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चेक-3-ठगी का सामाजिक अभियान

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चेक-3-ठगी का सामाजिक अभियान

अजय प्रकाश

 

बुनियादी सुविधाओं से महरूम जनता की समस्याओं को किस तरह बेचा जा रहा है, इसे देखने और झेलने का मौका मुझे हाल ही में मिला. यह मौका इंफोसिस के पूर्व सह अध्यक्ष और अब यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया के मुखिया नंदन नीलेकणी की पत्नी रोहिणी नीलेकणी के एनजीओ आरघ्यम की दिल्ली स्थित उपशाखा इंडिया वाटर पोर्टल की ओर से पंजाब के भटिण्डा में दो दिवसीय कार्यशाला में मिला.

इंडिया वाटर पोर्टल मुख्य रूप से पानी पर सूचनाओं के प्रसारण का काम करती है. साथ ही वह पानी पर काम करने वाले एनजीओ की दानदाता एजेंसी भी है. पोर्टल की हिंदी वेबसाइट की संचालक मीनाक्षी अरोड़ा और सिराज केसर की तरफ से 26 मार्च को पत्रकारों के लिए एक लिखित निमंत्रण आया. निमंत्रण पंजाब के मालवा क्षेत्र से संबंधित था, जिसमें बताया गया था कि पानी में यूरेनियम की अधिकता से सेरीब्रल पैल्सी रोग हो रहा है. अंत में बताया गया था कि 29 मार्च को दिल्ली से एक गाड़ी जायेगी जिसमें इच्छुक पत्रकार सवार हो सकते हैं.

29 तारीख को मैं भी उस गाड़ी में सवार हो गया. गाड़ी में किसी और पत्रकार को न देख मुझे आश्चर्य हुआ. पूछने पर मेजबानों ने बाजारू पत्रकारिता का हवाला देकर मुझे सामाजिक पत्रकारिता का वीर पुरुष करार दिया. अफसोस भी जताया कि हमने तो मेल कई हजार लोगों को भेजे थे, उनमें आपके अलावा सिर्फ एक और पत्रकार मणिमाला साथ जा रही हैं. मणिमाला से परिचय के बाद जब हमलोग चाय के लिए रूके तो उन्होंने एनजीओ के अनुभवों को साझा किया कि, एक नहीं सभी अपने बजट का 85 फीसदी हिस्सा बड़े पदाधिकारियों के खर्चे और तामझाम में लगा देते हैं.

भटिंडा में पहले दिन का सत्र शुरु होने के बाद भी दूसरे किसी भागीदार पत्रकार को न देख हमें संदेह हुआ. पूछने पर कि हमलोग इलाके में कब चलेंगे, सिराज केसर ने बताया कि पहली पारी की बैठक खत्म हो जाये तो हम सभी क्षेत्र में चलेंगे. एक घंटा फूलों के लेन-देन और स्वागत में लगाने के बाद गुरुनानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर से आये भौतिकी के प्रोफेसर डॉक्टर सुरिंदर सिंह ने यूरेनियम पर 20 साल पहले का एक अध्ययन पेश किया. डेढ़ घंटे के भाषण में वे एक दफा भी नहीं बता पाये कि यूरेनियम की वजह से कोई रोग हो रहा है.

इस पर सवाल उठा तो दिल्ली और भटिंडा के आयोजक हमें यह समझानें में लग गये कि यह जबाव भौतिकी के प्रोफेसर का बनता ही नहीं है. तो जवाब कौन देगा, इस पर आयोजकों ने चुप्पी साध ली.

हमारा सवाल था कि तथ्यों की सही जानकारी के बगैर गुमराही का यह काम ‘खेती विरासत’ के इशारे पर ‘आरघ्यम’ और ‘पोर्टल’ ने संयुक्त रूप से कैसे कर लिया?


हमने प्रोफेसर सुरिंदर सिंह से पूछना उचित समझा कि बीस साल पहले किये गये अध्ययन को आज पेश कर आप क्या बताना चाहते हैं. जिन प्रोफेसर सुरिंदर सिंह ने यूरेनियम में पानी पर डेढ़ का लंबा भाषण दिया था, उन बेचारे ने डेढ़ मिनट में जो कुछ बताया वह इस प्रकार से है- मालवा क्षेत्र के कुछ इलाकों में पानी में यूरेनियम ज्यादा है जिसका 90 प्रतिशत स्रोत प्राकृतिक है. रही बात बीस साल पहले के अध्ययन को पेश करने की तो यहां इन्होंने बुलाया था, इसलिए हमने पेश किया. इसकी वजह से कोई बीमारी होती है या किन रोगों की संभावना होती है, ऐसा कोई अध्ययन मैंने क्या, किसी ने नहीं किया है.

दिल्ली से गये दानदाताओं ने बताया कि इस फर्जी जानकारी के सूत्रधार तो स्थानीय संयोजक एनजीओ ‘खेती विरासत’ के सुरिंदर सिंह और उनके सहयोगी शिक्षक चंद्रप्रकाश हैं. हिंदी वाटर पोर्टल के सिराज के मुताबिक, "खेती विरासत ने ही पानी में अधिक यूरेनियम होने की वजह से क्षेत्र में सेरीब्रल पैल्सी रोग हो रहा है, की जानकारी मुहैया करायी थी." लेकिन हमारा सवाल था कि तथ्यों की सही जानकारी के बगैर गुमराही का यह काम ‘खेती विरासत’ के इशारे पर ‘आरघ्यम’ और ‘पोर्टल’ ने संयुक्त रूप से कैसे कर लिया?

इस मसले पर बहस में जाने के बजाय अब हम फिर क्षेत्र में जाने के कार्यक्रम पर आ गये. लेकिन ‘खेती विरासत’ के संयोजक सुरिंदर सिंह पीड़ितों से मिलाने ले जाने को अनसुना करते रहे. काफी जद्दोजहद के बाद वह दूसरे दिन सुबह आठ बजे हमें पीड़ितों से मिलाने को तैयार हुए.

दूसरे दिन वे पहुंचे तो सही, मगर नये बहानों के साथ. बहाना था कि साथ जाने वाला कोई नहीं है और आपलोग पंजाबी जानते नहीं हैं, इसलिए वहां बात कैसे कर पायेंगे. यह सब होते-हवाते दिन के ग्यारह बज गये, जबकि हमें वहां लौटकर तीन बजे दिल्ली के लिए रवाना भी होना था. मौके की नजाकत और आयोजकों का टालू रवैया देख पत्रकार मणिमाला ने क्षेत्र में जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया और कहा कि मुझे यहां किताबों का वितरण करना है, सो मैं नहीं जा पाउंगी.
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