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बिहार के सबक में भारत

देशराग

 

बिहार के सबक में भारत

कनक तिवारी


बिहार भारत के सबसे बड़े जनादेश का इलाका बन गया है. इस प्रदेश की कई खासियतें हैं. बीसवीं सदी में अपने नैसर्गिक भोलेपन, गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, पढ़ाकू वृत्ति और कभी-कभी हिंसा के सामाजिक लक्षणों के चलते औसत बिहारी मसखरेपन और बुद्धूपन तक का वैसा प्रतीक बनता रहा है, जिसका लगातार प्रदर्शन लालू यादव जैसे लोग करते रहे हैं. यह धरातल पर का बिहार है. उसका उत्कर्ष तो कौटिल्य के अर्थशास्त्र में हुआ या नालंदा विश्वविद्यालय में. बिहार का रिश्ता जन्मना या कर्मणा भगवान बुद्ध और महावीर तथा गुरु गोविंदसिंह से रहा है.

नीतीश कुमार


बिहार के देहातों में पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने की जितनी ललक दिखाई देती है, उसका मुकाबला भारत में कोई प्रदेश नहीं कर सकता. बिहार अब भी फैशन की दुनिया से कोसों दूर है. दही चिवड़ा या सत्तू जैसे भोज्य पदार्थ अब भी उसकी पांच सितारा संस्कृति हैं. यह प्रदेश धीरे-धीरे राजनीतिक कूड़ाघर में तब्दील किया गया. लूटमार, अपहरण, नक्सलवाद, पुलिसिया आतंक और राजनीतिक लूटखसोट का अड्डा भी बिहार को बनाया गया.

यह दूसरा चेहरा है कि केन्द्र सरकार की उच्चतर सेवाओं में बिहार के जो नौजवान आगे आते हैं, वे सबके आगे होते हैं. देश के संविधान पुरुष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का बिहार संविधान की हेठियों का भी क्षेत्र बनाया गया. लगता है बिहार लोकतंत्र, संविधान और राजकाज की व्यवस्था की पटरी पर लौटने का ऐलान कर चुका है.

बिहार विधानसभा के चुनावों के परिणाम सतह के नीचे अपने कारणों को ढूंढ रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का व्यक्तित्व, उनका अपेक्षाकृत बेहतर शासन, गुंडागर्दी का नाश, स्त्रियों को बराबर का जनाधिकार, राजपथ के बदले बेहतर जनपथों का निर्माण, नट की तरह करतब दिखाते राजनीतिक समन्वय के नए प्रयोग और भविष्य को स्वप्नशील व्यक्ति की तरह देखने का मुख्यमंत्री का जज़्बा उनकी बिहार विजय के बुनियादी कारणों में गिने जाएंगे.

मीडिया चाहे नीतीश कुमार की कितनी ही तारीफ क्यों न करे, इक्कीसवीं सदी में यह भारत के मतदाताओं की पहली बड़ी जीत है. राजनीति एक ठर्र व्यवसाय है. इसमें पहले तपे तपाए नेता जनता के चौपाल में अपना समर्थन ढूंढ़ते थे. फिर नेताओं के वंशजों और नव धनाड्य वर्ग के प्रतिनिधियों ने अपने लिए भूमिकाएं तलाशनी शुरू कीं. धीरे-धीरे चोर उचक्के, डाकू, कातिल और विदेशों तक से गर्हित संबंध रखने वाले तत्व राजनीति पर हावी होते गए. शुरू से आखीर तक मतदाता को कूपमंडूक, जाहिल और अंध समर्थक समझा गया. नेताओं के भाषण, मीडिया के द्वारा की गई व्याख्या और शोधकर्ताओं की समझ भी मतदाताओं के तेवर को पहचानने में असमर्थ होती रही.

2010 का बिहारी मतदाता वह नहीं है, जो पिछले 60 साल पहले से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक रहा होगा. बड़ी संख्या में नौजवान, शिक्षित, बेरोजगार और उपेक्षित विद्रोही हुए हैं. महिलाएं पर्दा, पुरुष-आतंक और अशिक्षा से मुक्त होती गई हैं. उनमें जीवन और राजनीति को देखने का खुलापन और नयापन आता गया है. नेताओं के उबाऊ, ठंडे, रटे रटाए, स्वयंभू भाषण उस नौजवान पीढ़ी को नहीं कुरेद सकते, जो खुद उनसे ज्यादा पढ़ी लिखी है.

लोकतंत्र का अर्थ राजनेताओं के उपदेशों में नहीं, जनता के शिक्षण में होता है. भारतीय लोकतंत्र में नेताओं की मुर्गी की एक टांग अब तक अविचलित रही है. वह जनता को मुर्ग-मुसल्लम समझकर खाती भी रही है. धीरे-धीरे जनादेश के तेवर बदलते गए हैं.

पिछली दो बार लोकसभा के चुनाव में नेताओं और मीडिया ने एक साथ धोखा खाया है. इस बार भी वैसा ही हुआ. जो हारे वे अनावश्यक रूप से आशावान थे. जो जीते वे भी उतने आशावान नहीं थे. बिहार के मतदाताओं की व्यापक समझ के पीछे कौन सी मनोवैज्ञानिक स्थितियां रही होंगी, इसका आकलन जरूरी है.

इसमें संदेह नहीं कि महिलाओं और विशेषकर ग्रामीण महिलाओं की भूमिका अंकगणित के लिहाज से निर्णायक रही. लेकिन दरअसल यह बिहार का शिक्षित वर्ग है, जिसने अपने माता-पिता और दादा-दादी की पीढ़ी समेत खुद को इस बात के लिए तैयार किया कि राज्यतंत्र में पार्टियों के नेताओं के चेहरों को प्राथमिकता देने के बदले एक ऐसा तंत्र विकसित करने की जरूरत है, जिससे राज्य जनता के प्रति अपने कर्तव्यों को सही ढंग से पूरा करने की ओर आगे बढ़े.

राजनीति में कोई स्थायी चौधरी नहीं होता. किसी का सूपड़ा सदैव के लिए साफ नहीं होता. नीतीश के साथ दिक्कत यही है कि उनके पास राष्ट्रीय राजनीति की कोई बड़ी पार्टी नहीं है, जिसके वे सदस्य हों. यह एक तरह से देश में प्रादेशिक पार्टियों के उद्भव और विकास का संदेश भी है.
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