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बंदूक की नली और राजसत्ता

बात पते की

 

बंदूक की नली और राजसत्ता

विश्वजीत सेन


चीन के अहिंसक नेता लिउ श्याओबो को शांति के लिए पुरस्कृत कर नोबेल कमिटी ने एक बहुत पुराना ऋण उतारा है जो विश्व जनमत के कंधे को बोझिल बना रहा था. साथ ही साथ चीन की प्रतिक्रिया भी एक पुरानी सच्चाई को पुनर्स्थापित किया है कि तानाशाहों के दिमाग नहीं बदलते.

भूतपूर्व सोवियत संघ के नेता गोर्वाचेव की चीन यात्रा के मौके पर तियेन-आन-मिन स्क्वायर पर छात्रों ने अपनी सरकार से नाराजगी जताने के उद्देश्य से विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था जिसे निर्ममता के साथ कुचल दिया गया. वे अपराधी नहीं थे बल्कि अपने दिल में उम्मीद की ज्योति जगाए नवयुवक थे, जो व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे थे. व्यवस्था में निश्चित ही खामियाँ थीं, जिनका सुधार आवश्यक था.

जैसे यह सच्चाई है, वैसे यह भी सच्चाई है कि महज एक प्रदर्शन से व्यवस्था नहीं सुधर जाती. परन्तु नवयुवकों से वार्त्ता की जा सकती थी. चीनी शासकों ने दूसरा विकल्प चुना. इतने वीभत्स तरीके से उनका दमन किया गया कि आज भी समृद्ध, औद्योगिक चीन के जिस्म पर जहाँ-तहाँ उन निरपराधों के खून के धब्बे दिखाई पड़ते हैं. उन धब्बों को धो डालना आसान नहीं है.

उपरोक्त समस्या अकेले चीन में ही नहीं उत्पन्न हुई. भूतपूर्व सोवियत संघ ने हंगरी और चेकोस्लोवाकिया में अवांछित हस्तक्षेप किया जिसका खामियाजा उसे भरना पड़ा. भूख, गुलामी और परतंत्रता से मुक्ति को समर्पित मार्क्सवादी दर्शन को जिन लोगों ने प्रयोग में लाया, वे कुछ आवश्यक कारकों को देखी-अनदेखी कर गए, शोषण मुक्त व्यवस्था के निर्माण में जिनकी अपरिहार्यता से इन्कार नहीं किया जा सकता. विश्व समाजवादी व्यवस्था के निर्माण में जिन असंख्य लोगों ने कंधा भिड़ाया, वे बेइमान नहीं थे. उसी तरह से तियेन-आन-मिन स्क्वायर में प्रदर्शन कर रहे नवयुवकों के इरादे भी नेक थे. इसे तब भी समझने की जरूरत थी. और आज भी है.

यह समझ इसलिए भी अधिक जरूरी जान पड़ती है कि चीन में समस्याओं का भरमार है. सिंगकियांग के मुसलमान अल्पसंख्यक बन्दूक की नोक के आगे खामोश रहने को मजबूर हैं. तिब्बत में जब-तब विद्रोह धधक उठता है.

मूल चीनी भूखंड में गरीबों, विस्थापितों, बेरोजगारों का असन्तोष उबल रहा है. क्या यह सब साम्राज्यवादी षड़यंत्र है? लेकिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी तो अब आधिकारिक तौर पर यह मान चुकी है कि साम्राज्यवाद है ही नहीं! दिल्ली में हाल के दिनों विश्व की कम्युनिस्ट पार्टियों का जो सम्मेलन हुआ, उसमें चीन के प्रतिनिधि ने इसी आशय का वक्तव्य दिया. तब फिर ?

अपराधी कौन है? जो अहिंसक तरीके से विरोध जताता है, वह? या फिर वह, जो ‘‘कम्युनिस्ट” बनने का स्वांग रचता है


चीन की इस ‘सैद्धान्तिक’स्थापना के पीछे भी वजहें हैं. अब चीन अफ्रीकी देशों में जमीन खरीद रहा है. किसलिए? या तो खनन करने के लिए या अपनी आबादी को बसाने के लिए. ऐसी घटनाओं से ‘ब्रिटिश इस्ट इण्डिया कम्पनी’ की बू आती है. यह बेवजह नहीं कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी साम्राज्यवाद के अस्तित्व को ही नकार रही है.

चीन की स्थिति को देखते हुए लगता है कि अब एक चक्र पूरा हो रहा है. इस चक्र की शुरूआत ‘‘महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति” से हुई थी. चीन के सर्वमान्य कम्युनिस्ट नेताओं को, लेखकों को, बुद्धिजीविओं को, अध्यापकों को, समाज शास्त्रिओं को उस ‘क्रांति’ के तहत दर किनार कर दिया गया. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अन्दरूनी लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया. चीनी मजदूर आन्दोलन के पुरोधा और चीन के राष्ट्रपति लिउ-शाओ-ची तथा उनकी पत्नी को पहले कैद किया गया और फिर उनकी हत्या कर दी गई. ‘‘लम्बी छलांग’’ के नाम पर अर्थतंत्र को तहस-नहस कर दिया गया. यह सब कुछ हो रहा था ‘‘माओ विचारधारा’’ को स्थापित करने के नाम पर. लेकिन उद्देश्य था इस लुभावने नारे की आड़ में जनता के संगठनों को नष्ट करना, जनता के चिन्तकों को पंगु बना डालना, ताकि समाजवाद से ही छुट्टी पा ली जाए. सो, पा ली गई.

माओ-त्से-तुंग ने कहा था ‘‘राजसत्ता का जन्म बन्दूक की नली से होता है”. किस परिप्रेक्ष्य में माओ ने यह बात कही थी, वह निश्चित ही विचारणीय विषय है. लेकिन सर्वोपरि सच्चाई यही है कि जनता अपनी जरूरतों के अनुसार राजसत्ता को जन्म देती है. केवल बन्दूक की नली न राजसत्ता को जन्म दे सकती है, न उसे टिकाये रख सकती है. अगर ऐसा होता तो हर तानाशाह अपने इर्द-गिर्द केवल बन्दूक की नलियाँ इकट्ठी कर सत्ता में टिका रह जाता.

चीन की सरकार ने लिउ श्याओबो के नोबेल पुरस्कार मिलने पर जो प्रतिक्रिया जाहिर की है, वह हास्यास्पद है. ‘‘एक अपराधी को सम्मानित किया गया”.

एक सवाल, जो बार-बार इतिहास मानव समाज से पूछता रहा है, वह फिर सुनाई दे रहा है. अपराधी कौन है? जो अहिंसक तरीके से विरोध जताता है, वह? या फिर वह, जो ‘‘कम्युनिस्ट” बनने का स्वांग रचता है और जनता के विरोध को बन्दूक की नोक पर दबाए रखता है?

‘‘बन्दूक की नली” के साथ एक दिलचस्प बात और है. वह जब जिसके हाथ में होती है, तब उस का हुक्म बजाती है. लिउ श्याओबो अहिंसक आन्दोलनकारी हैं. उनकी आवाज को अगर चीनी शासकों ने तरजीह नहीं दी, तब जनता बन्दूक भी उठा सकती है, जैसा कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में उसने कभी उठाई थी.

11.10.2010, 00.51 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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Oshiya http://snowaborno.blogspot.com

 
 आज सारी दुनिया सत्ता के हिंसक गिरोहों से तंग आ चुकी है. स्त्रियों को तो आज तक इनसे सिर्फ आतंक ही मिला है. हमारी संतानें इनकी बेरहम नीतियों और सत्ता की हवस की भेंट चढ़ती आई हैं. आज मनुवाद, मार्क्सवाद और माओवाद का एक ही अर्थ है : हिंसक सत्तावाद ! इनके चेहरे और शब्द मुखौटे हैं जो अब उतर रहे हैं. लेकिन इनका मुकाबला तभी हो सकता है, जब लोकतंत्र लगातार न्यायप्रिय होता चला जाए. 
   

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