबित करता है कि सफलता भी कितनी अल्पकालिक है.

क्या अब आप चकित हैं कि क्यों महात्मा गांधी के देश में “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” से ज्यादा “मीन कम्फ” बिकती है. या क्यों एक देश जो कभी अज़हरुद्दीन से नफरत करता था, उसे फिर से वोट देकर अपना सांसद बना है? क्या हुआ उन चार पहलवानों और दो एथलीटों का जो राष्ट्रमंडल खेलों के लिए हुए डोप टेस्ट में पिछले माह असफल रहे थे? क्या वो हमारे दल में वापिस नहीं आ चुके हैं ?

07.10.2010, 00.22 (GMT+05:30) पर प्रकाशित