reset
  पहला पन्ना >ब्रह्मानंद Print | Share This  

हम कौन हैं

बहस
 

हम कौन हैं

प्रीतीश नंदी


मुझे अभी-अभी कोरो के बारे में पता चला. इस भाषा की खोज कुछ दिनों पहले ही की गई है. इस लिहाज से यह दुनिया की सबसे नई भाषा है. अरुणाचल प्रदेश की इस भाषा को बोलने वाले लोगों की संख्या बमुश्किल बारह सौ के आसपास होगी. समय के साथ इस भाषा के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं, अलबत्ता अरुणाचल प्रदेश के दूरस्थ इलाकों में बसने वाले देहाती बुजुर्ग उसे बचाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं.

हमारे पूर्वोत्तर में ऐसी अनेक अद्भुत स्थानीय भाषाएं हैं, जो आधुनिकता के आक्रमणों का सामना कर रही हैं. नगालैंड में इस तरह की सत्रह भाषाओं को प्राथमिक स्कूल तक पढ़ाया जाता है, लेकिन विश्वविद्यालय तक पहुंचते-पहुंचते केवल एक ही भाषा शेष रह जाती है.

मणिपुर में केवल वे ही भाषाएं अपना अस्तित्व बचाए रखने में कामयाब हो पाई हैं, जो कुकी जनजाति के लोगों द्वारा बोली जाती हैं, जैसे हमार और पैते. मैतेइयों ने अपनी लिपि में सुधार कर लिया है. लेकिन अरुणाचल प्रदेश की कोरो, हरूसो, मिजी, तागिन, गालो, बोकर, पदम पासी, शेदरुकपेन, बुगुन, बांगरू, इदु, दिगारू, मिजु और पुरोइक सुलुंग, असम की देवरी और तिवा, मेघालय की चिरू और मोंसांग और अपेक्षाकृत कमजोर तबके खासी समुदाय की भाषाएं तकरीबन खत्म हो चुकी हैं.

यह केवल भारत के एक छोटे-से हिस्से की कहानी है. लेकिन अगर हम अपने देश के बड़े फलक पर एक नजर डालें तो हम समझ जाएंगे कि जैसे-जैसे हम दृढ़ता के साथ एक राष्ट्र और एक नागरिकता की हिमायत करते जाते हैं, वैसे-वैसे ही हमारी लाखों देशज बोलियों की आवाज भी खामोश होती चली जाती है.

इनमें से कई बोलियां तो बहुत ही छोटे समुदाय द्वारा बोली जाती हैं, लेकिन वे अपने में भारत के जादू और रहस्य को संजोए हुए हैं. इन बोलियों और आवाजों के साथ ही उनके गीत, उनकी कविताएं, उनकी लोककथाएं, उनका रंगकर्म, उनका स्थानीय इतिहास और ध्वनियों-शब्दों की समृद्ध परंपराएं भी समाप्त हो रही हैं, जिनके कारण हम अपने देश को विलक्षण कहते हैं.

यह केवल भाषाओं का ही सवाल नहीं है. यह हमारे इतिहास और संस्कृतियों का भी सवाल है. यह उन परंपराओं का सवाल है, जिन्हें कभी संरक्षित नहीं किया जा सका. जो एक के बाद एक दम तोड़ती जा रही हैं और अपने पीछे एक ज्यादा संपन्न, ज्यादा ताकतवर, लेकिन सांस्कृतिक रूप से विपन्न भारत को छोड़े जा रही हैं.

यह आधुनिकता और राष्ट्रीयता की कीमत है, जो हम चुका रहे हैं. छोटे और विशिष्ट समुदाय खामोशी की खोह में खो गए हैं, जबकि जिन लोगों की तादाद ज्यादा है, वे जीत के उल्लास में शोर मचा रहे हैं. यदि आप चाहें तो इसे लोकतंत्र कह सकते हैं या आप चाहें तो मेरी तरह इसके दूसरे पहलू की पड़ताल कर सकते हैं.

संयुक्त और विस्तृत का मतलब यह नहीं होता कि सबको एक मुख्यधारा में समाहित कर लिया जाए. मेरा मानना है राष्ट्रीयता का अर्थ यह होता है कि हम अपनी विविधताओं को पोसें और उन लाखों आवाजों को जीवंत रखें, जो हमें हमारा वास्तविक स्वरूप प्रदान करती हैं. अल्प समुदाय वे नहीं हैं, जिनकी वजह से हम परेशानी का अनुभव करते हैं.

वास्तव में हम सभी अल्प समुदाय से वास्ता रखते हैं. हम खुद को मुख्यधारा में इसलिए महसूस करते हैं, क्योंकि हम सभी सचिन की बल्लेबाजी के कायल हैं, हम सभी दबंग की दबंगई पर वाह-वाह करते हैं या सरल सेकुलरिज्म के चिकने-चुपड़े जुमलों को तोतों की तरह दुहरा देते हैं.

लेकिन सच्चाई यह है कि हमारा वास्तविक संबंध अपने उस परिवेश से है, जिसमें हमने आंखें खोली थीं. और इसीलिए जब कोई कश्मीरी अपनी पहचान के सवाल को दृढ़तापूर्वक सामने रखता है, तो मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं नजर आता. जब वह आजादी के बारे में बात करता है, तब उसके आशयों पर बहस की जा सकती है, लेकिन उसकी वास्तविक पहचान की तलाश पर तर्क-कुतर्क नहीं किया जा सकता, क्योंकि हम सभी अपनी-अपनी पहचान खोते जा रहे हैं.
 

पहले हमारे दिलों में अनेक भारतीय बसते थे. हम कई तरह की भाषाएं बोलते और समझते थे. हम एक-दूसरे से नफरत किए बिना कई तरह से आपस में बतियाया करते थे.

मेरी पैदाइश और परवरिश एक बंगाली परिवार में हुई. ठीक वैसे ही जैसे सचिन की पैदाइश और परवरिश मराठी परिवार में हुई. लाखों अन्य लोगों की तरह हमने अपने जीवन और कॅरियर का निर्माण देश के झंडे तले किया. लेकिन क्या कोई बता सकता है कि मेरे भीतर कितना हिस्सा एक भारतीय का है और कितना एक बंगाली का?

आदित्य ठाकरे कितने भारतीय हैं और कितने मराठी? भारतीय राजनीति के महान किंगमेकर कामराज हमेशा तमिल बोलते थे. इसके बावजूद साठ के दशक में वे सबसे शक्तिशाली कांग्रेसी थे. किसी ने उन्हें एक सीमित दायरे में सिमटा हुआ व्यक्ति नहीं माना.

किसी ने उनकी भारतीयता पर सवाल नहीं खड़े किए, क्योंकि उन दिनों एक अच्छा तमिल ठीक उसी तरह एक अच्छा भारतीय माना जाता था, जैसे एक अच्छा बंगाली या एक अच्छा मराठी. तब दिल्ली का मतलब पूरा देश नहीं था. हर राज्य की अपनी एक पहचान थी. अपनी भाषा, संस्कृति, परपंराएं और इतिहास थे.

लेकिन जैसे-जैसे दिल्ली ज्यादा ताकतवर होती गई, उसने ज्यादा से ज्यादा अधिकार हथियाने शुरू कर दिए. वह धीरे-धीरे हमारी स्वतंत्रता और हमारी पहचान को नष्ट करने लगी. क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ने लगे. इस प्रक्रिया में हमने जो पाया है, वह उसकी तुलना में कुछ नहीं है, जितना हमने गंवा दिया है.

70 हजार करोड़ रुपयों के कॉमनवेल्थ खेलों से दिल्ली के अहंकार की तुष्टि जरूर हो सकती है, लेकिन इतनी ही धनराशि से हम यह सुनिश्चित कर सकते थे कि कोई भारतीय भूखा न सोए. हम शेखी बघारते हैं कि क्रिकेट और बॉलीवुड ने भारत को एकजुट किया है, लेकिन उन्होंने जहां सैकड़ों अन्य खेलों को नष्ट कर दिया है, वहीं लाखों स्थानीय उपसंस्कृतियों को भी क्षति पहुंचाई है, जिनकी वजह से हमारी वास्तविक पहचान थी.

तब ऐसा कोई एक हिंदुत्व नहीं था, जिसके बारे में आरएसएस उपदेश दिया करता है. तब ऐसा कोई एक इस्लाम नहीं था, जिसके बारे में मुस्लिम नेता बातें करते हैं. हर धर्म और हर समुदाय की अपनी आस्था थी और वे दूसरे धर्मो-संप्रदायों को भी समृद्ध करती थी.

तब कोई एक देश, एक भाषा और एक संस्कृति नहीं थी. तब हमारे दिलों में अनेक भारतीय बसते थे. हम कई तरह की भाषाएं बोलते और समझते थे. हम एक-दूसरे से नफरत किए बिना कई तरह से आपस में बतियाया करते थे. न विद्वेष था और न कोई दबाव. हम भारतीय थे : उस तरह जैसे हम होना चाहते थे, उस तरह से नहीं, जैसे दिल्ली चाहती थी.

27.10.2010, 10.19 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

mihir [mgmihirgoswami@gmail.com] bilaspur cg

 
  यह सब कब तक चलना चाहिये ? 
   
 

Satyaprakash [satyapandey4@gmail.com] bilaspur

 
  सच कहा आपने. मंत्रीगण और अधिकारीगण लोगों की जूठन खाकर, इस सच को कम ही लोग स्वीकार करते है. 
   
 

brajesh [bgouraha@gmail.com] bilaspur

 
  बहुत ही बढ़िया लेख के लिये तिवारी जी आपको प्रणाम( मुलाकातियों को फौजी साहब गर्व से बताते हैं कि उनकी मातहती में करगिल के शहीद...) और (किसी नायाब तिकड़मबाज की सलाह पर रक्षा और कोयला मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी एक नई स्वदेशी फिल्म को अंधेरे में बनाते हैं. वे मंत्रिपरिषद को समझाते हैं कि कोयला माफिया से निपटने के लिए सेवानिवृत्त सैनिकों और उनके आश्रितों की....) ऐसी पंक्तियों के लिये निःसंदेह आप बधाई के पात्र हैं. 
   
 

Sanjeev Tiwari [] Raipur

 
  आपने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है. मीडिया को अपने अंदर झांकने की जरुरत है. 
   
 

bhoopender [bhoopen1980@gmail.com] bhilai

 
  बहुत सुंदर लेख है तिवारी सर. सच्चाई सब जानते हैं लेकिन कोई सबूत नहीं ला सकता इसलिये भ्रष्ट नेता सबको लतियाये हुये हैं. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in