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इस आक्रोश को समझें

बाईलाइन

 

इस आक्रोश को समझें

एम जे अकबर


कोई भी साल किसी निर्जन द्वीप की तरह अलग-थलग नहीं होता. कैलेंडर जैसी अस्थायी चीजों की कोई परवाह किये घटनाओं का क्रम हमेशा एक नतीजे की ओर आगे बढ़ता है. 31दिसंबर को न तो समय की गति रुक जाती है और न ही तर्क वहां खत्म हो जाता है. 1 जनवरी को भी न तो समय की छुट्टी होती है न तर्क की. 2010 की मुख्य थीम थी : भ्रष्टाचार और 2011 के नाटकीय विकास में भी इसकी एक अहम भूमिका रहने वाली है.

अगर आप नववर्ष 2011 की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह का संक्षिप्त संदेश सुनें तो आप समझ जाएंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं. प्रधानमंत्री ने कहा कि वे नए साल में प्रशासनिक तंत्र की ‘साफ-सफाई’ करना चाहेंगे. आम तौर पर नए साल पर लिए जाने वाले संकल्पों की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती है. लेकिन यदि प्रधानमंत्री को यह लगता है कि उनके इस वादे को भी जल्द ही भुला दिया जाएगा तो संभव है कि उनकी सरकार की उम्र भी इस वादे की उम्र जितनी ही लंबी साबित हो. देश की जनता खासी नाराज है. अभी तक तो इस गुस्से ने विध्वंस का रास्ता अख्तियार नहीं किया है, लेकिन ऐसा कभी भी हो सकता है और सरकार को पहले ही उसके लिए तैयार रहना चाहिए.

आलोचकों को यह पूछने का अधिकार तो निश्चित ही है कि अगर सफाई की जरूरत अब है तो प्रधानमंत्री छह सालों से क्या कर रहे थे? सरकार को वे चला रहे थे या कोई और चला रहा था? निश्चित ही डॉ सिंह विपक्ष की राज्य सरकारों के बारे में बात नहीं कर रहे थे और अपनी सरकार को सद्चरित्र का प्रमाण पत्र नहीं दे रहे थे. 2010 के भ्रष्टाचारों के बारे में ध्यान देने लायक बात यह है कि लूट-खसोट की अधिकतर घटनाएं दिल्ली में हुईं. कॉमनवेल्थ और 2जी स्पेक्ट्रम की तुलना में मुंबई और बेंगलुरू में हुए भ्रष्टाचार तो कुछ भी नहीं हैं. सवाल उठता है कि डॉ सिंह ने यूपीए के मंत्रियों को थोक में यह लूटपाट करने का मौका क्यों दिया? वे वर्ष 2004 से सत्ता में हैं, लेकिन इस अवधि में उनकी निगरानी में चोर और डकैत करोड़पति-अरबपति बन गए हैं.

वास्तव में डॉ सिंह का कथन एक तरह की स्वीकारोक्ति है, लेकिन भारतीय मतदाता महज स्वीकारोक्ति के आधार पर सरकार के गुनाह माफ नहीं करने वाले. मतदाता चाहते हैं कि उनके द्वारा चुने गए राजनेता उनके प्रति उत्तरदायी हों. घपलेबाजों के घर शेखी के साथ जो छापे मारे गए, वह अपने आपमें एक छोटा-मोटा घोटाला है, क्योंकि दोषियों को सबूत नष्ट करने और अपनी कारगुजारियों पर परदा डालने का पर्याप्त समय दिया गया है. प्रधानमंत्री कहते हैं: ‘आइए, हम निराशा और नकारात्मकता के इस माहौल को खत्म कर दें.’ लेकिन सवाल तो यही है कि आखिर देश में निराशा का माहौल क्यों है? आज अगर मतदाताओं की मनोदशा नकारात्मक है तो इसके लिए देश की सरकार ही तो जिम्मेदार है.

अब भारत के लोग धीरे-धीरे महंगाई को भ्रष्टाचार से जोड़कर देखने लगे हैं. आज की निराशा को कल के आक्रोश में तब्दील होते देर न लगेगी.


इस नकारात्मकता से सरकार भी नहीं बच पाई है. वर्ष 2010 में हमने एक क्षत-विक्षत सत्ता तंत्र को चरमराते हुए देखा है. शीर्ष पदों पर बैठे कुछ अधिकारियों ने इसलिए सब कुछ उगल दिया (ये रहस्योद्घाटन अब नीरा राडिया टेप्स के नाम से मशहूर हैं), क्योंकि वे राजपथ के लुटेरों के चेहरों पर चिपकी आत्मसंतोष की भावना को पचा नहीं पाए थे. सिंह सरकार को हिलाकर रख देने वाले खुलासों में विपक्ष की कोई भूमिका न थी. सरकार के ही एक धड़े ने कॉमनवेल्थ भ्रष्टाचार के ब्योरे मुहैया करा दिए थे.

आखिर ऐसा कैसे संभव है कि हम निर्माण सौदों से लेकर टॉयलेट पेपर तक की खरीदी में हुई लूटखसोट में बारे में पढ़ें और नकारात्मकता की भावना से न भर जाएं? पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने लवासा टाउनशिप प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी, जबकि कृषि मंत्री शरद पवार सार्वजनिक रूप से कह चुके थे कि लवासा उनके दिल के बहुत करीब है. पवार के आलोचकों का मानना है कि लवासा उनकी जेब के भी बहुत करीब है. लेकिन लवासा अगर सुर्खियों में आया तो भारतीय जनता पार्टी या शिवसेना के कारण नहीं, बल्कि यूपीए सरकार के एक मंत्री के कारण.

डॉ मनमोहन सिंह की मंशा पर कोई संदेह नहीं, लेकिन क्या वे सफाई करने में सक्षम हैं भी? लोग अब नेक मंशाओं से ऊब चुके हैं. उन्हें विश्वसनीयता और उत्तरदायित्व चाहिए. प्रधानमंत्री के रुख के विरोधाभास खुद जाहिर हैं. अगर वे अपनी छड़ी घुमाएंगे तो उनके अपने संगी-साथियों पर ही चोट पड़ेगी. क्या वे ऐसा करने के बावजूद यह उम्मीद कर सकते हैं कि उनकी सरकार बची रहेगी? यकीनन वे बुरे फंसे हैं. उनकी सरकार ने अपनी कमअक्ली के चलते विपक्ष को एकजुट होने का मौका दे दिया है. जेपीसी के गठन की मांग पर विपक्ष अड़ा हुआ है और अब जेपीसी सरकार की टालमटोल का प्रतीक बन चुकी है. कांग्रेस ने अपनी सरकार को बचाने की कोशिश में विपक्ष के ही हाथ मजबूत कर दिए.

सरकार को तो खैर मनानी चाहिए कि लोगों के मन में अभी केवल निराशा ही है. अब लोग धीरे-धीरे महंगाई को भ्रष्टाचार से जोड़कर देखने लगे हैं. आज की निराशा को कल के आक्रोश में तब्दील होते देर न लगेगी.

आक्रोश को रिलीज करने के लिए सरकार में कुछ भीतरी वॉल्व होते हैं, लेकिन बार-बार इन वॉल्व की ताकत परखने में कोई समझदारी नहीं है. यदि सरकार अपने हठ और जिद पर अड़ी रही तो जल्द ही लोगों के लिए अपने गुस्से को रोके रखना मुश्किल साबित हो जाएगा.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

02.01.2011, 02.06 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sainny Ashesh [] http://snowaborno.blogspot.com

 
  भ्रष्टाचार इस देश की ला-इलाज बीमारी है- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी!
अमीर और गरीब दोनों यहाँ भ्रष्ट हैं.गिने-चुने लोग हैं जिन्हें ईमानदारी की बीमारी है. कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें ईमानदारी बनाए रख कर ही बहुत फायदा हो सकता है. कुछ ऐसे भी हैं जो जान गए हैं कि बिलकुल मौलिक तरीके से सजग रह कर ही अब एक ठीक-ठाक ज़िन्दगी को जिया जा सकता है. वे उन भूखे-नंगे लोगों की चिता भी छोड़ चुके हैं, जो शादी ज़रुर करते हैं और बच्चे पैदा किये बिना नहीं मानते और मुफ्त के अनाज के लिए रोते रहते हैं.
 
   
 

fareeed ahmad [fareedahmad07@gmail.com] Hyderabad A.P

 
  आपने सही फरमाया है लेकिन घर का भेदी लंका ढ़ाहे तो बेचारा प्रधानमंत्री क्या करे.. मैं तो यही कहूंगा कि ...रब्बा इश्क न होवे... 
   
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