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कश्मीर वार्ताकार और छत्तीसगढ़

बहस

 

कश्मीर वार्ताकार और छत्तीसगढ़

दिवाकर मुक्तिबोध


अलगाववाद की आग में महीनों से झुलस रहे जम्मू-कश्मीर की एक खबर सुकून देने वाली है. केन्द्र सरकार ने राज्य में शांति बहाल करने के प्रयासों के तहत अलगाववादियों सहित सभी पक्षों से बातचीत करने के लिए वार्ताकारों के नाम घोषित कर दिए. ये हैं वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर, सूचना आयुक्त एमएम अंसारी तथा शिक्षाविद प्रोफेसर राधा कुमार.

माओवादी बातचीत


वार्ताकारों का यह समूह मुख्य राजनीतिक दलों के नेताओं, अलगाववादियों तथा राज्य की जनता से बातचीत करेगा. इस बातचीत के बाद संभव है जम्मू-कश्मीर समस्या का कोई समाधान निकल आए. इसलिए यह पहल निश्चय ही उत्साहवर्धक है.

इस खबर को पढ़ने के बाद अनायास यह ख्याल आता है कि क्या देश में नक्सली समस्या से निपटने इसी तरह की पहल केन्द्र एवं राज्य सरकारों को नहीं करनी चाहिए? जिस तरह जम्मू-कश्मीर के लिए वार्ताकारों के नाम घोषित हुए हैं, क्या नक्सल सन्दर्भ में भी कुछ नाम तय नहीं किये जा सकते?

जम्मू-कश्मीर मसले पर सितम्बर में केन्द्र सरकार की सुरक्षा मामलों की केबिनेट समिति ने विचार किया था तथा आठ सूत्रीय फार्मूले में एक सूत्र वार्ताकारों की नियुक्ति का भी था. यानी केन्द्र ने वार्ताकार नियुक्त करके अपने निर्णय पर अमल किया. क्या केन्द्र सरकार की सुरक्षा मामलों की यही समिति नक्सल समस्या के निदान के लिए वार्ता का फार्मूला तय नहीं कर सकती? खासकर ऐसी स्थिति में जब खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस समस्या को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं. यद्यपि केन्द्र सरकार ने इस समस्या पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा पुलिस प्रमुखों के साथ संयुक्त रूप से तथा अलग-अलग बातचीत की है किंतु सामूहिक विचार-विमर्श के केन्द्र में नक्सली हिंसा से निपटने 'युद्ध नीति' पर चर्चा होती रही है यानी नक्सली उन्मूलन के लिए आपरेशन किस तरह संचालित किए जाएं.

इन चर्चाओं में शायद ही कभी सोचा गया होगा कि बातचीत से समाधान का हल निकालने की कोशिश की जाए और इसके लिए वार्ताकारों की ऐसी टीम बनायी जाए जो नक्सली नेताओं को चर्चा के लिए राजी करने के प्रयत्न करे. जम्मू-कश्मीर की समस्या यकीनन गंभीर है और वहां की सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियां भी छत्तीसगढ़ सहित नक्सल प्रभावित राज्यों की तुलना में अलग है. वहां उपद्रवकारी मैदान में हैं जबकि नक्सली जंगलों में छिपे हुए हैं. किंतु नक्सल समस्या तो सीधे-सीधे लोकतंत्र के लिए खतरा है. जिस तरह जम्मू-कश्मीर के लिए राजनीतिक पैकेज की जरूरत है, वैसा ही पैकेज नक्सल प्रभावित राज्यों के लिए भी आवश्यक है. यानी भटके हुए युवाओं को राह पर लाने एवं उनमें लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास पैदा करने के लिए राजनीतिक पहल की जरूरत है.

देश के गृहमंत्री पी.चिदम्बरम यद्यपि नक्सलियों से वार्ता के लिए आगे आने की अपील करते रहे हैं किंतु उसमें कितना बनावटीपन है, इसे मौजूदा स्थिति से जाना जा सकता है. चिदम्बरम ने इन कोशिशों के तहत प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश को आगे किया था किंतु हैदराबाद के जंगल में पुलिस मुठभेड़ में नक्सली नेता आज़ाद के मारे जाने की घटना के बाद स्वामी अग्निवेश की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है. उन्हें सरकारी एजेंट करार दिया गया तथा मानवाधिकारवादियों ने उनसे दूरी बना ली. चिदम्बरम की वजह से स्वामी का ऐसा नुकसान हुआ जिससे उबरने की वे कोशिश कर रहे हैं.

19 सितम्बर को जिन पुलिस जवानों का नक्सलियों ने अपहरण किया था, उन्हें छुड़ाने में मीडियाकर्मियों ने ही प्रमुख भूमिका निभायी.


आज़ाद की कथित हत्या से जो डोर टूटी वह अभी जुड़ नहीं पाई है और न ही केन्द्र सरकार का ऐसा कोई इरादा दिखाई पड़ रहा है. आज़ाद के मारे जाने के बाद वह एकदम खामोश है. नक्सलियों को शस्त्र त्यागने, हिंसा बंद करने एवं वार्ता की टेबिल पर आने की अपील करने वाले चिदंबरम की लंबी खामोशी रहस्यमय है. आज़ाद की मौत की घटना की न्यायिक जांच की मांग वे खारिज कर चुके हैं और ऐसा लगता है कि सरकार का विश्वास वार्ता के बजाए बन्दूक पर आकर टिक गया है. किंतु यह तय है नक्सल समस्या का समाधान खालिस बन्दूक की गोली से नहीं हो सकता. हिंसा को खत्म करने प्रतिहिंसा कोई उपाय नहीं है.

नक्सली इस बात पर अड़े हैं कि आज़ाद मामले की न्यायिक जांच करायी जाए तथा नक्सल प्रभावित राज्यों में तैनात अर्द्धसैनिक बलों को वापस बैरकों में भेजा जाए. आपरेशन ग्रीन हंट बंद करने की उनकी मांग काफी पुरानी है. वे युद्धविराम भी 6 महीनों के लिए चाहते हैं. चूंकि केन्द्र सरकार इनमें से कोई भी मांग मानने तैयार नहीं है इसलिए वार्ता की संभावनाएं धूमिल पड़ गयी हैं. हालांकि स्वामी अग्निवेश अभी भी यह मानते हैं कि संवाद की डोर पूर्णत: टूटी नहीं है. स्वामी के अनुसार वे आज़ाद मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जा रहे हैं क्योंकि इस मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी से मुलाकात के बावजूद कुछ नहीं हो सका है. उनके अनुसार अब सुप्रीम कोर्ट पर ही भरोसा है.

बहरहाल वार्ता के दरवाजे बंद जरूर दिखाई पड़ रहे हैं किंतु झिर्रियों से संभावनाओं की किरणें भी छन-छन कर भीतर आती रही हैं. बस कपाट खोलने की जरूरत है ताकि प्रकाश फैल सके. चूंकि नक्सलियों का प्रभाव क्षेत्र मुख्यत: छत्तीसगढ है अत: रमन सरकार चाहे तो अपनी ओर से विशेष प्रयास कर सकती है. वह स्वयं वार्ताकारों का समूह गठित कर सकती है जिसमें विभिन्न वर्गों के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ-साथ मीडिया के लोग हों.

उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि 19 सितम्बर को जिन पुलिस जवानों का नक्सलियों ने अपहरण किया था, उन्हें छुड़ाने में मीडियाकर्मियों ने ही प्रमुख भूमिका निभायी. ऐसी भूमिका अपहरण के पूर्व मामले में भी मीडिया ने निभाई है. वैसे भी नक्सलियों का विश्वास सरकार पर नहीं, मीडिया पर है लिहाजा यदि कोशिश की जाए तो मीडिया सम्मिलित वार्ताकार उन्हें बातचीत के लिए राजी कर सकते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार ललित सुरजन अपने विश्लेषणों में पहले ही कह चुके हैं कि समाज के प्रतिष्ठित कुछ लोगों को सामने आकर वातावरण बनाना चाहिए. उन्होंने राज्य सरकार से ऐसी कोई उम्मीद नहीं की थी. लेकिन केन्द्र की तरह छत्तीसगढ़ सरकार ऐसी कोई पहल करती है तो इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है बशर्ते वार्ताकारों का अपना एजेंडा हो तथा वह सरकार के दिशा-निर्देशों पर काम न करें. ऐसे किसी समूह का काम सिर्फ इतना ही होगा कि वह नक्सली नेताओं को राज्य सरकार के साथ बातचीत के लिए राजी करे. शर्तों की बात बाद में आती है.

यदि राज्य की भाजपा सरकार इस एजेंडे पर काम करे तो संभव है नक्सल समस्या का हल निकल आए. यदि ऐसा हुआ तो न केवल छत्तीसगढ़ के लिए बल्कि देश के लिए भी यह राहत की बात होगी. आंध्रप्रदेश में ऐसी पहल पहले हो चुकी है हालांकि वार्ता असफल रही. लेकिन यह कोई जरूरी नहीं है कि हर बार वार्ताएं असफल ही हों. इसलिए उम्मीद का दामन छोड़ना नहीं चाहिए.

15.10.2010, 11.01 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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