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विकल्पों के शेख

बाईलाइन

 

विकल्पों के शेख

एम जे अकबर


अगर पति-पत्नी के जोड़े में से कोई एक पड़ोसी को देख आंख दबाने लगे तो समझ लीजिए कि उनके संबंधों में खटास आ गई है. राहुल गांधी और उमर अब्दुल्ला का सियासी गठबंधन सुर्खियां बटोरने वाला क्षण था. ऐसा क्षण, जिसने नई सदी की उम्मीदों का मेल एक ऐसी पीढ़ी की संभावनाओं के साथ किया था, जो न केवल नेहरू-शेख घराने की जड़ताओं से मुक्त थी, बल्कि फारूक अब्दुल्ला और राजीव गांधी की साझेदारी की अति उत्साही गलतियों से भी उनका दूर का नाता न था.

यह नए भारत का गठजोड़ था. वर्ष 2008 में संसद में भारत-अमेरिका परमाणु सौदे पर हुई बहस के दौरान उमर अब्दुल्ला ने जब अपने लंबे एकालाप में यह बताया कि वे क्यों सबसे पहले एक भारतीय हैं और उनकी पहचान के बाकी तमाम दायरे इसके बाद शुरू होते हैं, तब लगा जैसे यह गठजोड़ अपना स्वरूप हासिल करने लगा है.

इस भाषण की वैचारिक बुनियाद में दिल्ली का भरोसा था और जब वर्ष 2009 में उमर को श्रीनगर भेजा गया तो एकबारगी लगा जैसे राहुल किसी मुख्यमंत्री को नहीं, बल्कि किसी आभासी राष्ट्रगान को कश्मीर रवाना कर रहे हैं.

विडंबनाओं का इतिहास जब लिखा जाएगा तो वह एक भारी-भरकम किताब की शक्ल अख्तियार कर लेगा. 2009 की खुशनुमा गर्मियों में राहुल और उमर दोनों को ही वह बात नहीं पता थी, जो कोई धुंधली याददाश्त वाला शख्स भी उन्हें बता देता- नेक मंशा की डगर पर न केवल खूब सारे कंकड़-पत्थर बिखरे होते हैं, बल्कि उससे ऐसी अनगिनत पगडंडियां भी जुड़ी होती हैं, जिनका दूसरा सिरा इस्लामाबाद में खुलता है.

1989-1993 के इंतिफादा फलस्तीनी विद्रोह के बाद से दुनिया बहुत बदल चुकी है और बंदूक की जगह अब गुलेल ने ले ली है, लेकिन मकसद अब भी वही है, जो पहले था. दुनिया के लिए संदेश यह है कि श्रीनगर में सरकार हो सकती है, लेकिन कश्मीर पर राज नहीं किया जा सकता.

अब्दुल्ला परिवार हमेशा अपना दरवाजा दिल्ली के लिए खुला रखना और अपने कान इस्लामाबाद पर लगाए रखना पसंद करता है. आखिर उन्हें भी तो गुजारा करना है.


राहुल-उमर साझेदारी के कृत्रिम आभामंडल से जो सिंड्रोम उपजा था, वह इसके बाद और ज़्यादा गफलत का शिकार हुआ. ये दोनों नौजवान राजनीति में थे, लेकिन ये उन अनैतिक राजनेताओं जैसे नहीं थे, जिनका एक हाथ तो गुल्लक में रहता है जबकि दूसरा हाथ समझौतों की गर्द में लिथड़ा होता है.

हर पीढ़ी का पसंदीदा हथियार होती है वह झाडू, जिससे अतीत को बुहार दिया जाता है. लेकिन अतीत महज गलतियों का ढेर ही नहीं होता. यह एक ऐसी जगह भी होती है, जहां कई सबक दुबके होते हैं.

बहरहाल, दिल्ली इन दोनों की ‘गैर राजनीतिक’ छवि के झांसे में आ गई, जो पीआर मशीन की उपज थी. वह यकीन नहीं कर पाई कि इतनी ऊंचाइयां छूने के बाद उमर कश्मीरी राष्ट्रवाद की उपकथा बनकर रह जाएंगे.

उमर अब्दुल्ला सियासत के पचड़ों से केवल तभी तक ‘परे’ थे, जब तक यह उन पर फब रहा था. एक राजनेता वह सब करता है, जो सत्ता में बने रहने के लिए जरूरी है. मुख्यमंत्री बनने के लिए उमर को कांग्रेस की जरूरत थी. उनके पास न तो अपना बहुमत था और न ही असेंबली में उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी थी. वे केवल इसीलिए कामयाब हुए, क्योंकि कांग्रेस नई पीढ़ी की कामयाबी की दास्तां लिखना चाहती थी, जिसे जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय फलक दिया जा सके. लेकिन जब यह छवि बहुप्रचारित हो गई तो दिल्ली में एक खामोश लेकिन स्पष्ट उलटी गिनती शुरू हो गई. खतरे के अंदेशे ने उमर को सियासत सिखा दी.

जब एक राजनेता अपने हाथ से सत्ता फिसलते देखता है तो वह वापसी की स्थितियां निर्मित करने में जुट जाता है. अपने मुल्क के प्रति वफादारी की भावना के चलते ही उमर अब्दुल्ला अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में शरीक हुए थे और इसी वफादारी से उन्होंने राहुल गांधी के संरक्षण में 18 महीनों का कार्यकाल मजे में बिताया. लेकिन समय हमेशा एक सा नहीं रहता.

भारत की इस नौजवान उम्मीद को अचानक यह याद आया कि कश्मीर भारत में ‘सम्मिलित’ हुआ था, उसका भारत में ‘विलय’ नहीं हुआ था. लेकिन इसके साथ उन्होंने यह नहीं जोड़ा कि यह महाराजा हरि सिंह के कारण ही मुमकिन हुआ था,

जो दूसरी रियासतों के विपरीत दस्तावेज पर दस्तखत करने से पहले धारा 370 पर अड़े रहे थे. इसका मतलब यह है कि उमर अब्दुल्ला भारत के नागरिक नहीं, बल्कि भारत के सहायक हैं. एक सहायक की वफादारी पर ज़्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता. अब्दुल्ला परिवार हमेशा अपना दरवाजा दिल्ली के लिए खुला रखना और अपने कान इस्लामाबाद पर लगाए रखना पसंद करता है. आखिर उन्हें भी तो गुजारा करना है.

विकल्पों के शेख के रूप में उमर अब्दुल्ला की खोज की कहानी दिलचस्प है. लेकिन कांग्रेस में उनके संरक्षक की पुन: खोज की कहानी इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा होगी. बेतुकी बातें कारगर साबित नहीं होतीं. उमर अब्दुल्ला शोध पत्र नहीं पढ़ रहे थे, वे पूरे होशोहवास में एक सियासी बयान दे रहे थे.

अभी तक तो कांग्रेस ने उमर के प्रति झुकाव ही जताया है, जबकि राहुल गांधी अपनी सुपरिचित चुप्पी अख्तियार किए हुए हैं. एक सीमा के बाद चुप्पी को मौन सहमति समझ लिया जाता है. यह इकलौती मुसीबत नहीं है. फारूक अब्दुल्ला कैबिनेट में हैं. क्या वे भी अपने बेटे से इत्तेफाक रखते हैं? यदि हां, तो इसके नतीजे क्या होंगे?

हो सकता है, उमर ने कश्मीर में थोड़ी-सी अस्थायी जगह हासिल कर ली हो, लेकिन उन्होंने देश में इससे कहीं ज़्यादा जगह गंवा दी है.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

10.10.2010, 02.12 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) http://asheshaakash.blogspot.com

 
 "उतर रहा है रुख से नकाब आहिस्ता-आहिस्ता..."
और: "ये कैसी मोहब्बत कहाँ के फ़साने?
ये पीने-पिलाने के सब हैं बहाने."
और ये भी :
"बात साकी की न टाली जायेगी;
करके तौबा तोड़ डाली जायेगी.
आते-आते आएगा उनको ख़याल;
जाते-जाते बेखयाली जायेगी."
 
   

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