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हिंसा का अधिकार

बहस

 

हिंसा का अधिकार

हितेन्द्र पटेल


पिछले कुछ सालों में समाज में होने वाली हिंसा में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है. ऐसे में सहज ही सवाल उठता है कि आखिर इस हिंसा को बढ़ा कौन रहा है? इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले मैं कुछ बातों पर पाठकों का ध्यान दिलाना चाहूंगा. हिंसा एक हद तक बुखार की तरह है. जैसे बुखार अपने आप कोई रोग नहीं है बल्कि एक संकेत है किसी बीमारी का. जैसे ही वह बीमारी ठीक होगी, बुखार अपने आप उतर जाएगा. हिंसा को समाज में व्याप्त बुराई के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है. समस्या तब अधिक हो जाती है, जब इस प्रश्न पर राज्य-सत्ता जैसे संस्थान को जोड़कर इस पर विचार किया जाता है.

नक्सल हिंसा


राज्य एक शक्ति है, जो सुनिश्चित करता है कि राज्य के नियमों का पालन हो. चूंकि इसके नियम प्रभुत्त्वशाली वर्गों द्वारा ही निर्मित होते हैं, इसलिए स्पष्टत: राज्य प्रभुत्त्वशाली वर्ग के हितों के हिसाब से ही काम करता है. इस राज्य को एक विशेषाधिकार प्राप्त है. यही वह चीज है जिसके कारण यह सबसे शक्तिशाली है. वह अधिकार है 'हिंसा का अधिकार'. सभी संस्थाओं में सिर्फ इसे यह अधिकार है कि यह हिंसा कर सकती है. आधुनिक युग में, जिसमें राज्य-सत्ता के अधिकार सबसे व्यापक हैं, किसी को आत्महत्या का भी अधिकार नहीं है.

सामान्यत: यह माना जाता है कि राज्य उस देश के समस्त नागरिकों की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्त्व करता है. समस्या तब होती है जब राज्यसत्ता अपनी वैधता को खो दे, यानि जब राज्य अपनी शक्ति का दुरूपयोग करके नागरिकों की सामूहिक इच्छा का अनादर करके शासन करने की कोशिश करे. विख्यात वामपंथी चिंतक फ्रांज फेनन मानते थे कि 'उपनिवेशवाद हिंसा है अत: इसके खिलाफ हिंसा का प्रयोग सर्वथा उचित है".

दुनिया के तमाम क्रांतिकारी विचारकों का मत भी यही है कि जब राज्य जनता का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा हो और अपने को बचाने के लिए उसके पास उपलब्ध शक्ति- हिंसा का सहारा लेने लगे तो वह अपने शासन के अधिकार को खो देता है. ऐसे में राज्य सत्ता के खिलाफ हिंसा का प्रयोग वैध है. युद्ध में शत्रु के द्वारा प्रयुक्त अस्त्र के हिसाब से ही युद्ध किया जाता है. अत: अनुचित राज्य सत्ता को अपदस्थ करने के लिए हिंसा का रास्ता ही सही रास्ता है. इसी तर्क के कारण फेनन अल्जीरिया के क्रांतिकारियों द्वारा औपनिवेशिक शासन के खिलाफ हिंसा का प्रयोग बिल्कुल सही मानते हैं.

इसके विपरीत गाँधी जैसे विचारक हैं जो हिंसा को हर रूप में गलत मानते हैं. उनकी दृष्टि में अगर औपनिवेशिक शक्तियाँ हिंसा का प्रयोग करती हैं तो इसका उत्तर प्रति हिंसा से देने का अर्थ है पहली शक्ति द्वारा हिंसा के प्रयोग का औचित्य सिद्ध करना. अगर हम हिंसा का विरोध अहिंसा से करेंगे तो हिंसा करने वाला या तो बदलेगा या उसके बल प्रयोग की नैतिकता खत्म होगी. इस प्रकार का अनैतिक बल प्रयोग चल नहीं सकता.

मुझे लगता है गाँधी की बात बहुत गहरी है और इसे ठीक से समझने की जरूरत है. देखा जाए तो जब से लोकतंत्रात्मक व्यवस्था दुनिया में आयी है, किसी भी देश की राज सत्ता अपने देश की आम जनता की इच्छा के विरूद्ध नहीं जा सकती. सिर्फ तानाशाही और फासिस्ट राज्य सत्ता ही जनता की इच्छा का अनादर करने का जोखिम उठाती है. अगर इस बात को मान लिया जाए तो गाँधी का कहा हुआ बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है. यह ज्यादा कारगर तरीका है. हालाँकि यह भी कहना पडेगा कि किसी और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ गाँधी का अहिंसात्मक आन्दोलन इतना प्रभावी नहीं भी हो सकता था. आप बर्मा का उदाहरण भी ले सकते हैं. चाहे तो तिब्बत का भी उदाहरण ले सकते है जिसमें गाँधीवादी प्रकार के राजनैतिक आन्दोलनों को वह सफलता नहीं मिली जो भारत में संभव हो सकी.

यहां यह भी गौरतलब है कि मनोरचना में विवेक और कल्याण का दायरा सिकुड़ता जा रहा है. यही वह बात है जिससे बात शुरू की जा सकती है. यह क्यों हो रहा है? क्या इससे इतर कुछ और हो सकता था? मुझे लगता है आधुनिक सोच इससे इतर कुछ और कर ही नहीं सकता था.

अपने देश में इस संबंध में ज्यादा चर्चा नहीं होती कि आखिरकार आधुनिक यूरोपीय सोच के दायरे में इस देश की सोच को क्यों 'रिड्यूस' किया जाता रहा है. यूरोप में सौ से भी ज्यादा सालों से यह बात समझी जाती रही है कि आधुनिकता के भीतर भयानक विध्वंसकारी तत्त्व हैं जो हमारे मन को 'वेस्टलैंड' में बदल देंगे और विवेकशील मनुष्य एक उपभोक्ता 'बायो मास' में तब्दील हो जाएगा.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sumitra Singh [sumitra.singh@gmail.com] New Delhi

 
  आपने इतना महत्वपूर्ण विश्लेषण किया है कि सहज यकीन करना मुश्किल है. यह केवल इसलिये भी क्योंकि हिंदी में ऐसे आलेख दुर्लभ हैं. आपने बहुत गंभीरता और संभवतः जिम्मेवारी के साथ ही इस मुद्दे पर विचार किया है. 
   
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