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खेलें हम जी जान से

बात पते की

 

खेलें हम जी जान से

कनक तिवारी


इन दिनों आशुतोष गोवारीकर और यश चोपड़ा मेरे प्रिय फिल्म निर्देशक और निर्माता हैं. उनकी फिल्मों की कलात्मकता पर टिप्पणी किए बिना एक बात तो उनमें बहुत स्वस्थ है. वे हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट वगैरह खेल की खिलाड़ी वृत्ति को देशप्रेम से जोड़कर एक नए किस्म का व्यापारिक शिल्प रचते हैं. वैसे भी देशप्रेम और खिलाड़ी वृत्ति तो एक दूसरे के पूरक हैं ही. लगान, ‘स्वदेश, ‘चक दे इण्डिया‘वगैरह के बाद खेलें हम जी जान से में भी उन्होंने यही फार्मूला अपनाया है.

देशप्रेम और खिलाड़ी वृत्ति का विलोप लोग महान फिल्म भारत में देख रहे हैं. स्वदेश से लगान वसूलकर चक दे इण्डिया बनाने के नाम पर खेलें हम जी जान से कहते हुए लोग देश निर्देशक भी बनते जा रहे हैं. देश बेचारा वैसे भी एक अनवरत फिल्म ही है. रामायण और महाभारत काल से गुजरते हुए कलियुग तक यह धारावाहिक फिल्म चल रही है. इसमें आमिर खान, षाहरुख खान और अभिषेक बच्चन सहित नायिकाओं और खलनायकों के कई प्रतिरूप हैं.

स्वदेश वैसे तो भूगोल की सरहदों के अन्दर दिखाई देता है. उसकी सरहदों पर कुछ हज़ार मुस्तैद जवान हर वक्त गर्दनें कटवाने के लिए तैयार रहते हैं. इनमें से अधिकांश गरीब या मध्य वर्ग के रोशन चिराग होते हैं. वे पेट और परिवार को अपनी नौकरी का हिस्सा मानते हुए शहीद हो जाते हैं तब देश को अपना परिवार मानते हैं. देशभक्ति तो वे करते हैं लेकिन उसका नवीन जिन्दल की तरह तिरंगा नहीं फहरा पाते.

उनके शवों के ताबूतों को लेकर देश के सबसे बड़े मंत्री और अधिकारी खिलाड़ी वृत्ति से करोड़ों रुपयों की खरीदी करते हैं. खरीदी और बिक्री का मैच कभी ऐसे लोग कभी नहीं हारते. सप्लायर्स से सांठगांठ करके वे अपना लगान तो वसूल करते रहते हैं. बीच-बीच में चक दे इण्डिया‘कहते डकार लेते हैं. शहीद परिवारों का आशियाना उजड़ जाता है. उनके लिए मंत्री और अफसर छोटे छोटे रैनबसेरों का इंतजाम करते हैं. इसे वे स्वदेश की आदर्श सोसायटी कहते हैं. जवानों की माताओं, विधवाओं और बच्चों से कोरे फॉर्म पर दस्तखत ले लिए जाते हैं. फिर वे रैन बसेरे इस तरह हो जाते हैं कि घोसला तो चिड़िया के नाम पर होता है, लेकिन रात के अंधेरे में उल्लू उनमें कब्जेदार हो जाते हैं. उल्लू चाहें तो चिड़ियों के बच्चों को बीन-बीनकर खा भी सकते हैं.

मंत्रिगण और अधिकारीगण लगान की जूठन खाकर चक दे कोल इण्डिया कहते रहते हैं.


उन बच्चों को सरकारी नीति अनुकम्पा के आधार पर नौकरी पर रख लेती है. उनसे घर के भी काम कराए जाते हैं. मुलाकातियों को फौजी साहब गर्व से बताते हैं कि उनकी मातहती में करगिल के शहीद का बच्चा नौकरी कर रहा है. ड्राइंग रूम में चक दे करगिल‘फिल्म की सी.डी. चलाई जाती है. उसी ड्राइंग रूम में शहीद परिवार का सदस्य चाय नाश्ता ला रहा होता है.

किसी नायाब तिकड़मबाज की सलाह पर रक्षा और कोयला मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी एक नई स्वदेशी फिल्म को अंधेरे में बनाते हैं. वे मंत्रिपरिषद को समझाते हैं कि कोयला माफिया से निपटने के लिए सेवानिवृत्त सैनिकों और उनके आश्रितों की कंपनी बनाकर यदि उन्हें ठेके दे दिये जाएं तो स्वदेश हिट हो जाएगा. ऐसा प्रस्ताव देते वक्त वे मंत्रियों और अधिकारियों के लगान की दरें भी तय कर देते हैं. फिर सब मिलकर कोरस गाते हैं जी भरकर खेलेंगे हम. कोयले की दलाली की फिल्म रिलीज़ कर दी जाती है. उसमें पेंच लगा दिए जाते हैं. करोड़पति परिवारों के लिए राष्ट्रीय मैच में कांप्लीमेंटरी पास पहले से फिक्स कर दी जाती है.

स्वदेशी दिखती टीम में कुछ पूंजीपति फाइनेन्सर के रोल में दाखिल होते हैं. वे देश की छाती में छिपे कोयले को खोदकर रातों रात करोड़पति से अरबपति और फिर खरबपति बनते चले जाते हैं. मंत्रिगण और अधिकारीगण लगान की जूठन खाकर चक दे कोल इण्डिया कहते रहते हैं. भूतपूर्व सैनिक और आश्रित शेयर होल्डर होकर भी उद्योगपति भागीदारों की चाकरी करते हैं. यदि दोनों तरह के खिलाड़ियों के इन्कम टैक्स रिटर्न देखे जाएं तो एक के पास कोयला और दूसरे के पास राख होती है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

mihir [mgmihirgoswami@gmail.com] bilaspur cg

 
  यह सब कब तक चलना चाहिये ? 
   
 

Satyaprakash [satyapandey4@gmail.com] bilaspur

 
  सच कहा आपने. मंत्रीगण और अधिकारीगण लोगों की जूठन खाकर, इस सच को कम ही लोग स्वीकार करते है. 
   
 

brajesh [bgouraha@gmail.com] bilaspur

 
  बहुत ही बढ़िया लेख के लिये तिवारी जी आपको प्रणाम( मुलाकातियों को फौजी साहब गर्व से बताते हैं कि उनकी मातहती में करगिल के शहीद...) और (किसी नायाब तिकड़मबाज की सलाह पर रक्षा और कोयला मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी एक नई स्वदेशी फिल्म को अंधेरे में बनाते हैं. वे मंत्रिपरिषद को समझाते हैं कि कोयला माफिया से निपटने के लिए सेवानिवृत्त सैनिकों और उनके आश्रितों की....) ऐसी पंक्तियों के लिये निःसंदेह आप बधाई के पात्र हैं. 
   
 

Sanjeev Tiwari [] Raipur

 
  आपने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है. मीडिया को अपने अंदर झांकने की जरुरत है. 
   
 

bhoopender [bhoopen1980@gmail.com] bhilai

 
  बहुत सुंदर लेख है तिवारी सर. सच्चाई सब जानते हैं लेकिन कोई सबूत नहीं ला सकता इसलिये भ्रष्ट नेता सबको लतियाये हुये हैं. 
   
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