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ओबामा और भारत

बाईलाइन

 

ओबामा और भारत

प्रीतीश नंदी


बराक ओबामा पहले ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने अपने कार्यकाल के पहले दौर में ही भारत की यात्रा की. लेकिन भारत की धरती पर ओबामा द्वारा कदम रखने से पहले ही हम शेखी बघारने लगे कि अमरीका अब भारत का जरूरतमंद बन चुका है और आज भारत को अमरीका की जितनी जरूरत है, उससे ज्यादा अमरीका को भारत की जरूरत है.

हमारे मीडिया ने यह भी घोषित कर दिया कि ओबामा इसलिए आ रहे हैं, क्योंकि हम आने वाले कल की अर्थव्यवस्था हैं, जबकि अमरीका और उसकी आर्थिक हैसियत अब बीते जमाने की बात हो गई है. हम स्वयं की चीन से तुलना करने लगे और ये दलीलें देने लगे कि ओबामा का भारत आना इस बात का सबूत है कि वैश्विक शक्ति संतुलन अब पश्चिम से एशिया की ओर खिसक रहा है. ऐसा नहीं है कि ये बातें पूरी तरह गलत हैं. एक हद तक यह सच है. फिर भी इस बारे में ढिंढोरा पीटने का यह उचित समय नहीं है.

यह सच है कि एशिया अब आर्थिक पावरहाउस बन चुका है और इसमें भारत की केंद्रीय भूमिका है. ऐसे में भारत और अमरीका के रिश्तों का मजबूत होना मुक्त विश्व के लिए बहुत अच्छा संकेत हो सकता है. जहां तक चीन का सवाल है तो इसमें कोई शक नहीं कि वह हमसे बड़ी और हमसे ताकतवर अर्थव्यवस्था है. साथ ही वह हमसे कहीं ज्यादा चालाक भी है और आर्थिक रूप से उसकी मोर्चेबंदी हमसे कहीं ज्यादा तगड़ी है.

मुझे नहीं लगता कि चीनी यह पसंद करते हैं कि उन्हें भारतीयों के समकक्ष रखा जाए. वे अमरीका के समकक्ष होना चाहते हैं. बेशक ये दोनों ही देश अपने उत्पादों की खपत के लिए भारत को एक बड़े और संभावनाशील बाजार के रूप में देखते हैं. इसका कारण केवल हमारा विशाल मध्यवर्ग ही नहीं, बल्कि हमारे बाजारों में पूंजी का अतिरिक्त प्रवाह भी है. उन्हें लगता है कि भारत इसलिए एक महत्वपूर्ण बाजार है, क्योंकि यहां की 90 फीसदी धन-दौलत मात्र 10 फीसदी लोगों के हाथ में है. इस तरह के बाजारों में बड़ी आसानी से और बहुत जल्दी सौदे हो जाते हैं और हम बहुत अच्छे से जानते हैं क्यों.

ओबामा के मुंबई पहुंचने से भी पहले हमारे आडंबरपूर्ण स्थानीय राजनेताओं (जिनमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भी शामिल हैं, जिनसे हाल ही में कारगिल लड़ाई के शहीदों की विधवाओं की जमीन चुराने के अपराध में इस्तीफा ले लिया गया है) ने अमरीका द्वारा उन्हें अपमानित किए जाने पर आक्रोश व्यक्त करना प्रारंभ कर दिया था.

हमें इस बात पर एतराज है कि ओबामा ने पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र क्यों नहीं घोषित किया. दुनिया का कोई भी राष्ट्राध्यक्ष ऐसा नहीं करता है


कौन सा अपमान? अमरीका के वाणिज्यिक दूतावास द्वारा आयोजित एक मिलन समारोह में उन्हें ओबामा से भेंट करने के लिए निमंत्रित किया गया था और साथ ही उनसे यह अनुरोध भी किया गया था कि वे अपने साथ पैन कार्ड जैसे दस्तावेज लेकर आएं, जो उनकी पहचान प्रमाणित करते हों. यह एक बहुत साधारण प्रक्रिया थी, जिसका पालन हमें हवाई अड्डों या हर ऐसे स्थान पर करना पड़ता है, जो सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण और संवेदनशील हों. लेकिन हमारे राजनेताओं और नौकरशाहों ने इसे अपना घोर अपमान समझा और वहां जाने से इनकार कर दिया.

शायद भारत अकेला ऐसा देश होगा, जहां एयरपोर्ट सिक्योरिटी पर हमारे ‘वीआईपी’ लोगों को किसी तरह की जांच-पड़ताल का सामना नहीं करना पड़ता, क्योंकि उनका अहंकार इतना कमजोर है कि वह कभी भी चकनाचूर हो सकता है. इतना ही नहीं, चेक-इन काउंटर के ठीक बाहर ‘वीआईपी’ लोगों की एक लंबी फेहरिस्त भी लगी होती है, जिसमें यह बताया जाता है कि ये फलां-फलां लोग हर तरह की सुरक्षागत जांच-पड़ताल से मुक्त हैं.

हमारे ‘वीआईपी’ लोगों को लगता है कि ये विशेषाधिकार उनकी हैसियत का प्रतीक हैं, लेकिन हम जैसे लोगों के लिए यह शर्म का विषय है. ‘वीआईपी’ की फेहरिस्त में रॉबर्ट वाड्रा का नाम भी शामिल है, जो किसी भी आधिकारिक ओहदे पर नहीं हैं. लेकिन इसके बावजूद वे सिक्योरिटी प्रोटोकॉल का बड़ी आसानी से उल्लंघन कर सकते हैं, जबकि उनके स्थान पर कोई और ऐसा करने की जुर्रत भी नहीं कर सकता. शुक्र है कि अमरीका में ऐसी कोई स्थिति नहीं है. उनके नेताओं को ऐसा कोई विशेषाधिकार नहीं प्राप्त है. सुरक्षा के विवरणों की मांग करना अमेरिकी अधिकारियों के लिए एक आम और व्यावहारिक प्रक्रिया थी.

लेकिन हमारे नेताओं ने इस पर इतना हंगामा खड़ा कर दिया कि दूतावास को इसके लिए माफी मांगने को मजबूर होना पड़ा. किस बात की माफी? क्या इसलिए कि वे अपने कार्यक्रम में देश के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति की सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहते थे? गनीमत है कि विदेश मंत्रालय ने चतुराई का परिचय देते हुए यह स्पष्ट किया कि यह भारत को अपमानित करने के लिए नहीं था और दूतावास केवल अपने सुरक्षा नियमों का ही पालन कर रहा था. दूतावास प्रमुख ने व्यक्तिगत रूप से हमारे राजनेताओं से भेंट की और उनसे विनम्रतापूर्वक उस गलती की माफी मांगी, जो वास्तव में गलती थी ही नहीं. इस अवसर पर खीसे निपोरते हुए हमारे राजनेताओं का चेहरा देखने लायक था.

अब हमें इस बात पर एतराज है कि ओबामा ने पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र क्यों नहीं घोषित किया. दुनिया का कोई भी राष्ट्राध्यक्ष ऐसा नहीं करता है कि किसी देश की यात्रा करे और वहां पहुंचकर दूसरे मुल्क पर अंगुलियां उठाने लगे. इसके विपरीत ओबामा ने भारत यात्रा के दौरान कुछ भी गलत नहीं किया.

वे सबसे पहले दिल्ली नहीं गए, जैसा कि बाकी सभी राजनेता करते हैं. वे मुंबई आए और होटल ताज में रुककर उन्होंने आतंकवाद के प्रति अपने विरोध का प्रदर्शन किया. वे 26/11 हमले के शिकार लोगों के परिजनों से मिले और स्पष्ट शब्दों में मुंबई के लोगों के साहस और धर्य की सराहना की. लेकिन हमारे लिए यह काफी नहीं था. हमारा मीडिया कहता रहा कि ओबामा को इससे भी ज्यादा कुछ और करना चाहिए था.

लेकिन ओबामा कोई न्यायाधीश नहीं हैं. 26/11 का मुकदमा मुंबई की अदालत में चल रहा है. ओबामा कानूनी प्रक्रिया में क्यों दखल देना चाहेंगे? हम ओबामा से यह उम्मीद क्यों करते हैं कि वे हमारी जमीन पर खड़े होकर पाकिस्तान को गरियाएं? यदि 26/11 हमलों में पाकिस्तान का हाथ है तो उसे सबक सिखाना हमारा जिम्मा है, ओबामा का नहीं.

उन्होंने तो हमारे और आतंकवाद के विरुद्ध हमारी लड़ाई के प्रति खुलेआम सहानुभूति व्यक्त कर अपना काम कर दिया. मध्यावधि चुनावों में करारी हार के बावजूद वे हमारे निमंत्रण का मान रखते हुए यहां आए. उन्होंने उनसे पहले के अमेरिकी राष्ट्रपतियों जैसा रवैया नहीं दिखाया और भारत और पाकिस्तान को एक ही पांत में खड़ा करने की भूल भी नहीं की. वे यहां एक मेहमान, एक पर्यटक, एक दोस्त और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले एक व्यक्ति की तरह आए थे. ओबामा की भारत यात्रा ने भारत और अमरीका के रिश्तों को और मजबूत किया है.

11.11.2010, 01.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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