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मिलान से मिलन

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मिलान से मिलन

एम जे अकबर


बर्फ जमीन पर चादर की तरह बिछी है, पेड़ों पर पाउडर की तरह, आल्प्स पर्वतमाला पर पैबंद लगे ओवरकोट की तरह और ज्यूरिख हवाई अड्डे पर आसमानी बिजली की तरह.

मुझे 50 मिनट में मिलान के लिए कनेक्टिंग फ्लाइट पकड़नी है, लेकिन ग्राउंड स्टाफ से बात करता हूं तो वे किसी जल्दबाजी में दिखाई नहीं देते. काम और समय की पाबंदी को लेकर स्विस लोगों का शांत रवैया अलौकिक है.

मशीन की तरह काम करना उनके डीएनए में है. मैं शांत भाव से आव्रजन पुलिस की औपचारिकताएं पूरी करता हूं, ट्रांजिट ट्रेन पकड़ता हूं, ड्यूटी फ्री शॉप से कुछ जरूरी चीजें लेता हूं और फिर भी अगली फ्लाइट के लिए इतना पहले पहुंच जाता हूं कि मेरे पास बर्बाद करने के लिए कुछ समय है.

मिलान में बर्फ इटैलियन हो चुकी थी- घनी और अस्त-व्यस्त. मुझे लेने आया ड्राइवर खुशमिजाज था, कुछ अजीब-से ढंग से. ‘प्लेन ऑन टाइम?’ उसने कुछ खुशी और कुछ खेद के मिले-जुले भाव से पूछा. मैंने बताया कि यह स्विस एयरलाइन की उड़ान थी, इटैलियन नहीं.

वह गर्व से चमक उठा. उसने विषय बदलते हुए आश्चर्य से पूछा कि नवंबर में इटली में बर्फ भला कैसे? थोड़ी-सी बर्फ मेरे ऊपर गिरी, जब पैसेंजर बस ने टर्मिनल से थोड़ा पहले ही उतार दिया. गंजे सिर पर बर्फ का गिरना बहुत भेद भरा अनुभव हो सकता है.

मिलान की बांहें अगर व्यवसाय है, तो मिलान का दिल पूजा है. इस शहर का जन्म व्यापार के लिए हुआ था लेकिन यह एक कैथ्रेडल डुओमो के इर्द-गिर्द विकसित हुआ. इतालवी कल्पनाशीलता की जबरदस्त ताकत में जब आस्था का चमत्कार जुड़ गया तो दोनों की सामूहिक शक्ति की शानदार देन डुओमो है.

कैथ्रेडल के भीतर जब आंखें एक के बाद एक चित्रों, मूतिशिल्पों और नक्काशीदार कांचों से गुजरती है तो प्रेरणा से ओतप्रोत हो जाती हैं. ईश्वर का यह घर मानवीय प्रतिभा का बोझ बहुत हल्के से संभाले हुए है लेकिन उस कलाकार का गर्व भी ओझल नहीं किया जा सकता, जो अपनी छवि में दैवीय शक्ति का पुनराविष्कार करने के लिए दृढ़संकल्पित था.

यात्राएं मुझे यकीन दिला देती हैं कि वेट्रेसेज सिर्फ इसलिए मुस्कराती हैं क्योंकि वे जानती हैं कि वे आपसे दोबारा नहीं मिलेंगी.


अठारहवीं सदी के एक महल में जब हमारी इंडिया-इटली कांफ्रेंस शुरू हुई, तो मिलान के ही एक मेहमान साथी के साथ बातचीत शुरू करने के लिए डुओमो सबसे अच्छा विषय था. मुझे यह देखकर ताज्जुब हुआ कि विनम्र से दिखने वाले इस शख्स ने इस बात पर अपनी नाराजगी छिपाई नहीं कि मोरक्को के आप्रवासियों ने कैथ्रेडल जाने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि ऐसा करना ‘हराम’ होगा.

यह सज्जन साल के 364 दिन कम्यूनिस्ट थे पर अवैध आप्रवासियों के कारण मतदान के दिन दक्षिणपंथी हो जाते थे. आप्रवासी ऐसा अभिशाप हैं, जिनका साफ-साफ नाम लेने के बजाय केवल फुसफुसाहटों में ही जिक्र किया जाता है. मुझे लगा ये सज्जन सिर्फ एक पीढ़ी इंतजार करें, तब तक बच्चे आपस में मिल-जुल जाएंगे.

आखिर प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी की प्रेमिकाओं की लंबी फेहरिस्त में नवीनतम नाम 19 बरस की लिबियाई आप्रवासी का है, जिसके पिता शायद सोचते होंगे कि वह फिजिक्स पढ़ने इस बड़े शहर में गई है. अवैध आप्रवासियों को लेकर यहां पाखंड भी बहुत है.

आप्रवासी उन्हें वापस भेजने के अभियानों से बच निकलते हैं तो सिर्फ इसलिए कि उनके लिए स्थानीय जॉब उपलब्ध हैं. जैसे-जैसे इटली के लोगों की उम्र बढ़ रही है, यहां बूढ़ों की देखभाल कर सकने वाली युवतियों की जबरदस्त मांग है. मांग हमेशा आपूर्ति को खींच लेती है.

सबसे फैशनेबल कपड़े पहनने वाले सैलानी चीनी हैं. उन्हें अपने स्वदेशी वातावरण के प्रति संपूर्ण बेरुखी से फौरन पहचाना जा सकता है. वे खुद अपनी कंपनी एन्जॉय करने के लिए यात्राएं करते हैं और यही पर्याप्त कारण है.

आपको कभी पता नहीं चलता कि उनके डिजायनर बैग नकली हैं या असली, लेकिन कौन परवाह करता है जब खुद उन्हें परवाह नहीं? एक कैफे में खराब किंतु महंगा खाना अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिहाज से अच्छी सीख हो सकता है.

चीनी आदमी चैपस्टिक से अपने होंठों को लगातार थपथपाता रहता है, उसकी निर्लिप्त साथी के होंठों पर पहले ही काफी लिपस्टिक लगी है. बगल की मेज पर बैठे ब्रितानी युगल के दोनों कंधे मल्टीपल चिप्स से भरे हैं.

वे इस बात से खिन्न दिखाई देते हैं कि उनके विशिष्ट लहजे में किसी की भी कोई दिलचस्पी नहीं. एक फ्रेंच परिवार पीढ़ियों की लड़ाई में खोया हुआ है, माता-पिता कीमतें देख रहे हैं और बेटा खाने पर ध्यान लगाए हुए है. यात्राएं मुझे यकीन दिला देती हैं कि वेट्रेसेज सिर्फ इसलिए मुस्कराती हैं क्योंकि वे जानती हैं कि वे आपसे दोबारा नहीं मिलेंगी.

इस छोटी-सी यात्रा के दौरान मुझसे लगातार कहा गया कि मैं सिर पर कुछ पहने बगैर कभी बाहर न निकलूं. लेकिन सिर पर पहनने की एकमात्र चीज जो मैं लेकर आया, वह एक ऊनी कश्मीरी टोपी है. लिहाजा अब या तो मैं तुर्की आप्रवासी की तरह दिखूं जो अधिकारियों का डटकर सामना नहीं कर सका, या फिर ठंड से मर जाऊं. बहुत दिमाग लगाने की जरूरत नहीं, मैं पुलिस के बजाय मौत पसंद करूंगा.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

05.12.2010, 02.06 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 


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