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मरते समय क्या कहेंगे बुश

बाईलाइन

 

मरते समय क्या कहेंगे बुश

एम जे अकबर


अमरीका की अफ-पाक नीति के घुमंतु शहंशाह रिचर्ड होलब्रूक ने क्या निर्णायक सर्जरी के लिए जाते हुए पाकिस्तानी मूल के एक डॉक्टर से सचमुच कहा था कि ‘अफगानिस्तान की इस जंग को खत्म करो.’ या उस पाकिस्तानी डॉक्टर ने वही सुना जो वह सुनना चाहता था?

हमने जो सुना या जो हम सुनना चाहते थे, क्या उसे हम याद रखते हैं? मशहूर आखिरी शब्द छलावा होते हैं. अगर आप मरते हुए आदमी के सिरहाने बैठे हों, तो अजनबी होने पर भी उसका असर आपके स्नायुओं पर पड़ सकता है, इसलिए कतई नहीं कि किसी को मरता देखकर आपके दिमाग में भी खुद के मरने का खयाल आ जाता है. रिश्तेदार और दोस्तों पर भी भावनात्मक असर पड़ता है.

मान भी लें कि मौत के समय कही गई बातों के साथ ज्यादा संभावना यही होती है कि वे साफ-साफ नहीं, बुदबदाहट में कही जाती हैं. ऐसे में चिकौटी काटना बेहतर है ताकि बात को साफ-साफ सुना और समझा जा सके.

क्या ग्रोचो मार्क्सब ने वास्तव में कहा था, ‘मरना, मेरे प्रिय? भला क्यों, वह तो मेरा आखिरी काम होगा!’ या विश्व प्रसिद्ध होटल श्रृंखला के संस्थापक कोनराड हिल्टन ‘शॉवर के परदे को टब के अंदर छोड़ दो’ जैसी अजीब-सी बात कहते हुए मरे थे.

महान इतालवी यात्री की यह बात ज्यादा भरोसेमंद लगती है : ‘मैंने जो देखा उसका आधा भी नहीं बताया है.’ और मेधावी वेल्श कवि डायलन टॉमस की यह बात भी कि ‘मैंने 18 नीट व्हिस्की ली. मैं सोचता हूं यह रिकॉर्ड है.’ ये सधे हुए वाक्य लगता है, किसी भले आदमी ने संपादित किए हैं, उस किताब के लिए जिससे मैंने इन्हें लिया है.

लेकिन फिर भी ये शब्द बचे रहे तो इसलिए कि इनमें बात है. अरबपति हिल्टन के दिमाग में यही बात हावी होगी कि उसके होटल के मेहमान कहीं बाथरूम को तहस-नहस न कर दें. ग्रोचो संभवत: एक आखिरी मौके का प्रलोभन छोड़ नहीं सके और टॉमस एक आखिरी शेखी का, जो उनकी प्रतिभा को नष्ट कर देने वाले व्यसन के बारे में थी.

क्या रिचर्ड होलब्रूक ने, जो अमरीका की अफ-पाक नीति के घुमंतु शहंशाह थे, निर्णायक सर्जरी के लिए जाते हुए पाकिस्तानी मूल के एक डॉक्टर से सचमुच कहा था कि ‘अफगानिस्तान की इस जंग को खत्म करो.’ या उस पाकिस्तानी डॉक्टर ने वही सुना जो वह सुनना चाहता था? खासकर ऐसी स्थिति में जब वह अपने मुल्क को महाशक्ति देशों द्वारा अफगानिस्तान पर थोप दी गई लड़ाई के संहारक राजनीतिक, सामाजिक व सैनिक नतीजे भुगतते देख रहा है.

होलब्रूक ऐसे शख्स थे जिन्होंने अपने काम में कोई बंधुआगीरी स्वीकार नहीं की और काम खत्म होने के बाद वह जहां होते थे वहां छा जाते थे. उनका दिलचस्प आधिकारिक कैरियर वियतनाम से शुरू हुआ. विदेश मामलों के संपादक के रूप में उसमें थोड़ा-सा विराम आया. बोसनिया में शांति के समझौताकार के रूप में उनका कैरियर खत्म हो गया होता, अगर दोस्त व सलाहकार हिलेरी क्लिंटन ने उन्हें अमरीका की नवीनतम लड़ाई के मोर्चे का कूटनीतिक उत्तरदायित्व नहीं सौंप दिया होता.

अगर होलब्रूक को मौका मिलता तो संभवत: वह अपने पाक दोस्तों से कहते कि अमरीका की वापसी से पैदा खाली जगह को भरने की बेताबी खतरनाक भूल होगी.


सच तो यह है कि अगर हिलेरी व्हाइट हाउस के लिए जीत जातीं तो होलब्रूक उसी पद की शोभा बढ़ा रहे होते जिस पर अभी हिलेरी हैं. होलब्रूक दुनिया भर में घूमते थे, लेकिन उन्होंने जो भी किया या कहा उसमें एक निर्विवाद थीम जरूर होती थी : अमरीकी हित सबसे पहले. वह लिबरल देशभक्त थे.

क्या वह मानते थे कि जंग का खात्मा अब अमरीकी हित में है? अफगानिस्तान में दो साल के काम के दौरान उन्होंने घटनाओं के बारे में पाक नजरिये को अहमियत दी. दिल्ली के लिए यह निराशा की बात थी. वह इस्लामाबाद की ‘स्ट्रैटजिक डेफ्थ’ थ्योरी के हिमायती बन गए. उन्होंने दिल्ली पर नियंत्रण रेखा से सैनिकों को हटाने का दबाव बनाया ताकि पाक अपनी फौजों को पश्चिमी मोर्चे पर तैनात कर सके.

पाकिस्तान को दो सालों में जो अमरीकी रेवड़ियां मिलीं, उनकी पैरवी करने वाली वह प्रमुख आवाज थे. जॉर्ज बुश चैक पर दस्तखत करते वक्त ज्यादा सतर्क रहते थे. इस साल की बाढ़ के बाद जब उन्होंने विशाल राहत का काम संभाला (होलब्रूक मौजूद होते तो वही यह जिम्मेदारी संभालते) तो उनकी भूमिका को पाकिस्तानी प्रेमपूर्वक याद करते हैं. लेकिन बुश नहीं चाहते कि लड़ाई खत्म हो, तब जब शांति से मुख्य फायदा पाक को होने वाला हो.

जंग लगातार नहीं चलती. गुरिल्ला लड़ाई में भी लंबे बांझ अंतराल आते हैं. अफगान लड़ाई भी ऐसे ही बांझ दौर से गुजर रही है, पर यह तब तक खत्म नहीं हो सकती जब तक कि एक पक्ष हार न मान ले या दोनों युद्धविराम पर राजी न हो जाएं. एक बार ऐसा भी हुआ जब अमरीका और वियतनाम ने युद्धविराम के बगैर ही शांति वार्ता प्रारंभ कर दी. यानी शत्रुता का अंत किस तरह हो, इसके एकाधिक मॉडल मौजूद हैं.

होलब्रूक को पता था कि अनियोजित तरीके से ऐसी एक कोशिश की जा रही है. इस अघोषित प्रक्रिया में कुछ बेहूदा बातें भी हुईं. मसलन ब्रिटिश खुफिया एजेंसी अपने साथ विमान में एक ‘तालिबान’ नेता को बातचीत के लिए काबुल ले आई, बाद में पता चला कि वह एक अदना दुकानदार से ज्यादा कुछ नहीं था. आईएसआई में अब भी शायद कुछ लोग इस सत्य कथा का मजा ले रहे होंगे. यह प्रसंग ग्रोचो मार्क्स के आखिरी शब्दों को प्रासंगिक बना देता है.

घटती चेतना और बढ़ते अंत:करण में होलब्रूक जानते थे कि अफगान लड़ाई शुरू करना सही था, पर गलतियों ने उसे रसातल में धकेल दिया. यह वक्त है जब अमरीका आर्थिक व राजनीतिक नुकसान को कम करे और बाद के परिणामों से बेहतर से बेहतर ढंग से निपटे. अगर होलब्रूक को मौका मिलता तो संभवत: वह अपने पाक दोस्तों से कहते कि अमरीका की वापसी से पैदा खाली जगह को भरने की बेताबी खतरनाक भूल होगी. अफगान राष्ट्रवाद उतना ही मजबूत है जितना उसके पर्वतों की हिमालयी चट्टानें.

किसी को भी अचरज होगा कि जॉर्ज बुश के आखिरी शब्द क्या होते? शायद वे होते : जंग जारी रखो!

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

19.12.2010, 00.06 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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