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टेप के शोर

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टेप के शोर

एम जे अकबर


प्रणब मुखर्जी का यह कहना सर्वथा उपयुक्त है कि हमारा लोकतंत्र अब शोरशराबे से भरा हो चुका है. अपने 50 साल लंबे सियासी कॅरियर में प्रणब दा ने हमेशा फेफड़ों की तुलना में मस्तिष्क को प्राथमिकता दी है. शोरशराबा उनके मिजाज और उनकी भद्रलोक-ब्राह्मण संस्कृति के अनुरूप नहीं है.

प्रणबदा का कार्यक्षेत्र है मंत्रालय. जब उनकी पार्टी विपक्ष में हो, तो उनकी स्थिति जल बिन मछली जैसी हो जाती है. वे जानते हैं कि संसदीय प्रणाली में सरकार के पास बहुत सारे अधिकार होते हैं, लेकिन केवल तभी, जब उसे सत्ता की मशीनरी के बारे में पता हो. उन्हें पता है कि विपक्ष के पास अक्सर सिवाय इसके और कोई चारा नहीं होता कि वह अपना पहला और अंतिम कार्ड खेले : शोरशराबा.

शोरशराबा अब निंदात्मक शब्द बन गया है, लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं. जरूरी नहीं कि ध्वनियों को हमेशा कोलाहल की ही संज्ञा दी जाए. वाकपटुता और संगीत में भी तो ध्वनियां होती हैं. राजनीति में वाकपटुता के दर्शन कभी-कभार ही होते हैं और संगीत से तो खैर उसका दूर-दूर तक का नाता नहीं. लेकिन विपक्ष को यह पता है कि यदि उसकी आवाज को सुना न जाए, तो उसका कोई वजूद ही नहीं रहेगा. हालांकि ऊंची आवाज तभी भली लगती है, जब उसमें जनहित जुड़ा हो.

मुखर्जी के वक्तव्य में जो नाजुक ‘ट्विस्ट’ है, उसकी वजह है उनका वह विशेषण, जिसका इस्तेमाल उन्होंने शोरशराबे से पहले किया है : ‘बहुत ज्यादा शोरशराबा.’ मुखर्जी ने रोग की पहचान तो ठीक की, लेकिन इलाज बताने में उनसे जरा चूक हो गई. क्योंकि उसके बाद उन्होंने यह सलाह दे डाली कि हमें थोड़ी-सी ‘खामोशी’ अख्तियार करनी चाहिए.

खामोशी की खूबियों का अब क्या बखान करें. खामोशी चिंतन को बढ़ावा देती है और चिंतन से परिपक्वता आती है. यदि मुखर्जी विपक्ष को परिपक्व होने की सलाह दे रहे थे तो वाकई यह एक काबिले-तारीफ सलाह थी. लेकिन विपक्ष का भी यह पूरा अधिकार है कि वह यह रेखांकित करे कि अक्सर सरकार खामोशी का इस्तेमाल ठीक उसी तरह करती है, जैसे कोई आरोपी आत्मरक्षा के प्राथमिक साधन के रूप में उसका उपयोग करता है.

आज तक कोई हथियार इतनी तेजी से पलटकर वापस नहीं आया था, जितनी तेजी से ‘रतन बूमरैंग’ आया.


सीपीआई (एम) के प्रकाश करात और भारतीय जनता पार्टी के अरुण जेटली दोनों ही डॉ मनमोहन सिंह से पूछ रहे हैं कि क्या वे इसी डर से जेपीसी का गठन नहीं कर रहे हैं कि अगर उन्होंने मुंह खोला तो वे अपनी सरकार को एक ऐसे घोटाले में फंसा देंगे, जो परत-दर-परत उजागर होता चला जा रहा है. अब हमें पता चला है कि सरकार ने नीरा राडिया के फोन इसलिए टेप किए, क्योंकि उसे अंदेशा था कि वह ‘राष्ट्रविरोधी’ गतिविधियों में लिप्त है. इसका मतलब यह है कि नीरा पर लगाए गए आरोप भ्रष्टाचार से कहीं अधिक गंभीर हैं. यह खुलासा तो जेपीसी के गठन की विपक्ष की मांग को और जायज ही ठहराता है.

यह विडंबना है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में यह बयान देने को इसलिए मजबूर हुई, क्योंकि राडिया के मुख्य वित्तीय संरक्षक रतन टाटा द्वारा याचिका दायर की गई थी. एक लचर कानूनी सलाह के अनुरूप कार्य करते हुए टाटा टेप्स पर रोक लगाने की मांग करते हुए अदालत पहुंच गए. साथ ही उन्होंने भारत को ‘बनाना रिपब्लिक’ के खिताब से भी नवाजा. आज तक कोई हथियार इतनी तेजी से पलटकर वापस नहीं आया था, जितनी तेजी से ‘रतन बूमरैंग’ आया.

इसीलिए यहां इस पर विचार करना प्रासंगिक है कि प्रणब मुखर्जी ने थोड़ी-सी खामोशी की इच्छा क्यों व्यक्त की थी. वे उद्यमियों से मुखातिब थे. यह तो जाहिर ही है कि पैसे के बिना घूसखोरी नहीं हो सकती और जहां-जहां पैसा है, वहां-वहां उद्योगपति हैं, लेकिन अब 2जी तमाशा धीरे-धीरे एक ऐसे नाटक में तब्दील होता जा रहा है, जिसके पहले अंक में जो मुख्य पात्र थे, अब वे मंच से गुम हो गए हैं और दूसरे चरित्रों ने उनकी जगह ले ली है.

रतन टाटा जिस तरह से सुर्खियों में बने हुए हैं, वह उनके कद के अनुरूप नहीं है. उन्होंने चुप्पी साधने के बजाय मामले में हस्तक्षेप करना उचित समझा, जबकि सबूत कुछ और कहानी बयां कर रहे थे. राजीव चंद्रशेखर ने इस बाबत शालीन तरीके से इशारा किया है.

शायद यहां इस पर गौर करना जरूरी है कि नीरा राडिया के टेलीफोन मनमोहन सिंह सरकार ने टेप करवाए थे, भारतीय जनता पार्टी ने नहीं. और इन टेप्स को लीक भी भाजपा के गुप्तचरों ने नहीं, बल्कि सत्ता में बैठे लोगों ने ही किया. आज यदि रतन टाटा भारतीय घोटालों की मीडिया स्टोरीज में अपना नाम पाते हैं, तो इसलिए क्योंकि मौजूदा सरकार ने मीडिया को टेप्स मुहैया कराए. यह भी संभव है कि लीक्स गृहमंत्री पी चिदंबरम की सहमति से हुए हों. समय आ गया है कि हम समझें कि प्रणब मुखर्जी का मंतव्य क्या था : खामोशी की जरूरत उनकी सरकार को ज्यादा है.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

12.12.2010, 02.06 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 


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